विचार स्तम्भ

नज़रिया – पैसे पेड़ पर नही ऊगते..

नज़रिया – पैसे पेड़ पर नही ऊगते..

हम जो लिब्रेलाइजेशन की औलादें है। हम जो पिछले बीस सालों में कॉलेज से निकलकर धन्धे पानी और जॉब में है.. एक घमण्ड में रहे। घमण्ड ये, की विकास सरकारें नही, हम करते हैं, जनता करती है। गुमान था, कि सरकार चाहे कोई आये, विकास तो होता रहेगा। इसलिए विकास “फार ग्रांटेड” था। तो हमें कुछ एक्स्ट्रा चाहिए था।
जब जेब मे पैसे हो जाएं तो आदमी इज्जत ढूंढता है, पावर ढूंढता है। अहसास चाहिए उसे, दमदार होने का। विकास-फिकास छोड़िए , सरकार तो भई, दमदारी की फीलिंग दे। मनमोहन जैसे चुप्पे, रोबोटिक, बोरिंग आदमी का गद्दी पर होना उस इच्छा को और मजबूती दे रहा था।
हम लिब्रेलाइजेशन की औलादों ने एक और चीज देखी थी। वो 1993 के दंगे, वो गोधरा की आग, वो वर्ल्ड ट्रेड टावर का जलना, संसद पर हमला, वो अल कायदा, इराक, सीरिया, इंडियन मुजाहिदीन, बम ब्लास्ट, मुम्बई हमला, सीमा और कश्मीर पर फौजियों की शहादते… हम 1992 और 2002 नोटिस न कर सके, पर ये तस्वीरें खूब याद रहीं। तो दमदारी किसे दिखानी है, अवचेतन में वो टारगेट भी तय था।
और फिर मसीहा आया। दमदार, खुला बोलने वाला, और हमारे दिल मे छुपी ख्वाहिशों को तामीर देने वाला। 2002 का प्रूवन ट्रैक रिकार्ड भी था। अजी, इस पैकेज के साथ विकास भी फ्री था। सारा हिंदुस्तान इस पैकेज को खरीदने बस तैयार बैठा था। हमने डबल पैकेज बुक करवा लिया।
सरकारो का काम गवर्नेस होता है, इकॉनमी होता है, कानून का राज कायम करना, शांति रखना और सीमाएं सुरक्षित रखना होता है। “देश” नाम का जो आइडिया है, उस आईडीये में सबका भरोसा बनाये रखना “ही” होता है। लेकिन इनके अलावे “भी” कुछ चाहते है, तो प्रतिभा शून्य नेताओ को आसान और सस्ता विकल्प थमा देते है। किसी फिसड्डी बच्चे को आसान सवाल पर भी बराबर नम्बर मिलने हों, तो वह कठिन प्रश्न हल ही क्यो करेगा? प्रश्न पत्र इस तरह सेट नही किये जाते।
तो अब आप बाजार मांगिये- मन्दिर ही मिलेगा। आप रोजगार मांगिये – कश्मीर को डंडे मिलेंगे। उपज के दाम भी मांगिये, दो चार गौ-तस्कर को लिंच करके दिया जाएगा। कानून व्यवस्था मांगिये – पाकिस्तान को धमकी दी जाएगी। आप स्वास्थ्य और शिक्षा मांगिये- जेएनयू पीटकर दिखाया जाएगा।
आखिर आपने ये “भी” तो चाहा था न। आपकी जरूरत का एक हिस्सा पूरा हुआ न, इसलिए आप-हम कुछ और इंतजार करने को तैयार हो जाते हैं। मुंह बाई हुई मूल जरूरतो का नम्बर कब आएगा, कहना मुश्किल है, क्योकि हमको- आपको भरमाने के लिए डमरू बजाने के हजार और तरीके हैं।
लिब्रेलाइजेशन की सन्तानो का घमण्ड अब टूट चुका है, कि विकास जनता करती है। आपका अब भी न टूटा हो, तो जान लीजिए कि जनता केवल विकास में अपनी ऊर्जा झोंक सकती है। निवेश, रोजगार और समृद्धि के लिए, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, व्यापार नीति, मौद्रिक प्रबंधन चाहिए। इसके साथ शान्त माहौल, सन्देह रहित सोसायटी, निर्भय नागरिक और उसकी जेब मे पूँजी चाहिए।
इतिहास के अपने कुटैवों पर पर्दे ढांपती सत्ता की जगह, भविष्य में झांकती लीडरशिप चाहिए। और चाहिए चुप्पा, बोरिंग , रोबोटिक मनमोहन जैसा कोई जीव, जो देश की सबसे प्रमुख ड्राइविंग सीट पर टिक कर बैठे, जो सड़क पर निगाह जमाये बस गाड़ी चलाता रहे। जिसे ठीक से पता हो, कि पैसे पेड़ो पर नही उगते।

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Manish Singh

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