October 27, 2020

बांग्लादेश के कवि रफीक़ आज़ाद की एक कविता का शीर्षक है ‘भात दे हरामज़ादे’. रफीक़ की मूल बांग्ला कविता का हिंदी अनुवाद 1990 में ज्ञानरंजन की पत्रिका ‘पहल’ के 39वें अंक में प्रकाशित हुआ था. ‘पहल’ के उस खास अंक में पैंतालीस बाँग्लादेशीय कवियों की 103 कविताओं के साथ वहाँ के साहित्यकार बदरुद्दीन उमर के पाँच महत्वपूर्ण लेख शामिल हैं.
उस पूरे बांग्लादेशीय कविता-अंक के अनुवादक थे धनबाद के ही रहने वाले अमिताभ चक्रवर्ती. अगर विषयांतर न माना जाय तो अपने साथी अमिताभ के बारे में दो लाइनें. कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो के डेढ़ सौ साल पूरे होने के अवसर पर अमिताभ चक्रवर्ती ने एक विचारोत्तेजक आलेख लिखा था, जिसे ज्ञानरंजन ने पहल–61 के साथ विशेष पुस्तिका (लगभग 50 पृष्ठ) के रूप में जारी किया था. अमिताभ चक्रवर्ती एक होनहार कवि, चिंतक और कुशल अनुवादक थे. साहित्य-जगत को उनसे बेशुमार आशाएँ थीं, पर वे मात्र सैंतालीस वर्ष की आयु में सितंबर, 2000 में दुनिया छोड़ गए.
रफीक़ आज़ाद की यह कविता मुझे तब से बेतरह याद आ रही थी, जब से झारखंड की एक बच्ची भूख की बीमारी (कलेक्टर ने जिसे मलेरिया का दूसरा नाम दे रखा है) से भात मांगते हुए मृत्यु का ग्रास बनी थी. कविता मिलने में थोड़ी सी देर हुई, क्योंकि ‘पहल’ का वह अंक गर्द व गुबार में लिपटा किसी आलमारी में बंद था, जिसे आज दीपावली के दिन मैंने खोज निकाला.  भात-भात चिल्लाते हुए मरने वाली झारखंड की उस बच्ची और अमिताभ चक्रवर्ती की स्मृति में समर्पित है यह ‘भात दे हरामज़ादे’ नाम की अद्भुत कविता.

बहुत भूखा हूँ, पेट के भीतर लगी है आग, शरीर की समस्त क्रियायों से ऊपर
अनुभूत हो रही है हर क्षण सर्वग्रासी भूख, अनावृष्टि जिस तरह
चैत के खेतों में, फैलाती है तपन
उसी तरह भूख की ज्वाला से, जल रही है देह

दोनों शाम, दो मुट्ठी मिले भात तो
और माँग नहीं है, लोग तो बहुत कुछ माँग रहे हैं
बाड़ी, गाड़ी, पैसा किसी को चाहिए यश,
मेरी माँग बहुत छोटी है

जल रहा है पेट, मुझे भात चाहिए
ठंडा हो या गरम, महीन हो या मोटा
राशन का लाल चावल, वह भी चलेगा
थाल भरकर चाहिए, दोनों शाम दो मुट्ठी मिले तो
छोड़ सकता हूँ अन्य सभी माँगें

अतिरिक्त लोभ नहीं है, यौन क्षुधा भी नहीं है
नहीं चाहिए, नाभि के नीचे की साड़ी
साड़ी में लिपटी गुड़िया, जिसे चाहिए उसे दे दो
याद रखो, मुझे उसकी ज़रूरत नहीं है

नहीं मिटा सकते यदि मेरी यह छोटी माँग,तो तुम्हारे संपूर्ण राज्य में
मचा दूँगा उथल-पुथल, भूखों के लिए नहीं होते हित-अहित, न्याय-अन्याय

सामने जो कुछ मिलेगा, निगलता चला जाऊँगा निर्विचार
कुछ भी नहीं छोड़ूँगा शेष, यदि तुम भी मिल गए सामने
राक्षसी मेरी भूख के लिए, बन जाओगे उपादेय आहार

सर्वग्रासी हो उठे यदि सामान्य भूख, तो परिणाम भयावह होते है याद रखना

दृश्य से द्रष्टा तक की  धारावाहिकता को खाने के बाद
क्रमश: खाऊँगा,पेड़-पौधे, नदी-नाले
गाँव-कस्बे, फुटपाथ-रास्ते, पथचारी, नितंब-प्रधान नारी
झंडे के साथ खाद्यमंत्री, मंत्री की गाड़ी

मेरी भूख की ज्वाला से कोई नहीं बचेगा,
भात दे हरामजादे, नहीं तो खा जाऊँगा तेरा मानचित्र.

(रफीक़ आज़ाद (जन्म- 1941, गुणी, टंगाइल, बांग्लादेश. मृत्यु- 2016.)
यह कविता यूट्यूब पर मूल बांग्ला में उपलब्ध है

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Narayan Singh

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