October 30, 2020

आज़ाद हिंदुस्तान का पहला वित्तीय घोटाला 1958 में हुआ था. इसे मूंदड़ा घोटाला भी कहा जाता है क्योंकि इसे अंजाम देने वाले का नाम हरिदास मूंदड़ा था. यह पहला घोटाला था जिसमें व्यापारी, अफ़सर और सरकार शामिल थी.
इस घोटालें के बारे में रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गाँधी’ में विस्तृत रूप से लिखा है, इस आर्टिकल में कुछ संदर्भ उनकी किताब से उद्धृत है.
क्या था यह घोटाला?
वाम की तरफ से कम्युनिस्टों और दक्षिण (पंथ) की तरफ से स्वतंत्र पार्टी से सरकार को मिल रही चुनौती तब और बढ़ गयी जब नयी दिल्ली की सरकार  पर कई तरह को वित्तीय अनियमित्ताओं  का आरोप लग गया. सितम्बर 1957 में सरकार नियंत्रित जीवन बीमा निगम (LIC) द्वारा कानपुर की एक निजी कंपनी में भरी निवेश किये जाने का मामला संसद में उठाया गया. जिस कंपनी में एलआईसी ने निवेश किया था वह उद्योगपति  हरिदास मुंद्रा की थी.
फ़िरोज़ गाँधी की क्या भूमिका थी?
इस मुद्दे पर जब वित्तमंत्री टी.टी. कृष्णामाचारी ने जवाब देना शुरू किया तो असंतुष्ट कांग्रेसी सांसदों ने और भी तीखे सवाल पूछने शुरू कर दिए . इस बहस में मुख्य भूमिका निभा रहे थे प्रधानमंत्री के दामाद फ़िरोज़ गाँधी जो अलग-थलग रहने लगे थे.

Feroze Gandhi.jpg
फ़िरोज़ गाँधी

फ़िरोज़ गाँधी ने दावा किया की मुद्रा का शेयर इसीलिए खरीदा गया ताकि बाज़ार में उसे उसकी सही कीमत से ज्यादा दाम दिलाया जा सके. उन्होंने आश्चर्य वक्त किया की “कैसे LIC ने देश के व्यापारिक जगत के रहश्यमय आदमी के सह इस संदेहास्पद करार में दिलचस्पी दिखाई.” फ़िरोज़ गाँधी का निष्कर्ष था की ‘यह मामला सरकार द्वारा नियंत्रित LIC के पैसो का दुरूपयोग करने की साजिश थी.’
जांच आयोग का गठन 
आलोचनाओ के सामने झुकते हुए सरकार ने एक जाँच आयोग के गठन की घोषणा की. दरअसल एक के बाद एक दो अलग-अलग जाँच की गयी जिनका जिम्मा प्रमुख न्यायधीशों को सौंपा गया. जाँच के नतीजे कांग्रेस के लिए सुकूनदेह नहीं थे. LIC की पहले से ही एक सार्वजनिक तोर पर घोषित ‘ब्लू चिप’ निति थी कि यह उन कंपनियों में निवेश करेगी जिनकी बाज़ार में भुत साख होगी और जिनका अच्छा प्रबंधन होगा | मुद्रा कंपनिया इन मापदंडो पर कहीं खड़ी नही उतरती थीं फिर भी कारपोरेशन ने इसमें अब तक का सबसे बड़ा निवेश कर दिया था. LIC के अधकारी जजों के सवालों का कोई संतुष्टिदायक जवाब नहीं दे सके, न ही उनके मंत्री ऐसा कर सके.
Image result for jawaharlal nehru hd images
इन आयोगों की कार्यवाहियां दिल्ली और मुंबई में हुई और इसे जनता के लिए खुला रखा गया. आम जनता ने इसमें काफी दिलचस्पी ली, ज्यादातर लोगो ने इसे आलोचनात्मक तोर पर ही देखा. झुण्ड के झुण्ड  लोग जाँच आयोग की कार्यवाही  को देखने के लिए जाते और अधिकारियों और मंत्री को योग ने सवालों के सामने हकलाते  हुए या एक दुसरे को काटते हुए देखते. न्यायधिशों की आखिरी रिपोर्ट आरोपियों के लिए बुरी खबर आई और इसने इसकी भरपूर कीमत मांगी. वित्तमंत्री और वित्त सचिव को इस्तीफा देने को मजबूर किया गया.
मीडिया ने मुद्दा जोर-शोर से उठाया
‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने लिखा की ‘मुद्रा कंपनियों में LIC के निवेश की न्यायिक जाँच के नतीजो ने पुरे राजनैतिक  तंत्र को हिलाकर रख दिया. आजादी के बाद पहली बार इस तरह का अनुभव किया गया था.’ अख़बार ने लिखा की ‘जब ये मामला पहली बार संसद ने उठाया गया था तो लग रहा था की बहुत  ही छोटा मामला है लेकिन बाद में इसने पहाड़ की शक्ल अख्तियार कर ली.’ शुरू में इससे मुंद्रा मामला बताया जाता रहा था लेकिन बाद में इससे मुंद्रा घोटाला कहा जाने लगा. जब तक यह मामला उजागर नहीं हुआ था, नेहरु सरकार के मंत्री भले ही सत्ता प्रेमी के रूप में जाने जाते हो लेकिन उन पर वितीय भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा था. गांधीवादी सादगी की एक आभा अभी भी उनके इर्द-गीर्द मंडरा रही थी. लेकिन मुंद्रा मामले ने पहली बार इस छवि को भारी ठेस  पहुचाई. छवि में यह सेंध उतनी ही गहरी और उतनी ही क्षति पैदा करने वाली थी जितनी वाम और  दक्षिण गुटों की राजनितिक पार्टियों द्वारा पहुचाई जा रही थी.

Avatar
About Author

Ashok Pilania

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *