दिल्ली विधानसभा 2020 के चुनाव खत्म हो गये और जैसी उम्मीद की जा रही थी, अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने शानदार सफलता अर्जित की। यह चुनाव भाजपा के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न था। कई राज्यों के मुख्यमंत्री, ढेर सारे सांसदों और अनेक मंत्रियों ने प्रत्यक्ष रूप से चुनाव प्रचार में भाग लिया। नरेंद्र मोदी की दो रैलियां हुयी। महाबली और चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह ने घर घर पर्चे बांटे। भाजपा चुनाव प्रचार को पहले भी एक मिशन की तरह लेती रही है और इस चुनाव मे भी उसने अपने कॉरपोरेटनुमा मार्केटिंग टाइप प्रचार कला का खुल कर प्रदर्शन किया। लेकिन वह इकाई अंक पर 2015 के बाद पुनः एक बार और सिमट गयी। यह भाजपा के लिए करेंट के शॉक जैसा ही है।

दिल्ली चुनाव के संदर्भ में अमित शाह ने एक चुनावी सभा में कहा था, “दिल्ली चुनाव, दो विचारधाराओ की लड़ाई है। ” सच ही कहा था उन्होंने। एक तरफ झूठ, नफरत, विभाजनकारी औऱ दुष्प्रचार को पोषित करने वाली विचारधारा थी। दूसरी तरफ, जनता के असल मुद्दों रोजी रोटी शिक्षा स्वास्थ्य से सरोकार रखने वाली और संविधान के प्रति समर्पित विचारधारा है।

नफरत, घृणा सदैव पराजित होती आयी है। फेन की तरह उफनाती ज़रूर है पर जैसे उन्माद किसी का भी स्थायी भाव नहीं होता है, उसी प्रकार लगातार घृणा से आवृत होकर भी कोई नहीं रह सकता है। सरकारें जनहित में लोककल्याणकारी कार्य के लिये चुनी जाती है न कि लोगों को भड़काने, बरगलाने, गोली मरवाने, डरने का उपदेश देने या डराने के लिये चुनी जाती है।

जनता से जुड़े विकास और रोजी रोटी शिक्षा स्वास्थ्य आदि के मुद्दे उठाइये और राजनीतिक दलों को इन्ही मुद्दों पर घेर कर लेते आइये, ताकि देश एक समृद्ध और आर्थिक ताक़त बन सके। आर्थिक विपन्नता की ओर बढ़ता देश एक मजबूत राष्ट्र हो ही नहीं सकता है। जनता ने जन सरोकार की विचारधारा को चुना है। यह एक परिपक्व जनादेश है।

धर्म पर आधारित राष्ट्रवाद और उन्मादित राष्ट्रवाद, जिसे अंग्रेजी में जिंगोइज़्म कहते हैं वह अंततः देश को ही तोड़ता है और समाज को बिखेर देता है। इतिहास में इसके अनेक उदाहरण मिल जाएंगे।

हनुमानजी भी इस चुनाव में सामने आए। हनुमानजी हर उस युद्ध मे शामिल हो जाते हैं जो घृणा, अहंकार और ज्यादती के विरुद्ध होता है। महाभारत के युद्ध मे भी वे अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान थे। हनुमान जी, सच्चे रामभक्त हैं। राम की हर गाढ़े समय पर उन्होने सहायता की है। चाहे माता सीता की खोज करनी हो या सुषेण के प्रेस्क्रिप्शन पर संजीवनी बूटी लानी हो। इधर कुछ फ़र्ज़ी और गुंडे, जो राम का नाम लेकर अनर्थ कर रहे हैं, और अराजकता फैला रहे हैं , हनुमान की गदा अब उन्हीं की ओर है। उनसे यही आग्रह है कि, अब भी सुधर जाइये और राम का नाम लेकर रामद्रोही कृत्य न कीजिए।

दिल्ली सरकार की कुछ कल्याणकारी योजनाएं भी भाजपा और उसके समर्थक लोगों और सरकार के जनसंपर्क उपकरण बन चुके कुछ टीवी चैनलों के निशाने पर थीं और अब भी हैं। कुछ अखबारों औऱ चैनलों के लिय आजकल का सबसे पसंदीदा मुहावरा है फ्रीबी। फ्रीबी माने सरकार से मुफ्त सुविधाएं लेने वाला समाज। कॉरपोरेट के अरबों रुपये माफ हो जांय तो इन्हें, उनकी इस मुफ्तखोरी पर कोई मलाल नहीं होता है, यह उन्हें विकास का होना दिखता है और किसी कम आय वाले सामान्य नागरिक के 200 यूनिट के बिजली के पैसे बच जांय, सस्ते में उनके बच्चे पढ़ लें, सस्ता इलाज पा जाय, उनकी महिलाएं मुफ्त में एक ही शहर में किसी काम या बिना काम के ही थोड़ा बस से घूम फिर आएं तो इन्हें मुफ्तखोरी लगती हैं। यह ओढ़ी नैतिकता का पाखण्ड है।

सरकार का काम क्या केवल धर्म जाति और क्षेत्रों में बांटना और समाज को आपस मे लड़ा देना ही है ? यह सब जो तथाकथित एलीट क्लास के लोग, आम जनता को फ्रीबी और मुफ्तखोर कह रहे है, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि यह सब सुविधाएं देना, सरकार का दायित्व है और हम नागरिको का अधिकार।  सरकारें इसी लिये चुनी गयी हैं, न कि सब कुछ बेचबाच कर के क्रोनोलॉजी समझाने के लिये। यह सब राहतें सरकार कैसे दे, किन्हें दे, और कैसे इसे सुगमता से मैनेज करे, यह दायित्व और निपुणता भी सरकार की जिम्मेदारी है। यह सरकार या सरकार के मुखिया का हम भारत के लोगो पर कोई  एहसान नहीं है।

फिर भी जिन्हें लगता है यह मुफ्तखोरी एक पाप है और वे इसे चिमटे से भी छूना नहीं चाहते वे दिल्ली सरकार की 200 यूनिट मुफ्त बिजली, महिलाओं के लिये फ्री बस पास, और अन्य जो, राज्यों और केंद्र की सरकारी योजनाएं उन्हें मुफ्तखोरी लगती हैं, का स्वतः शुल्क जमा कर के मुफ्तखोर के टैग से बच सकते हैं। दिल्ली सरकार को चाहिए कि ऐसा विकल्प भी दें कि जो स्वेच्छा से इसे न लेना चाहें वे न लें और जो धन बचे उससे वे और बेहतर जनहित के काम करें। सरकार को चाहिए कि, आगे भी ऐसी ही लोककल्याणकारी योजनाओं को वह जारी रखें।

यह लगातार सातवाँ राज्य है जहां भाजपा चुनाव हार चुकी है। अब हाल में बिहार, असम और पश्चिम बंगाल के राज्य हैं। अगर भाजपा ने अपनी घृणा, विभाजनकारी और साम्प्रदायिक धुरी पर केंद्रित राजनीति और चुनाव प्रचार का कॉरपोरेट केंद्रित शैली नहीं छोड़ी तो इसका इन तीनों राज्यों में हारना तय है।

© विजय शंकर सिंह