जेएनयू के छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी ने जिस तरह से हिंसा फैलाई वो हम सभी के सामने है और यह भविष्य के लिए एक ख़तरनाक संकेत भी है। जो लोग यह सोच रहे हैं के एबीवीपी ने चुनाव जीतने के लिए ऐसा किया या एबीवीपी हार से बौखला गयी थी इसलिए ऐसा किया,तो वो लोग बहुत बड़े भ्रम में है, क्यों के एबीवीपी ऐसा कुछ नहीं चाहता था वो यह बहुत अच्छे से जानता था कि वो यह चुनाव कभी नहीं जीत सकता। इसलिए उसे हार की कोई भी बौखलाहट नहीं थी बल्कि वो अपनी रणनीति के तहत काम कर रहे थे जैसे के यह लोग पूरे देश मे हमेशा से करते रहे हैं,एबीवीपी को आपकी तरह वर्तमान की इतनी चिंता नहीं है उसे वर्तमान के साथ भविष्य की ज़्यादा चिंता है, वो सिर्फ़ वर्तमान को जीतने के लिए इतना हल्ला नहीं काट रहा है बल्कि भविष्य में आपको उखाड़ फेंकने की तैयारी में लगा है और जेएनयू छात्र संघ चुनाव में उसका रवैय्या इसी बड़ी तैयारी का छोटा सा हिस्सा है।

वो चाहते थे कि या तो वो चुनाव रद्द करा दें और अगर नहीं करा पाएं तो भी अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज करा दें कि उनसे लड़ने के लिए आप सबको अपनी पूरी ताकत झोंकनी पड़े, आप अपनी रणनीति से भटकें, वो चाहते थे के वो भय का माहौल पैदा कर दें ,वो चाहते थे कि आने वाले वक़्त में आम लोग उन्हें आपके मज़बूत प्रतिद्वंदी के रूप में देखें जबकि जेएनयू जैसे संस्थान में उनका कोई वुजूद नहीं है,जैसा जैसा वो चाहते थे वैसा वैसा वो करने में काफ़ी हद तक सफ़ल हो गए हैं। इसलिये वो हार के भी जीत गए हैं।

शहर में तेरी जीत से ज़्यादा चर्चे मेरी हार के हैं. साथियो आप सिर्फ़ संघ की विचारधारा को कोस कर ख़ुद को नहीं बचा सकते ,संघर्षों से पायी जीत पर आप निश्चिन्त नहीं हो सकते हैं कि आपका काम पूरा हो गया है. बल्कि लड़ाई अब शुरू हुई है, आपको उनकी रणनीतियों से लड़ना होगा,भविष्य के लिए उनकी तरह मेहनत करनी होगी निसंदेह आपके तरीके उनसे बिल्कुल अलग होंगे..पूरे देश मे संघ वहां वहां ज़रूर अटैक करेगा जहां जहां वाम है इसलिए वो जेएनयू में भी सेंध लगाएंगे क्यों के उनकी असल लड़ाई वाम से ही है. आपको ख़ुश होना चाहये के आप कम संख्या में होकर भी उनके लिए परेशानी का सबब हैं लेकिन आपको आत्ममुग्ध नहीं होना चाहये क्यों के अभी भी आपकी रणनीतियां उनसे बहुत कमजोर हैं।

अब यह आपको तय करना है कि आप समय रहते उनसे कैसे लड़ते हैं या फिर आपस मे ही लड़ते हैं..एक होकर ही उनसे लड़ा जा सकता है और समय एकता की मांग कर रहा है। यह लड़ाई अब वाम के अस्तित्व की है,अगर अभी न चेते तो वो दिन दूर नहीं जिसका सुनहरा ख़्वाब संघ देख रहा है और जिसके लिए वो लगातार मेहनत भी कर रहा है।