1947 में जब भारत विभाजन हुआ तो उसके पहले से ही साम्प्रदायिक दंगे भड़कने शुरू हो गए थे। साम्प्रदायिक दंगों का इतना बीभत्स रूप सामने आएगा, इसका अंदाज़ा शायद अंग्रेजों को भी नहीं था, और देश बांटने की कवायद में लिप्त, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं को भी शायद यह आभास नहीं था, कि दुनिया का सबसे अधिक जन पलायन देश की आज़ादी के साथ साथ होने वाला है। दस लाख लोग अपनी अपनी जड़ों से उखड़ कर दूसरी जगह गये। पांच लाख लोग मारे गए। जब जान की ही कीमत कुछ नहीं थी तो संपत्ति की क्या बात की जाय।

यह अनुमान हमारे महान नेतागण क्यों नहीं लगा पाए जब कि इसके संकेत 16 अगस्त 1946 को हुये कलकत्ता के डायरेक्ट एक्शन डे से मिलना शुरू हो गया था, जिसे मुस्लिम लीग के आह्वान पर मनाया गया था। देश बंटा और दंगे शुरू हुये तो मीडिया का एक वर्ग इन दंगों को सुलझाने के बजाय कुछ ऐसी खबरें और लेख लिखने लगे जिससे उन्माद को और हवा मिली और स्थिति बिगड़ती ही चली गयी। तब गांधी जी ने जो रोज अपनी डायरी लिखते थे में मीडिया के बारे में अपनी बात कही जो उनके सचिव प्यारेलाल द्वारा लिखी गयी पुस्तक द लास्ट फेज में उनकी डायरी से उदधृत है। गांधी इसे पागलपन भरा विचार कहते हैं।

गांधी लिखते हैं – ” एक अखबार ने बड़ी गंभीरता से यह सुझाव रखा है कि अगर मौजूदा सरकार में शक्ति नहीं है यानी अगर जनता सरकार को उचित काम न करने दे , तो वह सरकार उन लोगों के लिए अपनी जगह खाली कर दे, जो सारे मुसलमानों को मार डालने या उन्हें देश निकाला देने का पागलपन भरा काम कर सके । यह ऐसी सलाह है कि जिस पर चल कर देश खुदकुशी कर सकता है और हिंदू धर्म जड़ से बरबाद हो सकता है । मुझे लगता है ऐसे अखबार तो आजाद हिंदुस्तान में रहने लायक ही नहीं हैं । प्रेस की आजादी का यह मतलब नहीं कि वह जनता के मन में जहरीले विचार पैदा करें । जो लोग ऐसी नीति पर चलना चाहते हैं, वे अपनी सरकार से इस्तीफा देने के लिए भले कहें , मगर जो दुनिया शांति के लिए अभी तक हिंदुस्तान की तरफ ताकती रही है, वह आगे से ऐसा करना बंद कर देगी । हर हालत में जब तक मेरी सांस चलती है , मैं ऐसे निरे पागलपन के खिलाफ अपनी सलाह देना जारी रखूंगा ।” ( महात्मा गांधी, दिल्ली-डायरी , पृष्ठ 30 )

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका एक सतर्क पहरेदार, वाचडॉग के रूप में होती है। उसकी भूमिका सरकार और सत्ता प्रतिष्ठान के हर मसले पर सवाल उठाने और जनपक्षधरता की होनी चाहिए। आज एक नया तर्क दिया जाता है कि सरकार के अच्छे कामो के प्रचार प्रसार को भी हमे बताना चाहिए। ऊपर से देखने पर यह तर्क सही लगता है, पर मेरी राय में यह काम मीडिया का नहीं है। सरकार के पास, अपनी अच्छाईयों और सफलता का प्रचार प्रसार करने के लिये सरकार का सूचना और प्रसारण मंत्रालय है, डीएवीपी है, विज्ञापन के लिये बजट हैं, विभिन्न विभागों में जन सम्पर्क अधिकारी हैं जो अपने अपने स्तर और अपनी सीमा में सरकार का प्रचार प्रसार करते रहते हैं। पर मीडिया को सरकार के सभी कदमों की मीमांसा और जो तथ्य हों,उसे प्रस्तुत करना चाहिए।

अगर मीडिया ने सरकारी कामकाज की आलोचना छोड़ दी तो वह केवल डीएवीपी का एक एक्सटेंशन बनकर रह जायेगा। मीडिया की प्रतिबद्धता, सरकार के बजाय, जनता और देश के प्रति होनी चाहिए।

( विजय शंकर सिंह )