विचार स्तम्भ

फासिज्म लुभाता क्यो है?

फासिज्म लुभाता क्यो है?

तमाम फिल्मों, उपन्यासों में हम एक विलेन देखते है। जो निर्दयी, क्रूर और मदान्ध है। उसके हाथ मे पूरी ताकत है, पूरी फिल्म में वह हर अत्याचार करता है, आखरी के कुछ मिनटों में उसे किये की सजा मिलती है। उसे पिटते मरते देख हम खुश होते है। सत्य की जीत के साथ समापन करते है।

और असल जीवन मे उसी निर्दयी, क्रूर मदान्ध इंसान की पूजा करते हैं। उसका समर्थन गौरव, उसकी गलती माफ करना त्याग और उसका विरोध गद्दारी निरूपित करते हैं। क्यों, सोचा कभी.. ? हर इंसान की कई पहचान होती है,कई वफ़ादारियाँ होती है। उसका अपना परिवार है, अपना धर्म है,अपनी जाति है, अपना जॉब है, अपनी भाषा है, अपना देश हैं। इसमे से देश को छोड़, हर ग्रुप में उसकी निजी जान पहचान और नेटवर्क है।

राष्ट्र को छोड़ सारे समुच्चय उसके परिवार औऱ समाज की निजी अवधारणाओं से उपजे हैं। व्यक्ति को सबकी कमियां पता है। मगर उन कमियों के साथ भी वह उनके साथ खड़ा है। यह निजी जो है।

देश, अजनबियों का समुच्चय है। यहां दूसरी वफ़ादारियों के लोग भरे हैं। दूसरे परिवार, दूसरी जात, दूसरी भाषा, दूसरा धर्म, दूसरे देवता। ऐसे में राष्ट्र ऐसी अवधारणा है जिसे आत्मसात करने के लिए बहुधा उसे निजी वफ़ादारियाँ के विपरीत खड़ा होना पड़ता है।

यह बेहद काम्प्लेक्स सिचुएशन है। इनमे सामंजस्य बिठाना एक दैनिक झमेला है। इसके लिए बेहद प्रतिभा, बौद्धिकता, संवाद और खुले हृदय की जरूरत होती है। मन मारना पड़ता है, सहना पड़ता है। इसके बगैर राष्ट्र के प्रति आप वफादार नही हो सकते।

ऐसे में फासिज्म आपको सिम्पल समाधान देता है। वह बहुसंख्यक को चुनता है। उसके भय, नफरत, खीझ, महत्वाकांक्षाओं की पहचान करता है, उसे नारा बनाता है। वह बहुसंख्यक की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करता है, और राष्ट्र को उनका अड्डा निरूपित करता है। वह इतिहास के क्षण सलेक्ट करता है, (मनमाफिक न हों, तो गढ़ता है) वो क्षण जो आपकी कौम के गौरव हों, वो क्षण जो आपके अपमान को हाइलाइट करते हों। आपको पता चलता है कि आप तो सदा इन्विंसीबल थे। आपने जीते हासिल की बहादुरी से, आप अगर हारे तो धोखे से। आपने हमेशा दूसरों की इज्जत की, दूसरों ने हमेशा आपके पीठ में छुरा घोपा।

अपनी भीतरी कमियों को जानने के बावजूद इस फ्लेटरी, चापलूसी, और प्रशंसा के फंदे में फंस जाना इंसानी फितरत है। अब आप तैयार हैं एक राष्ट्र के बतौर अपना स्थान हासिल करने को। आप तैयार है इतिहास में आपको धोखा देने वालों से हिसाब करने को।

एकाएक आप अपने अंदरूनी अन्तर्द्वन्द्व से मुक्त हो जाते हैं। आपके सारी मूल पहचान मिट जाती है। आप खुद को श्रेष्ठ, देवतुल्य, दिग्विजयी, नरेंद्र महसूस करते हैं। आप जुड़ जाते हैं, विस्तारित हो जाते है। आप राष्ट्र बन जाते हैं राष्ट्रभक्त बन जाते हैं।

यह फ्लेटरी, झूठ, भय औऱ लोमहर्षक बातो की नियमित सप्लाई प्रोपगेंडा से होती है। यह रेडियों टीवी अखबार के सारे माध्यमों पर एकतरफा कब्जा करके सुनिश्चित होता है। जो इस भय, नफरत, फ्लेटरी और चापलूसी से सहमत नही, जिहोने आंखे खुली रखी है, जो नशे को इनकार कर रहे हैं, उन गद्दारों को निपटाना आपकी प्राथमिकता बन जाती है।

फासिज्म देश के बाहर के विरोधियों से अधिक देश के भीतर के गद्दारों पर फोकस करता है। यह विरोध के बचे खुचे क्लस्टर्स को नष्ट करने का तरीका है। आपकी आंख भी देश के गद्दारों को खोजने में सिद्धस्त हो चुकी है, तो आप भी इस सेना में शामिल हो चुके है। आप अपनी पुरानी पहचानें और वफ़ादारियाँ मिटा चुके है। तब राष्ट्र के लिए परिवार, भाई बन्धु, मित्र, काम धंधे, समृद्धि, जीवन सब कुछ खत्म कर सकते हैं। आप फासिस्ट हो चुके हैं।

फासिस्ट स्टेट प्रतिभाहीनों का स्वर्ग है। इसका निशान ही फरसा है, जो काटने को बना है। देश के भीतर, बाहर, हर ओर विरोध को काटना खत्म करना इसकी प्रवृति है। पर इसका हासिल क्या है? तात्कालिक हासिल ओलिगोर्की है। एक या कुछ लोगो के हाथ मे निष्कंटक सत्ता, पैसा, पावर, सबकुछ। उन्हें सबकुछ मिलेगा, हमे मिलेगा नशा।

शार्ट टर्म में वीरता का अहसास, ताल ठोकना, श्लाघा बघारना.. ठीक वैसा जैसे स्टेरॉयड की हैवी डोज से कोई फियरलेस होकर सबको गालियां देता फिरता है। अभी हम इस स्टेज में हैं। हमारा डंका बज रहा है, मुल्ले, पाकी, चीनी सब फ़टी में हैं। हम इस वक्त इन्विंसीबल हैं।

लॉन्ग टर्म में यह सत्यानाश है। ठीक वैसे ही जैसे लम्बे समय तक स्टेरॉयड की डोज, उम्र और स्वास्थ्य का नाश कर देती है। नशेबाज के शरीर का खोखला होना तय है, खत्म होना तय है।  नशा फटने पर फासिस्टों का घसीटा जाना भी तय है। ठीक वैसे ही जैसे हर फिल्म के अंत में विलेन का होता है। पर यह तीन घण्टे की फ़िल्म नही, हमारी जिंदगियां हैं।

फासिज्म की अधिकतम उम्र 20-25 साल देखी गयी है। इतने में तो जिंदगी के सुनहरे वर्ष खत्म हो जाते है। तो एक पूरी जिंदगी पहले फासिज्म को पालकर, झेलकर अंतिम दिनों में इसका अंत देखेंगे। पर हम सबकी जिंदगियों का यह हश्र लिखा जा चुका है। 1930-50 के दौर की तरह हम अभिशप्त पीढ़ी हैं। हमने ऐसा होना चुना है। दोष किसी नेता, सन्गठन, चैनल का नही।  इसलिए कि वो नही, हम फासिस्ट हैं

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Manish Singh