फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की अमर नज़्म ‘ हम देखेंगे ‘,  उनके द्वारा जेल में लिखी गयी थी। पाकिस्तान में ज़ियाउलहक़ की तानाशाही के खिलाफ यह फ़ैज़ की बगावत थी। ऐसी बगावतें पहले भी कलम के सिपाहियों ने की है, अब भी कर रहे हैं, और आगे भी करते रहेंगे। यह कोई खास बात नहीं है।
खास बात यह है कि आईआईटी कानपुर ने एक कमेटी का गठन किया है, जो यह तय करेगी कि यह नज़्म, हिंदू विरोधी है या नहीं। यह पैनल आईआईटी के एक प्रोफेसर की शिकायत पर गठित किया गया है। कोई कोई दौर ही मूढ़ता के सन्निपात से ग्रस्त हो जाता है। क्या यह दौर भी उसी का लाक्षणिक संकेत दे रहा है ?
सरकार में आपराधिक मानसिकता के और फ़र्ज़ीवाड़े करने वाले लोग बैठे हैं। न उन्हें अर्थनीति की समझ है, न देश के इतिहास, सभ्यता और संस्कृति और बहुलतावादी सोच की। हर निर्णय घृणावाद से प्रेरित है, श्रेष्ठतावाद से संक्रमित है। आज फ़ैज़ के कलाम की तफतीश हो रही है, कल भगत सिंह के भाषणों में धर्म ढूंढा जाएगा। फिर गांधी को दरकिनार करने की कोशिश की जाएगी । जब गुलामी पसंद मुखबिर राज करेंगे तो, मूढ़ता का यह सन्निपात बढ़ेगा ही, कम नहीं होगा।

नेशनल हेराल्ड के अनुसार,

” In a seemingly bizarre development, the IIT in Kanpur has set up a panel to decide whether the poem “Hum dekhenge lazim hai ki hum bhi dekhenge”, penned by Faiz Ahmad Faiz, is anti-Hindu. ”

आप यह प्रसिद्ध नज़्म यहां पढ़ सकते हैं,

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महक़ूमों के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और यही नज़्म इकबाल बानो की आवाज़ में  आप यहां सुन भी सकते हैं। जनरल जिया उल हक के शासनकाल में पाकिस्तान का इस्लामीकरण किया गया। वे सारे प्रतीक जो साझी विरासत और भारतीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करते थे का कट्टरपंथी तऱीके से इस्लामीकरण किया गया। इस्लाम धर्म के जो भी उदारवादी चिह्न थे को अरब के संस्कृति से जोड़ कर देखने की नयी फौजी कवायद शुरू की गयी। इसी क्रम में जिया ने साड़ी को गैर इस्लामी पहनावा घोषित कर दिया। तब इकबाल बानो ने काली साड़ी पहन कर लाहौर की सडकों पर फ़ैज़ की यह ओजस्वी नज़्म गायी थी।