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पिछले पाँच सालो में 5 लाख 55,603 करोड़ रूपये के लोन को बट्टे खाते में डाला गया है

मोदी समर्थको का सबसे बड़ा इल्जाम पिछली UPA सरकार पर यह होता है कि उनके समय ही सारे कर्ज उद्योगपतियों को बांटे गए जो आज डूब रहे है. लेकिन कल एक बेहद दिलचस्प आंकड़ा सामने आया है. आरबीआई ने बताया है कि पिछले दस सालों में सात लाख करोड़ से ज़्यादा का बैड लोन राइट ऑफ हुआ. यानी उद्योगपतियों द्वारा न चुकाए गए क़र्ज़ को बट्टे खाते में डाला गया है.
आगे आरबीआई बताता है कि इस 7 लाख करोड़ का 80 फीसदी जो लगभग 5 लाख 55,603 करोड़ रुपये होता है, पिछले पाँच सालो के मोदी राज में बट्टे खाते में डाला गया है. इसका अर्थ है यह भी कि UPA के मनमोहन सिंह के राज के पांच सालो में मात्र करोड़ रूपये डेढ़ लाख करोड़ ही राइट ऑफ़ किये गए. जिसे मोदी समर्थक सबसे खराब सरकार कहते है.

आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक़ बैंकों ने जो लों राईट ऑफ़ किया है

  • 2016-17 में 1,08,374 करोड़
  • 2017-18 में 1,61,328 करोड़
  • 2018-19 को पहले छह महीने में 82,799 करोड़
  • 2018-19 को बाद के तीन महीने में 64,000 करोड़

अब एक मजेदार तुलना है, सभी बैंकों ने वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान अप्रैल-दिसंबर तक में ही 1 लाख,56,702 करोड़ रुपये के बैड लोन को राइट ऑफ किया. यानी जितना UPA के पांच सालो में उद्योगपतियों के बैड लोन को राइट ऑफ किया गया उससे भी अधिक 2018-19 वित्त वर्ष के सिर्फ 9 महीनो में मोदी सरकार ने उद्योगपतियों का 1 लाख 56,702 करोड़ रुपये के बैड लोन को राइट ऑफ कर दिया. यह हैरान कर देने वाला आंकड़े है.
सबसे बड़ी बात तो यह है कि सूचना आयोग पूछ रहा है, सुप्रीम कोर्ट पूछ रहा है कि आखिर ये कौन लोग हैं जिनके इतने लोन राइट ऑफ किए गए हैं. लेकिन मोदी सरकार वो भी नही बताएंगी, ………….क्या किसी को अब भी शक है कि यह सरकार पूंजीपतियों की सरकार है? जो लोन राइट ऑफ करके बैंको को डुबोने में लगी हुई है.

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बैड लोन्स (ऋण न चुकाने) के मामले में विश्व में नंबर 1 हुआ भारत

मोदी जी ने ओर किसी बात में देश को न.1 पर पुहचाया हो या न हो, पर उन्होंने एक बात जरूर देश को न.1 कर दिया है. विश्व की 10 आर्थिक ताकतों में भारत बैड लोन्स ( Bad Loans ) के मामले में सबसे घटिया देशों की श्रेणी में नम्बर 1 पर हैं. इटली से भारत का तगड़ा मुकाबला था लेकिन अब भारत ने उसे भी पीछे छोड़ दिया है, इटली में जहां बैड लोन 9.9 फीसदी है, वहीं भारत में इसका प्रतिशत 10.3 पुहंच गया है.
भारत के बैंक बैड लोन की भयानक चपेट में है, हालत इतनी खराब है कि खुद केबिनेट मंत्री गडकरी ने बता रहे हैं कि सड़क निर्माण का ठेका लेनेवालों को बैंक लोन नहीं दे रहे हैं और न ही इन प्रॉजेक्ट्स को बैंक गारंटी ही दी जा रही है. इससे 2022 तक 84 हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़क बनाने की योजना के अधर में पड़ गयी हैं.
दो साल पहले पता चला कि मात्र 57 लोगों के ऊपर 85 हज़ार करोड़ का कर्ज बकाया है. कोर्ट ने रिज़र्व बैंक से पूछा था कि आखिर इन लोगों के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं कर दिए जाते? लेकिन रिजर्व बैंक ने मोदी सरकार के दबाव में आकर उनके नाम बताने से इनकार कर दिया.
एक संसदीय समिति ने बताया है मोदी सरकार के चार सालो में बैंको के नॉन परफॉर्मिंग एसेट (NPA) में 6.2 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है. इनके शासनकाल में साल दर साल बैंको द्वारा बट्टे खाते में डाली जाने वाली रकम बढ़ती ही गयी! आखिर यह कैसे हुआ?
आप को जानकर आश्चर्य होगा कि पब्लिक सेक्‍टर बैंकों (पीएसयू) ने पिछले 5 साल के दौरान 2.5 लाख करोड़ रुपए का लोन राइट ऑफ किया है. कोई जरा पूछे कि यह किन लोगों के पैसे राइट ऑफ किये गए, यह कैसी चौकीदारी की आपने कि, आपके मित्र उद्योगपति पिछले दरवाजे से अपना लोन राइट ऑफ करवाते गए?
खुद को चौकीदार कहलाने वाले प्रधानमंत्री की सारी चौकीदारी यहाँ धरी की धरी रह जाती है, 2019 के आम चुनाव से पहले भारत की बिगड़ती आर्थिक स्थिति के संदर्भ में देश के बैड लोन में नंबर वन हो जाने की बात बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन कोई विपक्षी दल मोदी को इस मुद्दे पर घेरने की कोशिश नही करता यही आश्चर्य है?

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भारत से यूएस ट्रेड कन्सेशन वापस ले सकता है अमेरिका

अम्बानी के मोटे चुनावी चंदे की चाहत में मोदीजी ने अमेरिका को भी नाराज कर दिया है, कल खबर आई है कि अमेरिका, भारत से यूएस ट्रेड कन्सेशन वापस ले सकता है, जिसके तहत भारत के 5.6 अरब डॉलर (40 हजार करोड़ रुपए) के एक्सपोर्ट पर अमेरिका में कोई टैक्स नहीं लगता है. अगर ऐसा होता है तो भारत से एक्सपोर्ट होने वाले आइटम्स पर अमेरिका मोटा टैक्स वसूलेगा ओर भारतीय एक्सपोर्टर जो छोटे उद्योगों से माल लेकर सप्लाई करते थे उनकी हालत खराब हो जाएगी ओर इसका बड़ा असर लाखो की समस्या में कार्यरत एक्सपोर्टइंडस्ट्री से जुड़े लोगो पर पड़ेगा जिनकी रोजी रोटी इनके सहारे ही चलती थी.
आखिर अम्बानी के आगे इन कीड़े मकोड़ों की ओकात ही क्या है? अमेरिका के इस निर्णय की जो वजह बताई जा रही है वह भी बड़ी दिलचस्प है. दरअसल अम्बानी जी के मन मुताबिक बनाकर मोदी जी ने ऑनलाइन रिटेल में एफडीआई की नीति को संशोधित कर दिया जो इस 1 फरवरी से लागू हो गई है, अब विदेशी निवेश वाली ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए भारत में नियम सख्त हो गए हैं.
शायद आपको याद होगा कि मुकेश अम्बानी ने वाइब्रेंट गुजरात मे मोदीजी से ‘डेटा के औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ कदम उठाने का आग्रह किया था, यह सिर्फ ओपचारिक आग्रह था क्योंकि वह मोदीजी से पहले ही ई कॉमर्स के नए ड्राफ्ट में अपनी सारी सहूलियत वाली शर्तो डलवा चुके थे.
अमेरिका कम्पनियों वालमार्ट ओर अमेजन को जब तक इस बदलाव की हिंट मिलती तब तक उन्होंने अपना बड़ा निवेश भारतीय बाजार में कर दिया था, वॉलमार्ट ने पिछले साल ही मई में फ्लिपकार्ट की 77% हिस्सेदारी 1.07 लाख करोड़ रुपए में खरीदी थी ई-कॉमर्स सेक्टर में दुनिया की अब तक की सबसे बड़ी डील थी.
अब जब इन दोनो कपंनियों ने नए नियमों पर गौर किया तो पाया कि उनकी बिक्री 25-30 फीसदी नीचे गिर गयी हैं साथ ही आपूर्ति करने में अब लगभग दो दिन का समय लग रहा है जिससे लॉजिस्टिक्स को भी गंभीर नुकसान झेलना पड़ रहा है.
इस खबर से अमेरिकी शेयर बाजार में अमेजन का शेयर 5.38% लुढ़क गया. इस गिरावट की वजह से कंपनी का मार्केट कैप 3.21 लाख करोड़ रुपए घटकर 56.45 लाख करोड़ रुपए रह गया, वॉलमार्ट के शेयर में भी 2.06% गिरावट आ गई.
अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प जेफ बेजोस ओर वालमार्ट को तो नाराज करने से रहे उन्होंने तुरंत बदले की कार्यवाही शुरू कर दी जिसका परिणाम भारतीय व्यापार को दी जा रही छूट समाप्त करना है.
कई भले मानुषों को लगेगा कि मोदी जी यह तो नीति भारत के छोटे व्यापारी को बचा रही है, लेकिन ऐसा नही है, ऑनलाइन व्यापार बन्द नही होगा बल्कि ओर तेजी से फैलेगा मुकेश अंबानी भारत मे अलीबाबा के सीईओ जैक मा के ऑनलाइन टू ऑफलाइन बाजार मॉडल को जैसे का तैसा लागू कर रहे हैं जियो के 30 करोड़ कस्टमर हैं जिसके कारण रिलायंस को अपने नए प्लेटफॉर्म पर ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अधिक खर्च नहीं करना पड़ेगा.
यह है असली वजह इस नई ऑनलाइन रिटेल में एफडीआई की नीति को संशोधित करने की. लेकिन जाने दीजिए……आप लोगों को हिन्दू मुसलमान से अधिक कुछ समझ नही आएगा इसलिए Plz be Continue.

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क्या सरकार आर्थिक मोर्चे पर झूठे और मेन्युपुलेटेड आंकड़े पेश कर रही है?

यह सरकार भारत के इतिहास में सिर्फ झूठ बोलने ओर आंकड़ो को अपने हिसाब से मैनिपुलेट करने के लिए जानी जाएगी. कल (29 जनवरी 2019 को ) खबर आई कि वित्त वर्ष 2017-18 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 18 फीसद बढ़कर 28.25 लाख करोड़ रुपये हो गया, यह खबर सभी बड़े अखबारों की हेडिंग बन रही थी, लेकिन अंदर खबर पढ़ी तो पता चला कि ‘इसमें पिछले निवेशों का नया मूल्यांकन भी शामिल है’ यानी फिगर बढ़ा हुआ दिखे इसलिए आंकड़ों की बाज़ीगरी दिखा दी गयी.
इसी साल जुलाई में औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग ने जो आंकड़ों को जारी किए थे उसके अनुसार 2017-18 में एफडीआई प्रवाह मात्र तीन प्रतिशत बढ़कर 44.85 अरब डॉलर रहा है. यह पाँच सालो में सबसे कम विदेशी निवेश था.
लेकिन मोदी सरकार के पास 3 प्रतिशत की वृद्धि को 18 प्रतिशत बताने की अदभुत कला है. कमाल की बात तो यह है कि 2017-18 में रक्षा उद्योग मे मात्र 10 हजार डॉलर का एफडीआई आया था, जबकि 2013-14, 2014-15 और 2015-16 में रक्षा उद्योग क्षेत्र में क्रमश: 8.20 लाख डॉलर, 80 हजार डॉलर, एक लाख डॉलर का एफडीआई प्राप्त हुआ था. “यह मोदीजी के मेक इन इंडिया का कमाल है” – यह बात वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री सीआर चौधरी ने बताई थी. यही मंत्री 23 जुलाई को लोकसभा के एक लिखित उत्तर में लोकसभा को सूचित कर रहे थे कि भारत में एफडीआई की वृद्धि दर 2017-18 में गिर रही है.
पिछले साल मोदी सरकार के झूठे आंकड़ो की पोल संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (यूएनसीटीएडी) ने एक रिपोर्ट ने खोली थी, उन्होंने बताया था कि भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 2016 के 44 अरब डॉलर की तुलना में 2017 में घटकर 40 अरब डॉलर रह गया. जबकि इस दौरान भारत से दूसरे देशों में होने वाला विदेशी निवेश दोगुने से भी अधिक रहा.
वैसे मोदीजी का एक ओर कमाल कल की इस रिपोर्ट से हमे पता चला है कि भारत में सबसे ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मॉरीशस से (19.7 फीसद) से आया है. इसके बाद अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर और जापान का स्थान है.
यानी वही काले धन की राउंड ट्रिपिंग वाला मॉरीशस ओर सिंगापुर रुट मोदी सरकार के साढ़े चार सालो में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रमुख स्रोत बना हुआ है. जबकि अरुण जेटली जब वित्तमंत्री बने थे तब उन्होंने एक निजी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में यह साफ बोला था कि “हमने काले धन को रोकने के लिए मॉरीशस व साइप्रस रूट को बंद कर दिया है, तथा सिंगापुर रूट को भी बंद करने के लिए हमने सिंगापुर को चिट्ठी लिख दी है”.

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पीएम मोदी के साढ़े 4 साल में भारत पर बढ़ा 49 फीसदी क़र्ज़

कल एक हैरान करने वाली खबर आई कि पीएम मोदी के साढ़े 4 साल के कार्यकाल में भारत सरकार पर 49 फीसदी का कर्ज बढ़ा है, केंद्र सरकार ने कर्ज पर कल अपनी स्टेटस रिपोर्ट का आठवां संस्करण जारी किया जिसके मुताबिक जून, 2014 में सरकार पर कुल कर्ज 54,90,763 करोड़ रुपये था, जो सितंबर 2018 में बढ़कर 82,03,253 करोड़ रुपये हो गया है. यदि इस कर्ज को देश की 134 करोड़ की आबादी से डिवाइड करे तो हर नागरिक पर लगभग 61 हजार रुपये का कर्ज है.
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में मोदी समर्थक अब तक तो यह बताते आए है कि मोदीजी ने सारा विदेशी कर्ज चुका दिया और कोई नया कर्ज भी नही लिया. खैर ऐसे झूठ की पोल तो बहुत बार खुल चुकी है लेकिन इस बढ़ते हुए कर्ज के आंकड़े से कुछ बेहद महत्वपूर्ण बाते निकल कर आती हैं.
2014 में नरेंद्र मोदी की ताजपोशी से एक साल से भी कम समय में कच्चे तेल की कीमत 114 डॉलर प्रति बैरल से 53 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी. बड़े स्तर पर सोशल सेक्टर में निवेश के लिए बेकरार और राजकोषीय घाटे से जूझ रही सरकार के लिए यह किसी तोहफ़े से कम नहीं था.
2015 में एक चुनावी रैली में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वो एक भाग्यशाली प्रधानमंत्री हैं, जिसके आने से कच्चे तेल की कीमतें कम हो गई हैं और इससे सरकार को अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में मदद मिलेगी.
90 फ़ीसदी से अधिक तेल इंपोर्ट करने वाले देश को अगर आधी कीमत पर तेल मिलने लगे तो सरकारी खजाना तो बहुत तेजी से बढ़ना चाहिए था.

अब दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात समझिए

2014 से 2017 के बीच पेट्रोल-डीज़ल पर 9 बार उत्पाद कर (एक्साइज़ ड्यूटी) बढ़ाया गया. नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच पेट्रोल पर ये बढ़ोतरी 11 रुपये 77 पैसे और डीज़ल पर 13 रुपये 47 पैसे थे. जबकि पेट्रोल डीजल के दामो में इस दौरान लगभग सिर्फ 2 रुपये की कटौती की गयी.
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री की केंद्र सरकार को मिलने वाला राजस्व लगभग तीन गुना बढ़ गया था 2015-16 से 2017-18 के बीच सरकार के खजाने में तेल की बिक्री से करीब 14.88 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुके थे.
यानी फायदा दो स्तर पर हुआ एक तो कच्चे तेल की कीमत 60 प्रतिशत तक घट गयी और उसके बाद एक्साइज ड्यूटी लगा कर दो सालों में सरकारों के खजाने में करीब 15 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त आमदनी भी हुई.
यानी कच्चे तेल का आयात बिल जो देश के सबसे बड़े खर्चो में शुमार किया जाता हैं उसके अंतर्गत मोदी सरकार को बेतहाशा फायदा हुआ लेकिन उसके बावजूद आज हमें यह पता चल रहा है कि सरकार पर 49 फीसदी का कर्ज बढ़ गया है यह कैसे हो गया यह कोई हार्वर्ड हमे नही बतला सकता ऐसा अर्थशास्त्र शायद चायवाला ही समझा सकता है

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देश में लगातार बढ़ रही है बेरोज़गारी

देश में बेरोजगारी का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है. लेबर ब्यूरो के ताजा सर्वे के मुताबिक बेरोजगारी ने पिछले 4 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. हालांकि अभी लेबर ब्यूरो ने सर्वे सार्वजनिक नहीं किया है.
लेकिन सूत्रों के अनुसार साल 2013-2014 में बेरोजगारी दर 3.4 फीसदी पर रही थी जो साल 2016-2017 में 3.9 फीसदी पर पहुंच गई है, विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियां कमजोर पड़ रही है मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर खासकर उपभोक्ता एवं पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन में गिरावट की वजह से नवंबर में देश का आईआईपी ग्रोथ घटकर 0.5 फीसदी रहा, जिसके साथ ही यह 17 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है.
एक ओर बहुत महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है पूरे उत्तरी भारत का डिस्टिब्यूशन हब कहा जाने वाले दिल्ली का जीएसटी कलेक्शन लगातार गिर रहा है यह बताता है कि उद्योग धंधों की हालत किस कदर खराब है.
अप्रैल से दिसंबर 2018 तक 14% ग्रोथ के पैमाने पर सबसे ज्यादा रेवेन्यू शॉर्टफॉल वाले सभी राज्यों में दिल्ली पांचवे स्थान पर है, जबकि पुड्डुचेरी, पंजाब और हिमाचल प्रदेश पहले, दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं। हालांकि, साल दर साल आधार पर शॉर्टफॉल में बढ़ोतरी के मामले में यह पहले स्थान पर है। यहां शॉर्टफॉल सीधे 6% से 20% तक जा पहुंचा है.
आप किसी भी छोटे व्यापारी से बात कर लीजिए वह आपको बताएगा कि धंधे में इतने बुरे दिन उसने कभी नहीं देखे हैं पहले भी तेजी मंदी लगी रहती थी लेकिन अब लगातार बिजनेस की हालत डाउन होती जा रही हैं यही मोदीजी के अच्छे दिन है.

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अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में देश के लिए दो बुरी ख़बरें आई हैं

2 जनवरी 2019 – अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर 2 बुरी खबरे हैं. वित्‍त मंत्रालय की ओर से जारी बयान के मुताबिक दिसंबर का जीएसटी कलेक्‍शन तीन महीनों में सबसे कम है ओर मुद्रा लोन योजना के तहत साल 2017-18 के दौरान पिछले साल की अपेक्षा सरकारी बैंकों का एनपीए दोगुना हो गया है.
जीएसटी कलेक्शन की बात की जाए तो यह दिसम्बर में 94,726 करोड़ रुपये रह गया है जबकि नवंबर के 97,637 करोड़ रुपये का कलेक्‍शन हुआ था ओर अक्टूबर में सरकार को 1.07 लाख करोड़ रुपये का रेवेन्यू हासिल हुआ था. इस हिसाब से पिछले साल की अपेक्षा जीएसटी कलेक्शन में सिर्फ 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि बजट में 14 प्रतिशत से अधिक वृद्धि का अनुमान लगाया गया था.
जीएसटी कलेक्शन के गिरने से राजकोषीय घाटा बढ़ता जा रहा है CGA की रिपोर्ट में वित्तीय घाटे का एकमात्र कारण रेवेन्यू कलेक्शन बताया है चालू वित्त वर्ष की अप्रैल से नवंबर की अवधि में देश का राजकोषीय घाटा पूरे साल के बजटीय लक्ष्य का 114.8 फीसदी हो गया है.
मुद्रा योजना की बात की जाए तो साल 2015-16 में सरकारी बैंकों द्वारा मुद्रा लोन योजना के तहत 59674.28 करोड़ रुपए के लोन बांटे गए, जिनमें एनपीए की संख्या 596.72 करोड़ रुपए रही। साल 2016-17 में एनपीए का आंकड़ा बढ़कर 3,790 करोड़ के करीब हो गया। अब 2017-18 में मुद्रा लोन में एनपीए का आंकड़ा बढ़कर 7,277 करोड़ रुपए हो गया है.
अब इतना NPA मुद्रा योजना में क्यों हो रहा हैं? उसका एक बड़ा कारण है ओर वो कारण आल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कंफेडेरेशन के महासचिव डी टी फ्रैंको ने बताया था….. उन्होंने कहा था कि ‘मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के बाद बैंकिंग सेक्टर पर भारी दबाव है. वो जहां भी जाते हैं लोन मेले लॉन्च करना चाहते हैं. एक ऐसा कार्यक्रम हुआ जहां बैंकर्स को बुलाया गया जिससे कि लोग ऋण के बारे में समझ सकें. लोन मेले के आयोजन में जब बैंकर्स गए तो देखा कि वो पूरी तरह बीजेपी के कार्यक्रम में तब्दील था. मंच पर मौजूद नेता और बाकी सारे नेता भी बीजेपी के ही थे.

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अर्थव्यवस्था

यह मामला सीधा आपकी जेब से जुड़ा हुआ है….

कहते है.. बिना आग के धुंआ नही उठता, कल रिजर्व बैंक ने भुगतान और निपटान कानूनों में बदलाव के बारे में सरकार की एक समिति की कुछ सिफारिशों के खिलाफ बेहद कड़े शब्दों वाला अपना असहमति नोट (डिसेंट नोट) सार्वजनिक किया है, इसका सरल अर्थ यह है कि खुद रिजर्व बैंक के मन में सरकार की नीयत के बारे में गहरी शंकाए है.

इस विषय मे अधिक समझने के लिए यह जानना होगा कि आखिरकार यह पूरा मामला क्या है ?

  • दरअसल देश में अभी तक डिजिटल भुगतान के नियमन का काम रिजर्व बैंक के जिम्मे है, जो कि बैंकिंग क्षेत्र का भी नियामक है, डिजिटल पेमेंट्स में बैंक खातों के बीच लेनदेन होता है.
  • आरबीआई का मानना है कि दुनियाभर में पेमेंट सिस्टम्स केंद्रीय बैंकों के अधीन कार्य करते हैं। ओर पूरे विश्व में क्रेडिट और डेबिट कार्ड्स बैंक ही जारी करते हैं, इसलिए डिजिटल पेमेंट के संबंध में भी अंतिम अधिकारिता उसी के पास रहना चाहिए जो कि बिलकुल ठीक बात है.
  • लेकिन भारत मे मोदी सरकार एक निराली नीति लागू कर रही है जिससे करंसी पर तो रिजर्व बैंक अंतिम नियामक रहे लेकिन डिजिटल भुगतान में उसकी भूमिका उतनी प्रभावशाली न रह जाए , देश में भुगतान संबंधी मौजूदा कानून में व्यापक बदलाव की सिफारिश करते हुए सरकार की एक उच्च स्तरीय समिति ने एक स्वतंत्र पेमेंट रेगुलेटरी बोर्ड (पीआरबी) गठित करने की बात की है ओर समिति चाहती है कि भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर को इसका पदेन अध्यक्ष नही बनाया जाए .
  • आरबीआई का यह मानना है कि चाहे डिजिटल भुगतान हो या प्रत्यक्ष हर तरह के भुगतान का नियमन करना केन्द्रीय बैंक के अधिकार क्षेत्र में होना चाहिये क्योंकि मुद्रा आपूर्ति का नियमन करना उसके कामकाज का हिस्सा है ओर लेनदेन के लिये मुद्रा में विश्वास बनाये रखना भी उसके कामकाज का हिस्सा है, यही कारण है कि आरबीआई पेमेंट्स रेग्युलेट्री बोर्ड को अपनी निगरानी में रखना चाहता है.
  • लेकिन मोदी सरकार ऐसा नही चाहती 2007 जो भुगतान और निपटान कानून बनाया गया था उसका मूल उद्देश्य ही भारत में भुगतान प्रणाली (पेंमेंट सिस्टम) का विनियमन और रिजर्व बैंक को ऐसे मामलों में प्राधिकारी नियुक्त करना था लेकिन इसे पूरी तरह से बदला जा रहा है .

एक ओर महत्वपूर्ण बात यह है कि 2007 से 2018 तक डिजिटल पेमेंट संबंधी सारा सीन ही बदल गया है अब पेटीएम जैसे डिजिटल वॉलेट आ गए है ओर डिजिटल वॉलेट से भुगतान में विवादों के लिए अभी देश में कोई विशेष कानून नहीं है साइबर लॉ एक्सपर्ट पवन दुग्गल कहते हैं कि वॉलेट कंपनियां फिलहाल आईटी ऐक्ट के सेक्शन 43-ए से रेग्युलेट होती हैं, जहां एन्फोर्समेंट जैसी कोई चीज नहीं है। वॉलेट पेमेंट यूजर और मोबाइल वॉलेट कंपनी के बीच एक टर्म्स एंड कंडिशंस अग्रीमेंट भर है, जिसे कानूनी संरक्षण देने की जरूरत है ई-वॉलेट कंपनियों को भी आरबीआई से लाइसेंस लेना पड़ता है ऐसे में इन पर किसी दोहरे नियमन की अपेक्षा नहीं की जाती है ओर इसीलिए आरबीआई को ही इसका अकेला ओर अंतिम नियामक बनाना सही रहेगा
पेमेंट रेगुलेशन बोर्ड की अवधारणा तो ठीक है लेकिन रिजर्व बैंक को इसका नेतृत्व नही सौपने की सिफारिश करना बड़े सवाल खड़ा कर रहा है
हम जैसे जैसे कैशलेस अर्थव्यवस्था के दौर में प्रवेश कर रहे है वैसे वैसे हमारी खून पसीने की कमाई अधिक असुरक्षित होती जा रही है हम करंसी नोट पर लिखे आरबीआई के गवर्नर के वचन का ही भरोसा करते है किसी दल की सरकार का नही इसलिए इस मूर्खतापूर्ण सिफारिशों को रद्दी की टोकरी में डाल देना चाहिए.

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अब सरकार हाथ खड़े करने लगी है पेट्रोल-डीज़ल-गैस पर क़ाबू पाना उसके हाथ में नहीं है.

पेट्रोल-डीज़ल-गैस पर अब सरकार हाथ खड़े करने लगी है. खुलकर कहने लगी है इस पर क़ाबू पाना उसके हाथ में नहीं है.

  • चार साल पहले जादूगर गोगा की तरह नरेन्द्र मोदी हर समस्या का समाधान छड़ी घुमाते ही दे देते थे. अब इनके हाथ में कुछ नहीं रहा.
  • 2017 में मोदी जी ने देश को नए साल का तोहफ़ा दिया. तोहफ़े के तहत पेट्रोल-डीज़ल के दाम को डेली बेसिस पर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से जोड़ दिया.
  • उस वक़्त अनुपम खेर जैसे अर्थशास्त्री मोदी के विजन पर मोहित थे. अब इसी विजन को आधार बनाकर रविशंकर प्रसाद हाथ खड़े कर रहे हैं.
  • मोदी का हर फैसला मोदी को पलटकर डस रहा है. लेकिन ONGC का निदेशक संबित पात्रा लोगों को शरीर में ज़हर भरने के फ़ायदे बताता रहता है. भक्त वाह-वाह करते रहते हैं.
  • नोटबंदी, जीएसटी, डीजल-पेट्रोल सब 180 डिग्री उलट नतीजे दे रहा है. कल को मोदी और उनके मंत्री कह देंगे कि सरकार चलाना सरकार के हाथ में नहीं है. तब, हैरान मत होइएगा.

रविशंकर प्रसाद ने मज़ा ला दिया है आज

  1. पेट्रोल-डीज़ल के दाम को रोकना हमारे हाथ में नहीं है.
  2. अमेरिका में शेल गैस का उत्पादन नहीं हो रहा. इसलिए हम मजबूर हैं.

आपके हाथ में रूमाल है जिसे आप कबूतर बनाकर उड़ाने वाले थे. अब रूमाल ही किसी ने झटक दिया. कर्नाटक में चुनाव था तो 19 दिनों के लिए नियंत्रण उधार में लिया था. शेल गैस की जाने दीजिए. नाले वाली गैस क्यों नहीं ट्राई करते आप?

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नज़रिया – दिल्ली के शासकों को ना रुपये की चिंता है और ना देश की, उन्हें चिंता है तो कुर्सी की

अब जब सबके समझ में आ गया है कि माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली से अर्थव्यवस्था नहीं संभाली जा रही, तो उसी बीच एक और नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है मोदी सरकार ने! रुपये की कीमत को (69.09) की एक नई ऊँचाई पर ले गए है! जो कि हिंदुस्तान के इतिहास में पहली बार हुआ है कि रुपये ने अपनी चमक डॉलर के खिलाफ इतनी खोई है।
आपको याद होगा, यह वही नरेंद्र मोदी और भाजपा के नेता हैं जो चुनावी सभाओं में कहते मिलते थे कि,  “रुपये की कीमत जिस तेजी से गिर रही है, मानो दिल्ली सरकार और रुपये के बीच प्रतियोगिता चल रहा है कि किसकी आबरू तेज़ी से गिरती चली जाएगी।” “दिल्ली के शासकों को ना रुपये की चिंता है और ना देश की चिंता है, उन्हें चिंता है तो कुर्सी बचाने की चिंता है” यह शब्द मेरे नहीं खुद मुख्यमंत्री मोदी के थे, और शायद अब यह उनपर ही कहर बनकर गिरने को तैयार है।
रुपये की खोती चमक और गिरती कीमतों के कारण हमारा देश आज के समय में अर्थिक मंदी के दौर से गुज़र रहा है और विकासशील देशों की सूची में भी पिछड़ता जा रहा है। रुपये की बढ़ती कीमत के कारण महंगाई ने भी आम जनता की कमर तोड़ दी है, जहां पेट्रोल डीजल के दामों पर सरकार को अंकुश लगाने की ज़रूरत थी वहां सरकार उसपर बिल्कुल निरंकुश हो गई है क्योंकि भारत कच्चा तेल, डॉलर में खरीदता है, तो जैसे-जैसे डॉलर बढ़ेगा तेल की कीमतें महंगी होती चली जाएगी और इसका सीधा असर लोगों की ज़िंदगी पर पड़ रहा है, सब्ज़ी से लेकर रोज़मर्रा के ज़रूरत के सभी सामान महंगे होते जा रहे हैं और होते जाएंगे। पर यह तो आज कुछ महीने से हुआ है न, उसके पहले तो सब सामान्य था! तो मोदी सरकार ने क्यों नहीं कम किए तेल के दाम और अंकुश लगाया महंगाई पर।
आपको शायद यह किसी ने बताया नहीं होगा कि, जनवरी 2018 से जून 28 के बीच रुपया डॉलर से 9.25% टूटा है, जो कि एक ऐतिहासिक आंकड़ा है। ख़ैर आइये जानते हैं इसके पीछे वजह क्या है, रुपया अपनी चमक क्यों खोता जा रहा है: भारत दुनिया में तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयात करने वाला देश है।
2014 से 2017 तक कच्चे तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने न्यूनतम स्तर पर था यहां तक कि 2016 में $29/बैरल भी पहुँच गया था। और अब यह ऊपर आता दिख रहा है करीब $80डॉलर/बैरल तक, जो कि डॉ.मनमोहन सिंह की सरकार के समय से काफी कम है, उस वक्त कच्चे तेल का दाम करीब 140 डॉलर/बैरल तक पहुँचा था। उस वक्त भारत के पास विश्व प्रसिद्ध अर्थिक जानकार श्री रघुराम राजन रिज़र्व बैंक के गवर्नर थे तो रुपये की चमक खोने से बच गई अब जब उन्हें मोदी सरकार ने अलविदा कह दिया है। अब देखना है कि उर्जित पटेल (RBI गवर्नर) क्या करामात करके महंगाई और रुपये की कीमत को ICU से बचा कर बाहर निकाल कर ले जाते हैं।
रुपया तो विश्व में अपनी चमक छोड़ता जा रहा है पर स्विस बैंकों में अपने पूरे उफान पर है! विदेशी बैंक (स्विस बैंक) में जमा रुपये में भारी उछाल आया है, स्विस बैंक में जमा भारत के (काले) धन में 50% की वृद्धि हो कर, ₹7000 करोड़ हो गयी है। और यह केवल 1 साल (2017) के भीतर हुआ है, बाकी देशों की जमा राशि मे मात्रा 3% का इज़ाफ़ा और भारतीय मुल्क के लोगों का 50%. तो मोदी सरकार अपने इस वादे/श्वेत पत्र पर भी फेल होती पाई गई है, जी हां यह वही नरेंद्र मोदी जी हैं जिन्होंने 2014 के चुनावी रैलियों में चिल्ला चिल्ला कर विदेशों से काला धन वापस लाने का वादा किया था और प्रत्येक भारतवासियों के खाते में ₹15,000,00 (15 लाख) डलवाने का वादा किया था! पर हो क्या रहा है, काला धन वापस लाने की बात तो कोसों दूर वह तो उसके इज़ाफ़े की ओर ध्यान दे रहे हैं।
नीरव मोदी, विजय माल्या, मेहुल चौकसी, ललित मोदी इत्यादि जैसे बड़े उद्योगपति लोग देश को चूना लगा विदेशों में जाकर बस गए और सरकार उन्हें रोक ना पाई, या हो सकता है सत्ता में बैठे कुछ लोगों की मदद से यह सम्भव हुआ हो! अब जब काला धन बढ़कर ₹1.01 अरब/₹7000 करोड़ हो गया है तो, 2019 में मोदी जी से यह उम्मीद किया जा सकता है कि वह अपने भाषण में देने वाली अच्छे दिन की राशि भी बढ़ा देंगे और ₹30,000,00 कर देंगे और सोचेंगे कि जनता एक बार फिर से मूकदर्शक बनकर उन्हें वोट दे देश को लूटने के लिए छोड़ देगी!?
नहीं मोदी जी ऐसा बिल्कुल नहीं होगा, देशवासियों और पूर्व में रहीं सभी सरकारों ने हिंदुस्तान को बड़ी मेहनत और पसीने से सींच कर विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनाया है, और आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए संजोया है, और वह इसे बर्बाद होते कतई भी देख नहीं सकते। आपका तख्तापलट निश्चित तौर पर सुनिश्चित करेगी देश की जनता। और अच्छे दौर की सबसे बुरी सरकार के रूप में याद किया जाएगा आपको।