यकीन मानिये पाकिस्तान के प्रति हालिया युद्धोन्माद का एक कारण पुलवामा हमले के साथ साथ लोकसभा चुनाव 2019 भी है। चुनाव बाद जो भी सरकार आएगी वह पाकिस्तान से बातचीत करेगी ही। यह बातचीत पाकिस्तान के प्रति अनुराग या हृदय परिवर्तन का परिणाम नहीं होगा बल्कि यह अंतराष्ट्रीय कूटनीतिक समीकरण और दोनों देशों के नाभिकीय अस्त्रों से लैस होने के कारण होगा। कूटनीति अंतर्राष्ट्रीय  परिस्थितियों, देश के समक्ष अन्य समस्याओं और अनेक प्रत्यक्ष तथा प्रछन्न कारणों से निर्देशित होती है न कि सोशल मीडिया पर युद्धोन्माद से ग्रस्त बीमार मानसिकता वाली भीड़ से।

आज पाकिस्तान के राष्ट्रीय दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने पाक के प्रधानमंत्री इमरान खान को शुभकामना संदेश दिया है, पर नयी दिल्ली में पाक उच्चायोग में उनके जलसे का बहिष्कार किया है। यह शुभकामना भी भले ही औपचारिकता हो पर इसकी भी कूटनीतिक मीमांसा की ही जायेगी। इमरान खान ने अपने ट्वीट में इसके लिये आभार व्यक्त किया है।

इमरान खान का ट्वीट पढें

“I extend my greetings & best wishes to the people of Pakistan on the National Day of Pakistan. It is time that ppl of Sub-continent work together for a democratic, peaceful, progressive & prosperous region, in an atmosphere free of terror and violence”

9:49 PM – Mar 22, 2019

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अब इमरान खान के ट्वीट का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है

” भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेशनल डे पर पाकिस्तान की जनता को बधाई दी है. अपने इस संदेश में पीएम मोदी ने कहा है कि ‘मैं पाकिस्तान नेशनल डे के मौके पर लोगों को शुभकामनाएं देता हूं. वक्त आ गया है कि उपमहाद्वीप के लोग मिलकर लोकतंत्र और शांति बहाली के लिए काम करें, ताकि आतंक और हिंसा मुक्त माहौल और आतंक के लिए कोई जगह नहीं हो। ”

इस ट्वीट को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी शुरू हो गयीं है। सरकार का शुरू से यह स्टैंड रहा है कि पाकिस्तान के साथ कोई बातचीत जब तक वह आतंकी संगठनों को संरक्षण देना बंद नहीं करता है तब तक नहीं होनी चाहिये। पठानकोट, उरी और पुलवामा हमलों के बाद भी यही स्टैंड रहा। सरकार ने दो सर्जिकल स्टाइक भी की । पाकिस्तान के साथ किसी भी व्यक्ति या राजनेता के नरम बयान को देशद्रोह की संज्ञा दी गयी। जो व्यक्ति या संगठन या राजनीतिक दल अगर सरकार या भाजपा के सुर में सुर मिला कर युद्धोन्माद की बात न करे वह देशद्रोही करार दे देने की प्रथा चल पड़ी। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को न केवल आमंत्रित किया बल्कि बिना बुलाये भी अचानक पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ के घर एक पारिवारिक समारोह में चले गए।

पाकिस्तान के साथ ऐसे ही कभी नीम नीम कभी शहद शहद रिश्ते पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। शुभकामना संदेश एक औपचारिक परम्परा होती है। पर सवाल यह भी उठ रहा है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को शुभकामनाएं और दिल्ली स्थित पाक उच्चायोग के जलसे का बहिष्कार क्या सरकार की दोहरी नीति नहीं है ?

पाकिस्तान दिवस, धर्म आधारित राज्य की अवधारणा पर केंद्रित है। पाकिस्तान की अवधारणा धर्म ही राष्ट्र है पर आधारित है। यह अवधारणा द्विराष्ट्रवाद की घातक और विभाजनकारी विचारधारा पर आधारित है। यह विचार 1937 के बाद मुस्लिम लीग के अध्यक्ष एमए जिन्ना, हिन्दू महासभा के डीवी सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और प्रसिद्ध शायर अल्लामा इकबाल की सोच से उपजा कि हिन्दू और मुस्लिम दो कौम हैं और कौम और राष्ट्र एक नहीं हो सकते हैं। 23 मार्च के ही दिन सन 1940 में, 22 से 24 मार्च तक चले, अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के लाहौर सत्र में, लाहौर प्रस्ताव (जिसे पाकिस्तान में क़रारदाद-ए पाकिस्तान(पाकिस्तान संकल्पना) भी कहा जाता है) की पेशकश की गई थी जिसके आधार पर ही मुस्लिम लीग ने भारत के मुसलमानों के लिये अलग देश के अधिग्रहण के लिए आंदोलन शुरू किया था। यह प्रस्ताव भारत विभाजन की ओर पहला कदम था। यह देश के आ,आज़ादी के आंदोलन के इतिहास का सबसे दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण क्षण था।

23 मार्च पाकिस्तान में पाकिस्तान दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज वहां भगत सिंह को उनके शहादत दिवस पर भी याद  जाता है और धर्म के आधार पर पाकिस्तान की मांग के दिन का जश्न भी मनाया जाता है।  क्या विडंबना है, जिस साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ते हुए भगत सिंह और उनके साथी फांसी पर चढ़ गए उसी साम्राज्यवाद की कुटिल चाल बांटो और राज करो की एक दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण नीति के फलीभूत होने का भी जश्न पाकिस्तान में मनाया जाता है ! ऐसी ही विडंबनाओं और विसंगतियों के मेल को ही संभवतः नियति कहते हैं।

© विजय शंकर सिंह