पांच साल पहले देवी के स्थान पर पूजे जाने वाली महिला की आबरू को शर्मसार किया गया था, उस दिन एक लड़की की मृत्यु के बाद निर्भया ने जन्म लिया था।  16 दिसम्बर 2012 को घटे इस घिनोने अपराध को पांच साल बीत गए। महिला पर अत्याचार की ये पहली ऐसी घटना थी जिसने लोगो को सड़क पर उतरने को मजबूर किया हमारे देश मे बिना जान पहचान या रिश्तेदारी के कोई किसी के लिए लड़ना या उसके हक़ में बोलना उचित नही समझता,ख़ामख़ा के पंगो में पड़ने वाली फितरत हमारी नही है।
लेकिन इस घटना ने एक बार को सही पर अपने परिवार की बेटियों की सुरक्षा पर ध्यान देने को मजबूर किया व निर्भया के लिए लड़ते हुये इस फैलती घटिया सोच की खिलाफ भी मोर्चा खोला।भारत मे रोज़ाना यौन शोषण के कई मामले सामने आते है 2016 से पहले भी आते रहे थे 16 दिसंबर के पश्चात अंतर बस यर आया कि ऐसी हर घटना पर हम पहले से अधिक संवेदनशीलता दिखते है।
किसी महिला के साथ हुई हीन ज़्यादती का ये दुर्लभ मामला था ,अपराध की सीमाओं को लांघते हुए मानवता से कई दूर चले गए वो पांच लोग हर महिला व समाज के भीतर ऐसा ख़ौफ छोड़ गए जिसने एक दूसरे को संदेह की नज़र से देखने को मजबूर कर दिया। किसी भी देश व समाज के विचारों को समझने के लिए महिलाओं के प्रति उनका रवैया देख लेना बहुत होता हैं क्योंकि महिला सम्मान ,विनम्रता ,प्रेम की पात्र होती है और यही गुण समाज को आगे बढ़ाते है।
भारत मे महिला के रूप में सड़क पर उतरने का मतलब है सहनशीलता की हदों को जनना, यहाँ कुछ गंदी व घटिया नज़रो से वस्त्र भी बचा नही पाते वो नज़रे भीतर तक ग्लानि भाव पैदा कर महिला होने के अस्तित्व पर प्रश्न उठा जाती है। उच्च आदर्शो ,सम्मान भाव का ज्ञान सिर्फ एक वर्ग के लोगो की शिक्षा तक न सीमित रह जाये निचले से निचले स्तर के लोगो को भी कुछ मूलभूत सामाजिक आदर्शो से परिचित होना चाहिए।
निर्भया को इंसाफ दिलाने की कसमें खाने वाले आज चौराहे पर दीप जलाकर खुद को संतुष्ट महसूस कर लेते है यहां इंसाफ और न्याय की हर जंग इंडिया गेट पर मोमबत्ती जलाकर लड़ी जाती है हो सकता है ये शांतिप्रिय तरीका ऐसी और घटनाओं को झेलने की हिम्मत दे।
निर्भया सिर्फ नाम नही एक उदाहरण हो गया है जिसका प्रयोग हर लड़की को उसकी सीमाएं और समाज का असली चेहरा दिखाने के लिए प्रयोग किया जाता है ,सुबह घर से निकलने और रात को घर पहुंचने वाली हर महिला को निर्भया शब्द अलर्ट रहने को कहता है। महिलाओं की बंदिशों को तोड़ने के लिए लड़ने वाली महिलाओं के लिए निर्भया ताक़त है आगे बढ़ने का साहस है।
निर्भया और निर्भया शब्द स्वयं में अनेक पहलू समेटे हुए है जो हैट कदम पर बदलते रहते है। 16 दिसम्बर हमारी  कानून व्यवस्था ,सुरक्षा व्यवस्था का धराशाही रूप उजागर करता है दिल्ली की सड़को को देर तक कलंकित करते लोग बेख़ौफ़ आगे बढ़ते रहे और व्यवस्था रात का बहाना बनाकर सोती रही । कानूनी व्यवस्था में 16 दिसम्बर आँधी की तरह आयी और नींद से जाग गई।
इन पांच सालों में महिला सुरक्षा को लेकर कई बदलाव किए गए है सुरक्षा के तरीके महिलाओं की सिखाये गए, विभिन्न नियमो ,व्यवस्थाओ को अस्तित्व में लाया गया परंतु रेप जैसे कृत्य आज भी समाप्त नही ही पाये जो इन सभी प्रयासो की असफलता का सूचक है।
छेड़ छाड़ जैसी छोटी घटनाओ के प्रति सहनशील रवैया ही आरोपी को रेप तक पहुंचाने में मदद करता है। यदि रेप जैसी घटनाएं रोकनी है तो हर प्रकार कर लज्जित करने वाले कृत्यों पर रोक लगनी आवश्यक है।
छोटे दुस्साहस में कामयाबी बड़े अपराधों का कारण बनती है और निर्भया जैसे  किसी भी अपराध को रोकने के लिए ऐसे हर अपराध की सज़ा बड़ी होनी चाहिए। एक लड़की से रेप के सज़ा हर लड़की को पाबंदी के रूप में झेलनी पड़ती है ये हालात अभी न रुके तो ये डर का साया महिलाओं को घर से बाहर निकलने से भी रोकने लगेगा।

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Ankita Chauhan

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