23 जनवरी का दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती का दिन होता है। सुभाष एक विलक्षण प्रतिभासंपन्न और अपनी तरह के अनोखे स्वाधीनता संग्राम सेनानी थे।

सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद के बारे में आज,  उनका एक प्रसिद्ध उद्धरण पढें

हिंदू महासभा भारतीय राष्ट्रवाद का यह शत्रु तत्व है और इसे हराने की हमारी चुनौती है। आज हिंदू महासभा मुस्लिम विद्वेष से प्रेरित अंग्रेजी हुकूमत के साथ खड़ी दिख रही है। उनका एक ही मकसद है किसी भी तरह मुसलमानों को सबक सिखाना।

इस मकसद को हासिल करने के लिए वे अंग्रेजों का साथ देने में हिचकिचायेंगे भी नहीं। अंग्रेजों की कदमबोशी करने से भी उन्हें खास परहेज नहीं है।

मुसलमान हमारे दुश्मन हैं और अंग्रेज हमारे दोस्त हैं, यह मानसिकता हमारी समझ से बाहर है। उन्होंने कहा कि राजनीति का पहला सबक यह है कि हम याद रखें कि हमारा दुश्मन विदेशी साम्राज्यवाद है। फिर याद रखना है कि विदेशी साम्राज्यवाद के सहयोगी जो हैं, जो भारतीय नागरिक और भारतीय संगठन साम्राज्यवादियों के हमजोली हैं,  वे तमाम लोग और उनके वे तमाम संगठन भी हमारे दुश्मन हैं।

( नेताजी सुभाष चन्द्र बोस )

16 दिसम्बर 1938, तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने एक प्रस्ताव पारित  करके काँग्रेस के किसी भी सदस्य को हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग का सदस्य बनने पर रोक लगवाई थी।

( संदर्भ – Hindu Mahasabha in colonial North India, Page 40. Author:-Prabhu Bapu)

आज भी हिंदू महासभा, ब्रिटिश महारानी की आरती उतारती है। गोडसे का मंदिर बना कर उस आतंकी हत्यारे का महिमामण्डन करती है। आज भी गांधी हत्या का सीन रिक्रिएट कर के अखबारों में छपवा कर दुनियाभर में देश का नाम बदनाम करती है। हिन्दू महासभा, आरएसएस यह दोनों आज़ादी के आंदोलन को तोड़ने के लिये अंग्रेजों द्वारा पाले पोसे गये थे जो उनके इशारे पर मुस्लिम लीग की विभाजनकारी नीति के साथ गलबहियां कर रहे थे। जब पूरा देश इतिहास के सबसे बड़े जन आंदोलन के साथ आज़ाद होने के लिये एक निर्णायक लड़ाई लड़ रहा था तो इनके नेता और आका अंग्रेजों की मुखबिरी कर रहे थे और जिन्ना के साथ सरकार में थे। आज भी भाजपा का एक मंत्री नितिन गडकरी गांधी हत्या को वध कहता है। यह उसका दोष नहीं है, यह उसकी मानसिकता का दोष है, जो उसे उसके आकाओं ने सिखाया पढ़ाया है।

सुभाष इन साम्प्रदायिक तत्वो को पहचान गये थे, इसीलिए उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष बनते ही यह प्रतिबंध लगा दिया था कि कोई भी कार्यकर्ता जो कांग्रेस का सदस्य है, वह हिंदू महासभा का सदस्य नहीं हो सकेगा। दोहरी सदस्यता पर प्रतिबंध का यह अनोखा कदम सुभाष ही उठा सकते थे। ऐसा कदम उठाने का निर्णायक साहस न नेहरू ने दिखाया, न पटेल ने न आज़ाद ने, और न ही महात्मा गांधी ने । 1938 के बाद दोहरी सदस्यता का मुद्दा 1979 में मधु लिमये ने जब जनता पार्टी की सरकार केंद में मोरार जी देसाई और कुछ महीनों के लिये चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में थी, तो उठाया था। मधु लिमये का प्रस्ताव था कि एक साथ जनता पार्टी और आरएसएस का सदस्य नहीं रहा जा सकता है। इसी बात पर भारतीय जनसंघ से जनता पार्टी में गये नेता, अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नानाजी देशमुख आदि ने जनता पार्टी से अलग हो कर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। विडंबना देखिये, भाजपा ने अपना वैचारिक स्रोत, न तो हेडगेवार को माना, न गोलवलकर को, और न ही आरएसएस को, बल्कि गांधी को माना और कहा कि उनका वैचारिक आधार गांधीवादी समाजवाद होगा।

क्या आप को हिंदू महासभा और आरएसएस का एक भी ऐसा उद्धरण, लेख, या दस्तावेज इतिहास के पन्नों में मिला है जहां इन संगठनों के नेताओं, डॉ हेडगेवार, गुरु गोलवलकर, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि ने ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य की निंदा की हो ? अंग्रेजों के खिलाफ कभी कुछ कहा हो ? ढूंढ़ियेगा मित्रों। अगर ऐसी कोई सामग्री मिले तो हम सबसे साझा कीजिएगा। सुभाष बाबू की जयंती पर ऐसे विलक्षण और प्रतिभाशाली स्वाधीनता संग्राम सेनानी को कोटि कोटि प्रणाम, और उनका विनम्र स्मरण।

© विजय शंकर सिंह