( पत्रकार राहुल कोटियाल बीती नौ अगस्त को कश्मीर गए थे. ये वहाँ लगे कर्फ़्यू का पाँचवा दिन था. इस दिन से 20 अगस्त तक वो घाटी में रहे और इस दौरान इनकी कुल छह रिपोर्ट्स न्यूज़लांड्री  में पब्लिश हुई थीं।  राहुल ने आम कश्मीरियों के साथ-साथ उन लोगों से भी बात की जिनके बच्चों को गिरफ़्तार किया गया है, उनसे भी जिनके परिजनों पर पीएसए (पब्लिक सेफ़्टी ऐक्ट) लगा है, अपनी जान जोखिम में डाल वहाँ तैनात सुरक्षा बलों से भी बात की, मुख्यधारा की राजनीति में रहे लोगों से भी और घाटी में जो अल्पसंख्यक हैं यानी कश्मीरी पंडित, सिख और गुज्जर समुदाय के लोगों से भी. Tribunhindi.com पर हम पब्लिश कर रहे हैं, सुरक्षा बलों से बातचीत पर आधारित सीरीज़ – कन्फ़ेशंस ऑफ़ ए कॉप )

उस दिन तो मेरा भी मनोबल डगमगा गया था. जब सुना कि 370 एक झटके में ख़त्म की जा रही है तो कई सवाल एक साथ मन में उमड़ने लगे. ख़तरा सिर्फ़ लोगों की प्रतिक्रिया का नहीं था. ये भी डर था कि हमारे पुलिस के जवान, जो कश्मीरी हैं और जिनकी भावनाएँ कश्मीर से सीधी जुड़ी हैं उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी? कर्फ़्यू से लोगों को तो नियंत्रण में रख सकते हैं लेकिन अगर जवान ही विद्रोह पर उतर आए तो?
हमारे ऑपरेशंस (एसओजी) के जो जवान हैं उनकी हमें चिंता नहीं थी. क्योंकि यहां वही अफ़सर या जवान आते हैं जो मानसिक तौर पर बेहद मज़बूत होते हैं, भावनाओं में नहीं बहते, जिनकी इच्छाशक्ति दृढ़ होती है और समर्पण सिर्फ़ विभाग के लिए होता है. इसलिए ये अफ़सर तो 370 हटने के फ़ैसले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते, बल्कि दिल्ली के हर आदेश को लागू करवाने में ख़ुद को झोंक देते. लेकिन डर था रेगुलर पुलिस के जवानों की प्रतिक्रिया का. थाने से हथियार लेकर मिलिटेंट्स के साथ भागने के मामले तो यहां पहले भी हो चुके हैं.
दिल्ली भी इस तरह के विद्रोह की आशंका से अनभिज्ञ नहीं थी. इसीलिए 370 हटाने की घोषणा से पहले थानों से तमाम हथियार उठवा लिए गए थे और बीएसएफ के हथियारबंद जवानों के साथ जिन पुलिस के जवानों की तैनाती थी उन्हें सिर्फ़ लाठियाँ सौंप दी गई थी.
सच कहूँ तो इस सब के बावजूद भी हम लोग डरे हुए थे. लेकिन उसी दिन प्रदेश के सबसे बड़े अधिकारियों ने एक आपात बैठक बुलाई. इसमें हर जिले के वरिष्ठ अधिकारियों को बुलाया गया. वहां एक वरिष्ठ अधिकारी, जिन्हें बेहद शार्प माना जाता है, ने सबको समझाया, ‘ये मुश्किल समय है. हमें फ़िलहाल ये नहीं सोचना कि कश्मीर भारत में रहे, पाकिस्तान में रहे या आज़ाद हो. हमारी सबसे पहली ज़िम्मेदारी है अपने लोगों की सुरक्षा करना. अगर आज हमने अपनी ये ज़िम्मेदारी नहीं समझी तो कश्मीर में क़त्ल-ए-आम मच जाएगा और हज़ारों-लाखों जानें चली जाएँगी. बाक़ी फ़ैसले तो सियासी हैं, ये होते रहेंगे. हमें सिर्फ़ अपने लोगों की जान की फ़िक्र करनी है और इसके लिए ज़रूरी है कि हम पूरी ईमानदारी से अपना काम करें. फ़िलहाल हम ऐसा कोई प्रदर्शन न होने दें जिससे हालात बिगड़ सकते हैं. सुरक्षा व्यवस्था बेहद मज़बूत रखने में कोई कमी न छोड़ें.’
इस मीटिंग के बाद कई अफ़सरों को हौसला मिला. ये बात सबकी समझ आई कि फ़िलहाल हमारी प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि 2016 जैसा कुछ दोबारा न हो जाए. क्योंकि इस बार अगर ऐसा कुछ शुरू होता तो वो 2016 से कहीं बड़ा होता.
5 अगस्त से हमने ऐसा पहरा लगा दिया जैसा इससे पहले कश्मीर ने कभी नहीं देखा था. अपने जवानों को भी हमने समझाया कि हमारे लोगों की भलाई इसी में है कि कोई अप्रिय घटना न हो.
वैसे यहां सैन्य विद्रोह अब शायद कभी नहीं होगा. भले ही कई जवानों के दिल में आज़ादी का ख़याल हो लेकिन वो जानते हैं कि बंदूक़ से आज़ादी नहीं मिल सकती. उलटा ऐसा कोई विद्रोह पूरे कश्मीर को ख़ून से रंग देगा और अंततः हासिल कुछ नहीं होगा. इसलिए ये ख़याल अगर किसी को आए भी तो भी सामूहिक विद्रोह नहीं हो सकता क्योंकि वे इसके भयावह परिणाम समझते हैं. और अब तो जवानों में ये मोटिवेशन भी है कि केंद्र शासित प्रदेश बन जाने से उन्हें कई वित्तीय लाभ मिलने लगेंगे, उनकी पगार बढ़ जाएगी, जीवन स्तर पहले से बेहतर होगा.
आपको एक हालिया उदाहरण बताता हूँ. मेरे एक जवान ने इस बीच मुझसे पूछा, ‘सर अब नई व्यवस्था में मेरी तनख़्वाह कितनी बढ़ जाएगी?’ मैंने उसे जब बताया कि लगभग इतने रुपए हर महीना उसे ज़्यादा मिलने लगेंगे तो वो उत्साह मैं बोला, ‘अरे वाह सर. इतने के लिए तो मैं आधा शहर ख़त्म कर दूँ.’
हालाँकि ये बात उसने मज़ाक़ में कही लेकिन इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जवानों में इस फ़ैसले के बाद कैसी प्रतिक्रिया है. व्यक्तिगत तौर पर जवानों को तसल्ली है कि इस महँगाई में उन्हें कम से कम वित्तीय लाभ तो पहले से ज़्यादा मिलने लगेगा.
लेकिन ख़तरे भी अब कई-कई गुना बढ़ चुके हैं. कश्मीर में रहने वाला हर आदमी जानता है कि अब कश्मीर आने वाले दिनों में और जलेगा. भारत से नफ़रत करने वाले तो पहले भी नफ़रत ही करते थे लेकिन जिन कश्मीरियों के मन में भारत के लिए एक सॉफ़्ट-कॉर्नर था वे अब बेहद नाख़ुश हैं. इससे अलगाववाद बढ़ेगा, अलगाववादियों को हिम्मत और ताक़त मिलेगी और उस पार से घुसपैठ बेहद तेज़ हो जाएगी. घुसपैठियों को यहाँ समर्थन भी पहले से कहीं ज़्यादा मिलेगा लिहाज़ा आतंकवाद और बढ़ेगा.
ये कहना आसान है कि हालात सामान्य हैं. अभी तो चारों तरफ़ बंदूक़ें तनी हुई हैं इसलिए हालात सामन्य दिख रहे हैं. लेकिन ये बंदिशें जितनी लंबी और ज़्यादा होंगी, प्रतिक्रिया भी फिर उतनी ही ज़बरदस्त होगी. ये तो एक इस्टैब्लिश्ड रूल ही है कि दबाव जितना ज़्यादा होगा, बाउन्स बैक भी उतना ही तेज़ होगा.
बीते एक दशक में कश्मीर में बहुत कुछ बदला है. यहां अब जिसे हालात सामान्य होना कहा जाता है, वह असल में सामन्य होता नहीं. इसे आप एक ग्राफ़ की तरह समझें:
पिछले एक दशक में यहां तीन बड़ी मास अप्रायज़िंग (जन विद्रोह) हुई है. साल 2008 में जब अमरनाथ श्राइन बोर्ड वाला मामला हुआ, 2010 में जब तीन लड़कों का एंकाउंटर हुआ और फिर 2016 में जब बुरहान वानी मारा गया.
अब आप 2008 को अगर बेस मानिए तो ये समझिए कि उस वक़्त लोगों में एंटी इंडिया सेंटिमेंट का ग्राफ़ ज़ीरो पर था. अमरनाथ मामले के बाद ये ग्राफ़ उठकर 40 पर पहुँच गया. हालात नियंत्रण में आए, ग्राफ़ नीचे गया लेकिन वापस ज़ीरो पर नहीं पहुँचा. वो दस पर जाकर रुक गया और उसे ही ‘हालात सामान्य होना’ मान लिया गया.
2010 में जब दूसरी अप्रायज़िंग हुई तो एंटी इंडिया सेंटिमेंट्स का ये ग्राफ़ उठकर 60 तक आ गया. फिर से हालात नियंत्रित किए गए, ग्राफ़ नीचे आया लेकिन इस बार 30 पर ही ‘हालात सामान्य’ मान लिए गए. जबकि 2008 से तुलना करें तो ये ग्राफ़ बहुत ऊपर था.
ऐसा ही फिर 2016 में भी हुआ. तब हालात बिगड़ने पर ये ग्राफ़ जब उठा तो वापस बस 50 तक ही पहुँचा और तुलनात्मक तौर से उसे ही ‘सामान्य’ मान लिया गया.
तो 2008 में जो एंटी इंडिया सेंटिमेंट का ग्राफ़ ज़ीरो पर सामान्य माना जाता था वही 2016 में 50 पर सामान्य माना गया. लोगों का ये ग़ुस्सा पहले की तुलना में बहुत ज़्यादा था जो कभी वापस अपने ‘बेस ईयर’ जितना नहीं हो पाया.
अब आज की स्थिति का अंदाज़ा लगा लीजिए. जब बेस ग्राफ़ ही 50 पर है तो ये ऊपर कहां तक पहुँच सकता है और इसे नीचे भी लाएँगे तो कितना नीचे ला सकेंगे. यही हमारा सबसे बड़ा डर भी है कि अब आने वाले दिनों में जो विद्रोह होगा, वो कश्मीर के इतिहास का शायद सबसे बड़ा और सबसे भयावह विद्रोह होगा.
दिल तो कहता है कि ऐसा कभी न हो लेकिन दिमाग़ कहता है कि इसके लिए तैयार रहना बहुत ज़रूरी है.’
(कश्मीर में तैनात सुरक्षा बलों की कुछ ऐसी ही ‘ऑफ़ द रिकॉर्ड’ स्वीकारोक्तियाँ आगे भी साझा करूँगा. कश्मीर में विकराल हो चुकी समस्या के बीच ऐसी कई छोटी-छोटी परतें हैं. ये क़िस्से शायद उन परतों के बीच झाँकने की जगह बना सकें.)

About Author

Rahul Kotiyal

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *