October 26, 2020
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सीबीआई नहीं साबित कर पाई 2G घोटाला, सभी आरोपी बरी

सीबीआई नहीं साबित कर पाई 2G घोटाला, सभी आरोपी बरी

Upa के दौर में सर्वाधिक चर्चित घोटाला 2G scam का फैसला कोर्ट ने सुना दिया. इस घोटाले के वजह से तात्कालिक सरकार की की काफी किरकिरी हुई थी. कोर्ट ने तीन मामलों की सुनवाई की है, जिसमें दो सीबीआई और एक प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का है. दूरसंचार मंत्री ए राजा और डीएमके राज्यसभा सांसद कनिमोई समेत कई हाई-प्रोफाइल आरोपियों वाले 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले पर पटियाला हाउस कोर्ट की विशेष सीबीआई अदालत ने अपना फैसला सुनाया है.
ए-राजा और कनिमोई पर क्या थे आरोप?
ए राजा : पूर्व केंद्रीय दूर संचार मंत्री और द्रमुक नेता पर आरोप था कि इन्होंने नियम कायदों को दरकिनार कर 2 जी स्पेक्ट्रम की नीलामी षडयंत्र पूर्वक की और उन्होंने साल 2001 में तय की गई दरों पर स्पेक्ट्रम बेच दिया जिसमें उनकी पसंदीदा कंपनियों को तरजीह दी गई. सीबीआई के अनुसार, इन्होंने 2008 में साल 2001 में तय की गई दरों पर स्पेक्ट्रम बेच दिया. इसके आलावा राजा पर यह भी आरोप है कि उन्होंने अपनी पसंदीदा कंपनियों को पैसे लेकर गलत ढंग से स्पेक्ट्रम आवंटित कर दिया.
कनिमोझी : द्रमुक सुप्रीमो एम करुणानिधि की यह बेटी राज्यसभा सदस्य. और इन पर राजा के साथ मिलकर काम करने का आरोप था. इन पर आरोप था कि इन्होंने अपने टीवी चैनल के लिए 200 करोड़ रुपयों की रिश्वत डीबी रियलटी के मालिक शाहिद बलवा से ली बदले में उनकी कंपनियों को ए राजा ने गलत ढंग से स्पेक्ट्रम दिलाया.
क्या है फैसला?
कोर्ट में एक लाइन में फैसला सुनाते हुए

  • 2जी घोटाले के एक मामले में ए राजा और कनिमोझी को बरी कर दिया गया है, बाकी के भी सभी आरोपियों को भी बरी कर दिया गया है.
  • ए राजा वाले केस में कोर्ट ने तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा और डीएमके सांसद कनिमोझी समेत सभी आऱोपियों को बरी कर दिया है.
  • ए राजा वाला मामला वही पहला मामला है जिसमें 176,000 करोड़ के घोटाले की बात सामने आई थी. कोर्ट का कहना है कि सीबीआई आरोपियों के खिलाफ मालमा साबित नहीं कर पाई. अभी दो मामलों का फैसला आना बाकी है.

क्या था पूरा मामला?
2 जी घोटाला साल 2010 में चर्चा में आया था, जब भारत के CAG ने अपनी एक रिपोर्ट में साल 2008 में किए गए स्पेक्ट्रम आवंटन पर सवाल खड़े किए. 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कंपनियों को नीलामी की बजाए पहले आओ और पहले पाओ की नीति पर लाइसेंस दिए गए थे, जिसमें भारत के महालेखाकार और नियंत्रक के अनुसार सरकारी खजाने को एक लाख 76 हजार करोड़ रूपयों का नुकसान हुआ था. आरोप था कि इस धांधली की बजाय अगर लाइसेंस नीलामी के आधार पर होते तो खजाने को कम से कम एक लाख 76 हजार करोड़ रूपयों और प्राप्त हो सकते थे.

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Ashok Pilania

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