मिल मज़दूरों के लिए इस मांग के साथ  डंट गए थे महात्मा गांधी

मिल मज़दूरों के लिए इस मांग के साथ डंट गए थे महात्मा गांधी

एक अमीर मिल मालिक का बेटा अपने दोस्त को, मजदूरों के बीच लीडर बनाकर बिठा देता है। दोस्त मजदूरों की बस्ती में रहता है। जब मजदूरों का दर्द समझता है, तो अपने ही दोस्त.. याने मिल मालिकों के खिलाफ हो जाता है। राजेश खन्ना और अमिताभ की इस मूवी को आपने जरूर देखा होगा। कर्तव्य […]

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 महात्मा गांधी का यह किस्सा, एक बार फिर याद कर लीजिए

महात्मा गांधी का यह किस्सा, एक बार फिर याद कर लीजिए

जो कपड़े रंगने के काम आता, बंगाल और बिहार के किसानों के गले का हलाहल था। एक एकड़ जमीन में तीन काठी भूमि पर नील उगाना जरूरी था। नील जहां लगती, जमीन बेकार हो जाती। तो सरकारी अफसर और ठेकेदारों के गुमाश्ते उसे अगली बार बेहतर जमीन पर उगवाते। तो खाने के लिए अनाज की […]

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 फासिज्म लुभाता क्यो है?

फासिज्म लुभाता क्यो है?

तमाम फिल्मों, उपन्यासों में हम एक विलेन देखते है। जो निर्दयी, क्रूर और मदान्ध है। उसके हाथ मे पूरी ताकत है, पूरी फिल्म में वह हर अत्याचार करता है, आखरी के कुछ मिनटों में उसे किये की सजा मिलती है। उसे पिटते मरते देख हम खुश होते है। सत्य की जीत के साथ समापन करते […]

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 अनुबंध के बाद विवाद की स्थिति में कोर्ट का दरवाज़ा नहीं खटखटा पाएंगे किसान

अनुबंध के बाद विवाद की स्थिति में कोर्ट का दरवाज़ा नहीं खटखटा पाएंगे किसान

क्या आपने कभी कोई अनुबन्ध किया है? हमेशा अंत मे एक लाइन होती है। ” समस्त विवादों का समाधान, फलां शहर के न्यायालय के क्षेत्राधिकार में होगा”। यह तो आपसी अनुबन्धी के बीच एक समझौता होता है, की कोई भी पक्ष अगर अनुबन्ध में धोखा करता है, भारत की न्याय व्यवस्था का भरोसा करते हुए […]

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अपारदर्शी सिस्टम का लोकतंत्र की सबसे महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया में स्थान नही होना चाहिए

यु टयूब पर घटते हुए डिसलाइक के हजारों स्क्रीनशॉट तैर रहे हैं। यह तौर तरीका छह सालों में बार बार दिखा है। जीडीपी के आंकड़ों से लेकर बेरोजगारी तक, जीएसटी के आंकड़ों से कॅरोना तक, अब आकंड़े विश्वसनीय नही रह गए। अब तो यह साफ है, कि जो बताया जा रहा है, वास्तविकता उंसके उलट […]

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 जब वायसराय ने भी एक राजा के फ़ैसले को पलटने से इंकार कर दिया था

जब वायसराय ने भी एक राजा के फ़ैसले को पलटने से इंकार कर दिया था

पीछे जो बिल्डिंग है, वह हाईकोर्ट है। वो हाईकोर्ट, कोर्ट जिसका फैसला पलटने की ताकत भारत के वायसराय की नही थी। तो आप इसे सुप्रीम कोर्ट भी कह सकते हैं। बात 1932 की है। जब धनेश्वर गाँडा ने एक व्यक्ति की हत्या कर दी, और पकड़ा गया। राज्य की सेशन कोर्ट ने उसे मौत की […]

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 नेहरू और सुभाष चंद्र बोस की दोस्ती कि वो बातें जो आप नहीं जानते

नेहरू और सुभाष चंद्र बोस की दोस्ती कि वो बातें जो आप नहीं जानते

याद करेगी दुनिया, तेरा मेरा अफसाना.. ये लाइन फिल्मी जरूर है, मगर सुभाष और नेहरू का अफसाना किसी फ़िल्म की कथा से कम नही। ये दो युवा, दो जुदा शख्सियतें, जिनकी राहें भी जिंदगी अलग कर गयी, मगर जीवन की अंतिम सांस तक वह मित्रभाव और म्युचुअल रिस्पेक्ट बना रहा। गांधी के युग की शुरुआत […]

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 वो जापानी सिपाही जिसने जिंदगी के 30 साल दूसरा विश्वयुद्ध लड़ते हुए गुजार दिए

वो जापानी सिपाही जिसने जिंदगी के 30 साल दूसरा विश्वयुद्ध लड़ते हुए गुजार दिए

ये हीरू ओनेडा हैं। जापान की इम्पीरियल आर्मी का सिपाही, जिसने जिंदगी के 30 साल दूसरा विश्वयुद्ध लड़ते हुए गुजार दिए। दूसरे विश्वयुद्ध के पूर्व जापान में राजशाही, वस्तुतः एक फासिस्ट किस्म के सिस्टम पर शासन करती थी। जनता को देश के लिए मरने, और मारने की घुट्टी मिली होती है।कामिकाजे एक प्रथा है, जिसमे […]

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 योर ऑनर ! हैव यू नो ऑनर?

योर ऑनर ! हैव यू नो ऑनर?

लोकतंत्र के तीन कंगूरे हैं- व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका। एकतरफा जनमत देकर, और विपक्ष को लंगड़ा लूला करके, व्यवस्थापिका को 23 करोड़ वोटों ने ढहा दिया। कार्यपालिका की विश्वसनीयता 353 की मेजोरिटिज्म तले कुचली गयी। मगर न्यापालिका को नपुसंक करने में अकेले रंजन गोगोई का योगदान अविस्मरणीय रहेगा। जजों की उस ऐतिहासिक प्रेस कान्फ्रेंस में […]

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 ग्वालियर के महल की खिड़की से देखिए, राजनीतिक दांव पेंच के 160 साल

ग्वालियर के महल की खिड़की से देखिए, राजनीतिक दांव पेंच के 160 साल

भारत के इतिहास और राजनीतिक दांव पेंच के पिछले 160 बरस अगर आप नजदीक से देखना चाहते हैं, तो ग्वालियर के महल की खिड़की से देखिए। यहां पर शो की फ्रंट सीट लगी है। सब नजदीक से साफ साफ दिखता है। शो 1857 से शुरू होता है।तब तक लुटेरी कम्पनी सरकार ने, दीवानी पर कब्जे […]

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