विचार स्तम्भ

संविधान की प्रस्तावना और वर्तमान भारतीय समाज

संविधान की प्रस्तावना और वर्तमान भारतीय समाज

“हम भारत के लोग भारत को एक संप्रभु , समाजवादी,धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतंत्र में विधिवत तौर पर गठित करने का संकल्प करते है और इसके सभी नागरिकों के लिए न्याय समाजिक,आर्थिक और राजनीतिक, स्वतन्त्रता-विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, निष्ठा तथा पूजा की समानता स्तर तथा अवसर को सुनिश्चित करना और सभी नागरिकों के बीच प्रोत्साहित करना भ्रातत्व तथा व्यक्तिगत गरिमा को सुनिश्चित करना और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता को बनाये रखना ” ये संविधान की प्रस्तावना है जहां पर तमाम भारतीयों को बराबरी का दर्जा देकर संविधान धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणतंत्र की बात करता है,यहां पर ज़रूरत इस बात कि है कि क्या ऐसा हो रहा है? क्या “हम” ऐसा कर रहें है?
क्या हमारे राजनेता ऐसा कर रहें है? क्यों नही कर रहें है ? इस बात को कई बार सोचिये की ऐसा क्यों है? क्या वजह है कि भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में राजनेता “धर्म” को बीच मे ले आतें रहें है? और इससे भी शर्मनाक बात ये है कि उनका ये फॉर्मूला “हिट” होता रहा है,क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल इसका अपवाद नही है ।
“दूसरी अहम बात राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाये रखना”, कही पर भी किसी की हत्या कर देना और उस पर बहसें होना और वो भी धर्म के नाम पर,ज़हरीले भाषण,धमकियां और ये सब किसलिए? महज़ “वोटों” के लिए? क्या कुछ देर ये सोचने वाली बात नज़र नही आती है की ये क्या हो रहा है कि सीधा सीधा संविधान पर चोट हो रही है मगर कोई भी राजनीतिक दल इस तरफ गौर करने के लिए भी तैयार नही है? वो भी क्यों महज़ “वोटों” के लिये ?
“विश्वास,व्यक्तिगत गरिमा” क्या ये दोनों बची हुई भी है? क्या हाल ही में सम्पन्न हुए चुनाव, या पिछले चुनाव या आम माहौल में भी किसी की भी गरिमा को ध्यान में रखा जाता है? नही रखा जाता है वो भी सिर्फ इसलिए कि बात को थोड़ा उत्तेजक किया जाये,बात को थोड़ा चर्चा में किया जायें? और इसके बाद “भीड़” तैयार करते हुए “वोट” की शक्ल में अपना लेना,क्या ये उचित है ? क्या ये व्यक्तिगत गरिमा के साथ खिलवाड़ नही है?
अब बिना किसी वैचारिक बात,मतभेद,आरोप और प्रत्यारोप को हटाकर सोचिये हम किस तरफ जा रहें है,किस हद तक जा रहें है और वो भी महज़ “सियासत” के लिए “धर्म” के लिए क्या ये अपने ही देश के भविष्य साथ मज़ाक सा नही लगता है ? रुकिए,ठहरिए और सोचिये की “संविधान” के इन महत्वपूर्ण बिंदुओं की हमे कितनी ज़रूरत है लेकिन हम है कि उसी के खिलाफ खड़े है…. ये अहम सवाल है सभी से.

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Asad Shaikh

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