31 जुलाई 2018 को एनआरसी, नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स की ड्राफ्ट रिपोर्ट प्रस्तुत हो गयी है। इस ड्राफ्ट रिपोर्ट के अनुसार लगभग 40 लाख लोगों की नागरिकता संदिग्ध है। ये वे लोग हैं जिनके नागरिकता के बारे में कोई सुबूत सरकार को नहीं मिले हैं। लेकिन यह एक ड्राफ्ट रिपोर्ट है, यह किसी की नागरिकता पर कोई अंतिम निर्णय नहीं है। लेकिन सोशल मीडिया पर जो शोर शराबा मचा हुआ है उससे यह लगता है कि ये सभी 40 लाख लोग भारत के नागरिक नहीं रहे और सरकार उन सबको कल ही  पहली बस से उन्हें वहीं भेज देगी जहां से वे घुसपैठ करके आ गए थे । इस हंगामे से थोड़ा हट कर आसाम की मूल समस्या की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर भी थोड़ी नज़र डाल लेनी चाहिये।

1947 के पहले जब भारत के बंटवारे की बात चल रही थी, तो मुस्लिम लीग की नज़र बंगाल, और आसाम पर भी थी। वह पूर्व में पूरा बंगाल और आसाम पाकिस्तान के पूर्वी भाग के रूप में चाहती थी। लेकिन जब बाउंड्री कमीशन ने पूर्व में पाकिस्तान की सीमा तय की तो, उसने बंगाल का दो तिहाई भाग और आसाम का उससे जुड़ा भाग थोड़ा भाग पूर्वी पाकिस्तान को दे दिया। हालांकि बाउंड्री कमीशन ने सीमा तय करने में पश्चिम और पूर्व दोनों ही भागो में काफी गलतियां की थी।

बाउंड्री कमीशन के अध्यक्ष रेडक्लिफ को भारत की बहुत जानकारी भी नहीं थी और न ही उन्हें इतना समय मिला कि वे बहुत सोच समझ कर सीमा तय करते। उसने धर्म को आधार तो बनाया पर कुछ स्थानों पर यह आधार भी तर्क सम्मत नहीं रहा। उदाहरण के लिये, चटगाँव और सिंध के कुछ इलाके जो हिन्दू बाहुल्य थे, लाहौर का शहर जो 80 प्रतिशत हिन्दू आबादी का था वह पाकिस्तान में चला गया। लेकिन इन गलतियों पर किसी को भी सवाल उठाने का अवसर ही नहीं मिला, क्यों कि अंतिम समय तक यह सीमा निर्धारण गोपनीय रहा, और जब अचानक सच का जिन्न बाहर आया तो जो हुआ वह सबको पता है।

1947 से 1965 तक भारत की सीमा बंदी बहुत गम्भीरता से नहीं की जाती थी। लोग सीमा पार कर आते जाते रहते थे। इसका कारण लोगो का आपसी लगाव और रिश्तेदारियां थीं तथा देश ताज़ा ताज़ा बंटा भी था, तो कोई बहुत रोक टोक भी इस आवागमन पर नहीं रही। 1965 के युद्ध के बाद जब पाकिस्तान की पराजय हुयी तब सीमा पर सरगर्मी भी बढ़ी। 1966 में सीमा सुरक्षा बल का गठन हुआ जिसके जिम्मे भारत पाक की सीमा निगरानी का काम सौंपा गया। 1971 में पुनः भारत पाक युद्ध हुआ, जिसके कारण बांग्लादेश का जन्म हुआ।

इस युद्ध का कारण ही पूर्वी पाकिस्तान का पश्चिमी पाकिस्तान का वर्चस्व और दादागिरी थी। बांग्ला अस्मिता, भाषा, संस्कृति को लेकर जो आंदोलन अवामी लीग ने शुरू किया था, उसका असर जब पूर्वी पाकिस्तान में होने लगा तो वहां जनरल टिक्का खान के नेतृत्व में पाक सेना ने दमन भी शुरू कर हुआ। दमन के फलस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान से लोग भाग कर पश्चिम बंगाल और असम के हिस्सों में आये। अंत मे जब यह शरणार्थी समस्या विकट हो गयी तो भारत को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिसका परिणाम युद्ध हुआ और बांग्लादेश का उदय हुआ।

उस समय जो शरणार्थी आ कर बस गए थे, उन्हें बांग्लादेश बनने के बाद वापस भेजा तो गया पर उनमें से कुछ वापस नहीं गए असम और बंगाल में बस गए। असम में इन शरणार्थियों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया बंगाली और असमियाँ का। जो बंगाली भारतीय बंगाल से गये थे उनपर भी बांग्लादेशी होने का आरोप लगा और असम में धरती पुत्र सन ऑफ स्वायल के सिद्धांत की बात होने लगी, परिणामस्वरूप बंगाली और असामियों में भाषायी दंगे हुए। ऐसा भी नहीं है कि ये दंगे केवल बंगालियों के ही विरुद्ध हुए हों बल्कि ये हिंदी भाषियों के विरुद्ध भी हुए जिन्हें स्थानीय लोग बिहारी कहते हैं।

आसाम में आल आसाम स्टूडेंट्स यूनियन और असम गण परिषद का गठन हुआ जिसने बांग्लादेशी लोगों के भारी संख्या में असम में आ जाने को मुद्दा बना कर एक व्यापक आंदोलन किया । प्रफुल्ल कुमार महंत और भृगु फुकन उस आंदोलन के शीर्ष नेता बने। बाद में असम गण परिषद के नाम से एक राजनीतिक दल बना, जिसने चुनाव लड़ कर जीत हासिल की। प्रफुल्ल महंत आसाम के मुख्यमंत्री भी बने।

1980 में इस मामले पर असम में जो व्यापक आंदोलन हुआ था वह हिंसक भी था, जिसके कारण यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ आसाम ULFA उल्फा जैसा आतंकी संगठन भी पैदा हुआ।1985 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो आसाम की इस जटिल समस्या का समाधान करने के लिये उन्होंने आसाम के आंदोलनकारी नेताओं से समझौता किया जिसे आसाम समझौता कहा गया। उस समझौते में इस समस्या को पहचान कर इसके निदान की बात की गयी थी।

आसाम और बंगाल के समाज और भाषायी समता भी बहुत है। 1947 के पहले का अविभाजित बंगाल का नक्शा देखिये, बंगीय भाषा और संस्कृति बिहार से लेकर म्यांमार की सीमा तक फैली हुयी है। असम जो कभी अहोम कहा जाता था, महाभारत काल मे एक दूरस्थ आटविक राज्य था। जब अंग्रेज़ों ने 1757 में प्लासी की जीत के बाद बंगाल की दीवानी ली, तो वह केवल बंगाल की ही दीवानी नहीं थी, बल्कि वह बंगाल बिहार और उड़ीसा की दीवानी थी। बंगाल के पार त्रिपुरा और मणिपुर के राज्य थे, तथा आसाम उतना बसा भी नहीं था, जितना आज है।

जब अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने अपर आसाम के इलाकों में चाय के बगान लगाए और आसाम को अपने नियंत्रण में लिया तो भारी संख्या में बंगाली आबादी आसाम की ओर गयी। बंगाल में खास कर पूर्वी बंगाल में मुस्लिम आबादी अधिक थी जो आसाम के निचले क्षेत्रों में फैली थी। आसाम के पूर्व में नागालैंड, मिज़ोरम, आदि इलाके जनजातियों के थे, जो बाद में ईसाई मिशनरियों की धर्म परिवर्तन की गतिविधियों के कारण ईसाई बन गए। असमियाँ समाज का बंग समाज के साथ जो शताब्दियों पुराना तालमेल रहा उस कारण भी अवैध बांग्लादेशी ढूंढने में एक बड़ी समस्या रही है।

बंटवारे के बाद सीमा निर्धारण, किसी प्रकार की प्राकृतिक सीमा का अभाव, नदियों के बिछे जाल और साझी भाषा, रीति रिवाज , खान पान की आदतों के कारण यह जानना भी मुश्किल रहा कि कौन किधर से आया और कहां बस गया। रही सही कसर 1971 के भारत पाक युद्ध ने पूरी कर दी, जब भारी संख्या में शरणार्थियों के साथ अवैध लोग भी आसाम बंगाल में घुस कर धीरे धीरे दिल्ली तक फैल गए।

असम समझौते के अनुसार

  • 1951से 1961 के बीच, कहीं से भी असम आये सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार देने का निर्णय हुआ ।
  • 1971 के बाद असम में आये लोगों को वापस भेजने पर सहमति बनी ।
  • 1961 से 1971 के बीच आने वाले लोगों को नागरिकता और दूसरे अधिकार जरुर दिए गए लेकिन उन्हें वोट का अधिकार नहीं दिया गया.
  • असम के आर्थिक विकास के लिए पैकेज की भी घोषणा की गई और यहाँ oil refinery, paper-mill और तकनीकी संस्थान स्थापित करने का फैसला किया गया.
  • असमिया भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय किये जायेंगे. यह वादा भी केंद्र सरकार द्वारा किया गया।

असम समझौते के इन विन्दुओं के आधार पर मतदाता सूची में संशोधन किया गया। विधान सभा को भंग करके 1985 में चुनाव कराये गए जिसमें नवगठित असम गणपरिषद् को बहुमत मिला और ऑल आसाम स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत को मुख्यमंत्री बनाया गया। असम समझौते के बाद राज्य में शांति बहाली तो हुई लेकिन यह असल मायने में अमल नहीं हो पाया।  इस बीच बोडोलैण्ड आन्दोलन और अलग राष्ट्र के लिए उल्फा (United Liberation Front of Assam) की सक्रियता से कई हिंसक आन्दोलन चलते लगे। 2013 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

आसाम में एनआरसी के पहले भी द इल्लीगल माइग्रान्ट ( डिटेक्शन बाय ट्रिब्यूनल ) एक्ट और फॉरेन ट्रिब्यूनल जैसे कानूनों और संस्थाओं द्वारा विदेशी नागरिकों की पहचान कर के उन्हें वापस उनके देश भेजने की प्रक्रिया चल रही थी। एनआरसी उसी प्रक्रिया का एक बृहद रूप है।

आसाम समझौते के इस विंदु कि 24 मार्च 1971 के बाद आसाम में जो भी बांग्लादेशी आये हैं उनकी पहचान कर के उन्हें वापस लौटा दिया जाएगा पर कार्यवाही शुरू हुयी। एक आंकड़े के अनुसार 2012 तक कुल 2442 लोगों को वापस भेजा गया है। लेकिन उसीआंकड़े के अनुसार कुल 54,000 विदेशी नागरिक हैं जो आसाम में रह रहे हैं। लेकिन वास्तविक संख्या इनसे कहीं अधिक थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि ज़मीनी धरातल पर छानबीन बहुत गम्भीरता से नहीं की गयी है परिणाम स्वरूप सही आंकड़े नहीं मिल पा रहे हैं।

अब जरा आसाम के जनसँख्या के पैटर्न को देखा जाय तो पता लगता है कि 1971 की जनगणना में आसाम की जनसंख्या वृद्धि की दर राष्ट्रीय जनसंख्या वृद्धि की दर से कहीं अधिक है। लेकिन 1971 से लेकर 2011 तक यह वृद्धि दर कम है। 1981 में आसाम में जनगणना नहीं हो पायी थी क्योंकि उस समय आसाम की स्थिति अशांत थी और गांव गांव घूम कर जनगणना कार्य करना संभव नहीं था।

अगर 1981 की जनगणना को छोड़ कर 1971 से 1991 तक की जनगणना वृद्धि दर का अध्ययन करें तो उक्त अवधि में आसाम की जनगणना वृद्धि दर राष्ट्रीय जनगणना वृद्धि दर से कम रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अवैध आव्रजन 1971 के बाद घटा है। जनगणना के आंकड़ो को देखें तो यह पता चलता है कि 1951 से 1971 तक असम और पश्चिम बंगाल की जनगणना वृद्धिदर राष्ट्रीय जनगणना वृद्धिदर से कहीं अधिक रही है। इसमें कोई संशय नहीं है बंगाल और आसाम में बांग्लादेश से अवैध आव्रजन 1947 के बाद बराबर, कभी कम तो कभी अधिक होता रहा है।

इसका सबसे बड़ा कारण सीमा पर उतनी सख्ती और चौकसी नहीं रही है जितनी होनी चाहिये। लेकिन 1971 के बाद यह वृद्धिदर कम हो गयी है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि 1971 के बाद आसाम की जनगणना वृद्धिदर में स्थिरता आ गयी। इससे यह स्पष्ट होता है कि अधिकतम अवैध आव्रजन 1971 तक हुआ है, पर छिटपुट घुसपैठ बाद में भी जारी रही।

2013 में जो याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी थी, के बारे में 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने घुसपैठ के खिलाफ एक निर्णय दिया कि एनआरसी को अद्यावधि किया जाय। यह कोई नयी एसआरसी नहीं बल्कि 1951 से ही गठित एनआरसी को अद्यावधि करने का निर्णय था। इसके लिये 25 मार्च 1971 की तिथि कट ऑफ तिथि रखी गयी। इसके बाद जो भी व्यक्ति आने वाले हैं उन्हें डी वोटर, डाउटफुल वोटर की श्रेणी में रखा जाय। जब एनआरसी का पहला ड्राफ्ट तैयार किया गया तो तब भी आसाम में असन्तोष हुआ था। लेकिन आसाम सरकार ने यह आश्वासन दिया कि किसी वैध नागरिक को चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है।

31 जुलाई 18 को एनआरसी का दूसरा और अंतिम ड्राफ्ट जारी किया गया। जैसी की उम्मीद थी, इसका असर संसद से लेकर सोशल मीडिया तक हुआ। इस ड्राफ्ट में 2 करोड़ 90 लाख नागरिकों के नाम हैं। यह ड्राफ्ट भारत सरकार के रजिस्ट्रार जनरल के सहयोग और सुप्रीम कोर्ट के सीधे पर्यवेक्षण में सम्पन्न किया गया। यह न तो केंद सरकार का फैसला है और न ही राज्य सरकार की पहल है। असम गण परिषद की पूरी राजनीति ही इस अवैध आव्रजन पर आधारित है।

एनआरसी का पहला ड्राफ्ट जिसमे एक करोड़ 90 लाख नागरिकों के नाम थे, जब कि दूसरे और अंतिम ड्राफ्ट में 3 लाख 29 हज़ार नागरिकों के नाम आएं । इस काम मे केंद्र और राज्य सरकार के पचपन हज़ार कर्मचारियों ने भाग लिया। अब जब यह ड्राफ्ट जारी हो गया तो, जिनके नाम नहीं आये हैं वे चिंतित हुये। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस ड्राफ्ट के आधार पर किसी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जाय।

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि जिनके नाम नहीं है उन्हें अवैध निवासी मान लिया जाएगा। सरकार के अनुसार जिनके नाम इस सूची में नहीं है उन्हें एक फॉर्म भर के अपनी नागरिकता का प्रमाण देना होगा। उसके बाद भी उन्हें अपना पक्ष रखने के लिये फॉरेन ट्रिब्यूनल में अपील और फिर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय का विकल्प तो उन्हें है ही। सरकार ने टोल फ्री नम्बर के साथ साथ, एनआरसी सेवा केंद्र एनएसके का भी गठन नागरीको की सुविधा के लिये किया है। इन केंद्रों में उक्त फॉर्म भरने और समस्त औपचारिकताओं को पूरा कराने के लिये भी पर्याप्त प्रबंध किया गया है। इस ड्राफ्ट में जिनके नाम नहीं आये हैं, उनको यह प्रमाणित करना पड़ेगा कि वे 25 मार्च 1971 के पूर्व से आसाम में रह रहे हैं।

इस ड्राफ्ट के आधार पर किसी के नागरिक अधिकारों पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ने जा रहा है। अभी इस ड्राफ्ट में भी खामियां मिल रही हैं। पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद जो आसाम के ही निवासी हैं और 1957 में आसाम विधानसभा के सदस्य और आसाम के महाधिवक्ता भी रहे हैं के परिवार के लोगों का नाम इस सूची में नहीं है। एक भाजपा विधायक का भी नाम सूची से गायब है। निश्चित रूप से इतनी बड़ी सूची तैयार करते समय कुछ गलतियां हो जाती हैं। इसी लिये आवेदन और अपील का प्राविधान रखा गया है। इस सूची में हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही हैं। अभी अंतिम निर्णय क्या और कब होता है यह फिलहाल बताना कठिन है।

विजय शंकर सिंह