एक के बाद एक अपनी ही पार्टी के नेताओं के बगावती तेवर से परेशान भाजपा के लिये एक और परेशानी बढ़ाने वाली खबर सामने आई है. ख़बरों के मुताबिक़ नई दिल्ली में इंडिया डायलॉग कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वरुण गांधी ने मोदी सरकार को किसानों के मुद्दों पर घेरा है.

वरुण गांधी ने इण्डिया डायलॉग कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा

क्या आप यह जानते हैं कि साल 1952 से लेकर अब तक देश के 100 उद्योगपतियों को जितना पैसा दिया गया, उस रकम का केवल 17 फीसद धन ही केंद्र और राज्य सरकारों से किसानों को अबतक दी गई आर्थिक सहायता राशि के तौर पर मिला है. यानी देश की 70 फीसद आबादी को बीते 67 सालों में जितनी आर्थिक मदद राज्य और केंद्र सरकारों ने मिलकर दी है, उससे कई गुना ज्यादा पैसा केवल 100 धनी परिवारों को दे दिया गया. ऐसी स्थिति है और हम किसानों की बात करते हैं.

हमें सोचना होगा की देश के अंतिम आदमी को कैसे लाभ पहुंचाना है.’’ उन्होंने कहा, ‘’प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा गांव गोद लीजिए. हमने भी गांव गोद लिया. मगर हमने देखा कि आप सड़क बनाएं, पुलिया बनाएं, सोलर पैनल लगाएं. लेकिन फिर भी लोगों की आर्थिक स्थिति में बदलाव नहीं आता. यहां तक कि बच्चों के स्कूल जाने की संख्या में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं आता.

वरुण गांधी ने आगे कहा, ‘’अपने क्षेत्र के लिए हमने फिर आईआईटी बंगलोर के लोगों से बात की. उनसे कहा कि वो स्कूलों को आर्थिक केंद्र बनाएं. इसके बढ़िया परिणाम निकले. इलाके में होने वाले आंवले को हमने आधार बनाते हुए विभिन्न उत्पादों के निर्माण का तरीका निकाला. इसके बाद स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के संख्या बढ़ी, क्योंकि उन्हें पढ़ाई के साथ साथ आर्थिक लाभ भी मिल रहा था.

किसानों की ऐसी हालत क्यों है? इसे समझने के लिए मैं बताता हूं कि देश में होने वाले कुल फल उत्पादन का 56 प्रतिशत शुरुआती 96 घण्टे में अच्छी कोल्ड स्टोरेज व्यवस्था के अभाव में सड़ जाता है. अकेले उत्तर प्रदेश में हर साल 2000 टन उत्पादन होता है और यह बीते 15 साल से हो रहा है. मगर राज्य में कुल कोल्ड स्टोरेज भंडारण क्षमता 70 से 100 टन है जिसका फायदा केवल बड़े किसान ही उठा पाते हैं.

क्या आप जानते हैं कि भारत की मंडियों में किसानों के लिए अपने उत्पाद बेचने की खातिर इंतज़ार का औसत समय 1.6 दिन है. जब उसे इतना इंतज़ार करना पड़ता है तो वो कई बार मजबूरन अपना उत्पाद औने पौने दाम पर बेच देता है.’’  उन्होंने कहा, ‘’इसके अलावा देश में 1947 से बंटाईदारी अवैध है, लेकिन बिहार में 60 फीसद, झारखंड में 70%, यूपी में 50%, एमपी में 60% किसान बंटाई की ज़मीन पर खेती करते हैं और सीमांत किसान कहलाते हैं. उसे बैंकों से कर्ज नहीं मिलता और स्थानीय महाजन से उसको 40 फीसद की दर से कर्ज लेने की मजबूरी होती है. इसलिए किसानों के नाम पर आंसू मत बहाइए बल्कि रणनीतिक सुधार के काम करिए.