आप ने राज्यसभा के उम्मीदवार घोषित कर दिए है,उसको लेकर विवाद भी खड़े हो गए,बड़े बड़े लोग सामने आए और अपनी अपनी बात रखी लेकिन कही कोई कुछ भुल तो नही गया? अगर हम थोड़ा सा ध्यान लगाएं तो दिमाग मे आ जायेगा की हम क्या भूलें है।असल मे हम दिल्ली के मुस्लिमों को भूल गए है जिनकी बहुत बड़ी तादाद में से भी कोई एक ऐसा नेता केजरीवाल साहब को नही मिला जिसे वो राज्यसभा भेज देते। है न अजीब बात लेकिन किसके लिए?
राजधानी दिल्ली की अगर बात करें तो यहाँ के सबसे पिछड़ें इलाकों से लेकर बड़ी तादाद वाले वो इलाके है जहाँ मुस्लिम आबादी है,और अगर आम आदमी पार्टी के 2013 के चुनाव और 2015 के चुनाव की बात करें तो मुस्लिम आबादी ने बहुत बड़ी तादाद में आम आदमी पार्टी ला समर्थन किया था वोट किया था और यही वजह भी रही कि दिल्ली में चार मुस्लिम उम्मीदवार आम आदमी पार्टी से जीत कर विधानसभा पहुंचे।
इसी को आधार बनाये और गौर करें तो हर एक सीट पर लगभग 50 से 60 हज़ार तक कि तादाद में मुस्लिम वोट केजरीवाल साहब की पार्टी को मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर मिलें तो क्या ये वोट भी इस लायक नही थे की इस ईमानदारी को इसका आधार समझ लिया जाये? और वो भी तब जब इससे पहले परवेज़ हाशमी ही दिल्ली से राज्यसभा में है।
लेकिन नही जब बारी राज्यसभा की आयी तो केजरीवाल साहब को कोई भी मुस्लिम चेहरा इस लायक नही लगा जिसे वो राज्यसभा भेज सकें, और राजधानी दिल्ली से भी नही पूरे देश मे चुनाव लड़ चुकी “आप” को वहां भी ऐसा कोई उम्मीदवार नही मिला जिसे वो राज्यसभा भेज सकें,है न हैरत की बात की इतनी बड़ी आबादी को नज़रअंदाज़ किया गया जब पद की बात आई वोट के वक़्त ज़रूर याद रही।
असल मे केजरीवाल उन नेताओं में से एक है जो वक़्त वक़्त पर “इफ्तार” पार्टियों में जालीदार टोपियों को पहनकर इफ्तार करते हुए नज़र आ जातें है,और बहुत बड़ी तादाद में खर्च “मुशायरों” पर उनके बैनर्स के तले कार्यक्रम होते हुए नज़र आतें है लेकिन जब बात किसी बड़ी बात या कद की आती है तो वो भी चुप हो जातें है और चुप क्या हो जातें है कही कोई बात ही नही होती है।
तो आखिर में बात यही आ जाती है कि क्या केजरीवाल साहब भी मुस्लिमों समाज को “मुशायरों” और “इफ्तार पार्टी” तक महदूद करना चाहतें है? और किसी हद तक ऐसा है तो वो किस आधार पर मुस्लिम समाज से वोट मांगने के हकदार रह जातें है? “भाजपा आ जायगी” इस आधार पर? अगर ज़रा सा भी ऐसा है तो आप और कांग्रेस या अन्य दलों में कोई फर्क नही रह जाता है बाकी तो कोई कुछ बोल हीं कहा रहा है सब चुप ही है….

असद शेख