इस कौम को “मुशायरों” ने क्या दिया? क्या दिया इन राजनीतिक मुशायरों ने,जिसकी तैयारीयों में लाखों रुपये खर्च कर ‘माहौल’ बनाया जाता है,और जिस पार्टी का ये मुशायरा है उस पार्टी के ‘नेता’ को सेक्युलर बनाया जाता है,क्यों किसलिए कौम के नाम पर “लाखों” रुपये मुशायरों में फूंकें जातें है? क्या मिलता है इससे मुस्लिमों को?क्या मुस्लिम समाज की शिक्षा का स्तर सुधर जाता है? क्या मुस्लिम समाज जिस आधार पर कमज़ोर है बराबर आ जाता है? क्या मुस्लिम बस्तियों में सफ़ाई हो जाती है? क्या मुस्लिम समाज “दलितों से बदतर नही रह जाता है”।
हर एक बात का जवाब सभी को पता है,लेकिन फिर भी लाखों रुपये मुस्लिम समाज के नाम पर हर एक बार “सेक्युलर” सरकारें और उसमे मौजूद मुस्लिम “नेता” सारा का सारा खर्च करातें है,और इसके बाद एक मिसाल तय कर दी जाती है कि इस सरकार ने “मुस्लिमों” के हित मे ये किया,और मुस्लिम समाज के “पेट भरे” लोग इस बात को मनवा देतें है कि मुशायरों से कौम को फायदा हुआ है,मगर इस बीच मे इस बात में इन मुशायरों को सुनने आयी भीड़ मे बेठे कुछ बच्चों से पूछिए क्या हासिल हुआ तो जवाब आएगा,”कुछ नही”।
ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि मुस्लिम समाज की मूलभूत ज़रूरतें कुछ और है ,जिसमे शिक्षा,स्वास्थ्य और मोहल्लों की गंदगियां या आस पास स्कूल,कॉलेजेस और हॉस्पिटल का न होना है,अगर मुशायरे में देश के सबसे बड़े शायर भी आये तो इन इनका क्या भला होगा? कुछ नही इन्हें सिर्फ चंद अशआर मिलते है जिन पर “वाह वाह” हो जाती है,मगर हासिल कुछ नही होता है।सवाल वो ही रह जाता है की मुस्लिमों को क्या मिला,मिला सिर्फ नशा जो एक बार में हुआ और खत्म हो गया |
इन राजनीतिक मुशायरों को अक्सर चुनाव से पहले,चुनाव के बाद इस्तेमाल किया जाता है और जो मुद्दे है,जो दिक्कतें है जो परेशानियां है उनको कवर अप किया जाता है,क्योंकि इन मुशायरों पर हुआ खर्च,रौब डालता है,की “हमने तुम्हारे लिए यह किया” मगर मुशायरे मुस्लिम समाज की बेहतरी है ये बात “जागरूक मुस्लिम”  मुस्लिमों के बारे फैलातें है । इसके बाद जो नुकसान होता है वो मुस्लिमों को भुगतना होता है,जो दिन ब दिन,और साल दर साल के साथ चुनाव तर चुनाव मुस्लिम समाज ज़ख्मी हो रहा है, लेकिन मरहम “मुशायरों” को बताया जा रहा है।
ये सोचने की बात है,और इसे खुद मुस्लिम सोचेंगे,उनका यूथ सोचेगा, की ऐसा क्यों….और इन “मुशायरों” ने मुस्लिमों को क्या दिया।

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Asad Shaikh

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