हम उस दौर में है जहाँ “मायनों” की मौत हो चुकी है,मुझे नही पता उन्हें दफ़न किया गया है या जलाया गया है,लेकिन वो मर गए है,उनकी मौत ही ने हमे खोखला कर दिया है। क्योंकि अब हमें हैरत ही नहीं होती है किसी की मौत पर,ये एक मामूली बात हो गयी है,क्योंकि ये चीज़ अब हमारे लिए मायने रख ही नही रही है।
ये बात इसी दौर की है जहां बस से कुचल जाने के बाद उस लाश को 70 किमी तक घसीट कर ले जाया जाता है,उस लाश को पहचान पाना मुमकिन नही हुआ है, होगा भी कैसे ? क्योंकि दिन रात की ये दास्तान ऐसी है कि हमे ऐसी खबरें अपने एंड्रॉयड पर मिल ही जाती है वो भी “60 वर्ड्स” में तो मायने ही क्या है?
ये तो महज एक बात ऐसी सैकड़ों,हज़ारों मौतें है जो हमारी नज़रो के सामने से गुजरते हुए फौरन निकल जाती है मालूम नही चलता,कब एक अधेड़ को “भीड़” पीट पीट कर मार देती है लेकिन बस खबर को “स्वाइप” करते हुए हम आगे बढ़ जाते है,क्योंकि किसी का भी मरना हमारे लिए कोई मायने है ही नही हम “जल्दी” में है।
ये स्थिति कुछ एक दिन में नही बन पाई है,ये “ज़िंदा” दौरे के मौत के बाद हुआ है जहां हर चीज़,इतनी जल्दी और आफत के साथ हमारे सामने आ खड़ी हुई है कि हमारे सामने ये बातें कोई मायने नही रखती है,इसके पीछे हमारे सोचने समझने की ताकत का खत्म होने की तरफ जाना खुद “सेंसिबल” होने से बहुत दूर हो जाना,जहां कोई भी बात बस “खबर” तक है वो भी अगर उस पर गौर किया है तो वरना इससे भी कोई फर्क पड़ता हुआ नजर नही आता है।
ये एंड्रॉयड, डिश टीवी,”ऑनलाइन” और “4 जी” का दौर है जहां ज़िन्दगी महज़ इयरफोन के कानों के अंदर जाने तक टिकी है,किसी की जिदंगी, और किसी की स्थिति से कोई भी सरोकार नही,क्योंकि हम “जल्दी” में है,ये जल्दी हमारी मासूमियत को खत्म कर रही है,”आत्मीयता” को कमज़ोर कर रही है और हालात है “सेंस आर ऑलरेडी डेथ”

असद शैख़

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Asad Shaikh

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