2014 के थोड़ा पहले ही कांग्रेस के वैचारिक आधार पर संघ और भाजपा से जुड़े लोगों का हमला शुरू हो गया था। इस हमले की जद में तो गांधी भी थे पर गांधी का विराट और वैश्विक व्यक्तित्व इतना अधिक करिश्माई है कि उन को किसी भी मूर्खतापूर्ण प्रलाप से लपेटना संभव नहीं हो पा रहा है । अब आते हैं जवाहरलाल नेहरू पर, जो गांधी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे और वे देश के 27 मई 1964 तक जब तक वे जीवित रहे, प्रधानमंत्री बने रहे। नेहरू पर उनकी कश्मीर, तिब्बत, नेपाल, सरदार पटेल और नेताजी सुभाष के संबंध में नीतियों और संबंधों को लेकर आज तक आरोप लगते रहते हैं। इधर नेहरू फिर कठघरे में हैं। उन पर यह इल्ज़ाम आयद है कि 1950 और 1955 में भारत को जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ऑफर अमेरिका और रूस द्वारा दिया गया था तो उन्होंने उसे ठुकरा दिया और वह स्थान चीन को दे दिया। आज के विमर्श का यह विषय है।

1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था और दुनिया दो खेमे में बंट चुकी थी। एक खेमा ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस और चीन का था दूसरा खेमा, इटली, जर्मनी और जापान का था। पहले खेमे को मित्र राष्ट्र कहा गया और दूसरे को धुरी राष्ट्र। 1941 में जब हिटलर ने रूस पर हमला कर दिया तो रूस भी जर्मनी के खिलाफ मित्र राष्ट्रों के साथ हो गया। इटली जर्मनी और जापान के गुट के लिये,धुरी शब्द सबसे पहले इटली के प्रधानमंत्री मुसोलिनी ने जर्मनी -इटली के सम्बन्धों के परिपेक्ष्य मे इस्तेमाल किया था, जब उसने रॉबर्टो सुस्टर के जर्मेनिया रिपब्लिका के आलेख में लिखा था कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस समय यूरोपीय इतिहास की धुरी, एक्सिस बर्लिन से गुजर रही है। बाद में जापान इस धुरी का तीसरा अंग बन गया।

उसी महायुद्ध के समय 1942 में अमेरिका, सोवियत यूनियन, यूके, और चीन ने एक साझा दस्तावेज जारी किया जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की नींव पड़ी । यह चीन आज का कम्युनिस्ट चीन नहीं बल्कि च्यांग काई शेक का रिपब्लिक ऑफ चीन था जो मित्र देशों के साथ था। इसी दस्तावेज में संयुक्त राष्ट्र संघ की भी अवधारणा थी, हालांकि वह नयी नहीं थी, क्योँकि उसके पहले प्रथम विश्वयुद्ध के बाद लीग ऑफ नेशंस के रूप में एक विश्व संस्था बन चुकी थी। 1945 में जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ तब संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुयी और सुरक्षा परिषद के चार सदस्य, अमेरिका, सोवियत रूस, ब्रिटेन और चीन, और बाद में एक और यूरोपीय देश इसमे शामिल हुआ फ्रांस, इस प्रकार कुल पांच स्थायी सदस्य बने। तब तक हमे यह भी पता नहीं था कि हम 1947 में आज़ाद भी होंगे या नहीं। क्योंकि ब्रिटेन में चुनाव होने वाले थे और वह युद्धोपरांत समस्याओं में उलझा हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध ने दुनिया के शक्ति समीकरण बिल्कुल बदल दिए थे। सुरक्षा परिषद मूलतः द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेताओं का एक एलीट क्लब बन गया था।

यूएन के संविधान के चैप्टर 5, आर्टिकल 23, क्लॉज 1 में सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के बारे में उल्लेख है। यूएन चार्टर में बिना संशोधन के नए स्थायी सदस्य नहीं बनाये जा सकते हैं। यूएन चार्टर में संशोधन की भी एक प्रक्रिया दी गयी है। उक्त प्रक्रिया चैप्टर 18 के आर्टिकल 108 में दी गयी है। उक्त के अनुसार, जनरल असेम्बली के कुल सदस्यों के एक तिहाई सदस्य देशों के बहुमत जिसमे सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्य देश भी अनिवार्य रूप से सम्मिलित होंगे, की सहमति से ही चार्टर में संशोधन संभव है। तभी सुरक्षा परिषद में नए सदस्य जोड़े या घटाए जा सकेंगे। इस प्रकार अगर किसी देश को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करना है तो पहले उसे आम सभा के दो तिहाई सदस्यों का समर्थन, और फिर सभी पांच स्थायी सदस्यों का समर्थन लेना होगा। इतनी जटिलता के कारण ही कोई और देश सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बन नहीं पाया। यह जटिलता शायद इसलिए भी रखी गयी है कि कोई और उस एलीट क्लब में शामिल न हो सके।

सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता एक एलीट क्लब है। यह विजेताओं का गर्भगृह है। अब एक सवाल उठता है कि ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और अमेरिका तो इटली जर्मनी और जापान के धुरी से तो लड़ रहे थे फिर यह चीन बीच में कहां से आ गया ? 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होने के पहले से ही चीन और जापान के बीच दूसरा युद्ध 1937 से  चल रहा था जो 1945 में जापान के आत्मसमर्पण के बाद समाप्त हुआ। मित्र राष्ट्रों को पूर्वी मोर्चे पर चीन का मज़बूत साथ 1939 मे ही मिल गया था। जापान के साथ इस मोर्चे पर चीन ही लड़ रहा था पर जब जापान ने पर्ल हार्बर अमेरिकी सैन्य बेस पर हमला किया तो अमेरिका का जापान से सीधा टकराव हो गया और इसकी परिणति 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर अणुबम प्रहार से हुई। 1945 में युद्ध की समाप्ति के बाद मंचूरिया और ताइवान जिसे फारमोसा कहा जाता था चीन को मिला।

1945 में स्थायी सदस्यता के रूप में जो चीन शामिल हुआ था वह 1948 में चीन की कम्युनिस्ट क्रांति जो माओ त्से दुंग के नेतृत्व में हुयी थी के बाद ताइवान में ही सिमट कर रह गया। तब चीन के राष्ट्रपति च्यांग काई शेक मुख्य चीन की भूमि से भाग कर ताइवान चले गए और उन्हें उम्मीद थी कि जब कम्युनिस्ट चीन में कमज़ोर पड़ेंगे तो वे वापस मुख्य भूमि पर आ जाएंगे। च्यांग को अमेरिका से यह उम्मीद लंबे समय तक रही। पर 1945 के बाद दुनिया दो ध्रुवों, ( रूसी और अमेरिकी ) में बंट गयी थी, जिससे ताइवान की तरफ अमेरिका था तो लाल चीन की तरफ रूस। 1972 आते आते ताइवान अप्रासंगिक हो गया। तब तक अंतराष्ट्रीय रिश्तों में व्यापक परिवर्तन हो गया था। लाल चीन ने धीरे धीरे ताइवान की जगह ले ली। च्यांग काई शेक का सपना कि वे देर सबेर मुख्य भूमि पर आएंगे, सपना ही रह गया। ताइवान की जगह चीन संयुक्त राष्ट्र संघ में आ गया और वह उसी सीट पर काबिज हो गया जो 1945 में रिपब्लिक ऑफ चाइना को दी गयी थी। लाल चीन की विशाल जनसंख्या, आकार और सैन्यबल तथा जनशक्ति को नजरअंदाज करना विश्व संस्था के लिये मुश्किल पड़ गया था। इसे कूटनीतिक भाषा मे पिंग पांग कूटनीति भी कहते हैं।

अब यह सवाल उठता है कि 1950 में स्थायी सदस्यता पर अमेरिका का और 1955 में रूस का ऑफर भारत ने क्यों ठुकरा दिया था ? इस सवाल का उत्तर भारत के पूर्व विदेश सचिव और अमेरिका तथा चीन में राजदूत रहे के शंकर बाजपेयी देते हैं। उनके अनुसार, ” हर बात पर नेहरू को दोषारोपित करना एक आदत हो गयी है। यह कहना कि भारत ने चीन को अपनी सीट दे दी एक मूर्खतापूर्ण प्रलाप है। ” यह बात उन्होंने द प्रिंट को दिए गए एक साक्षात्कार में कही है। उनके अनुसार, यूएन की तरफ से भारत को कभी भी सुरक्षा परिषद के लिये औपचारिक आग्रह मिला ही नहीं था अतः उसे इनकार या स्वीकार करने का कोई औचित्य ही नहीं था। अक्सर कहा जाता है कि दो अवसर उन्हें स्थायी सदस्यता के लिये, एक अमेरिका की ओर से 1950 में और दूसरा रूस की तरफ से 1955 में मिला था।

1955 में रूस के प्रधानमंत्री निकालोई बुलगानिन ने भारत की स्थायी सदस्यता के लिये अपनी तरफ से बात कही थी पर यह कोई ऑफर नहीं था क्योंकि अकेले कोई सदस्य ऐसा ऑफर दे भी नहीं सकता है, यह महज भारत का टोह लेने की एक बात थी। जिस पर नेहरू ने बहुत ध्यान नहीं दिया ।

1950 में जब चीन में कम्युनिस्ट क्रांति हो गयी और विश्व के सत्ता संतुलन में एक नया आयाम जुड़ गया तो अमेरिका ने यह चर्चा प्रेस के माध्यम से चलाई। वाशिंगटन पोस्ट में कई लेख लिखे गए। यह विश्व मे बदलते शक्ति संतुलन का नतीजा था। कम्युनिस्ट चीन के उदय के बाद ही अमेरिका को लगने लगा था कि ताइवान को लंबे समय तक सुरक्षा परिषद में नहीं रखा जा सकेगा और देर सबेर लाल चीन उसकी जगह ले लेगा। पर वह यह नहीं चाहता था कि सुरक्षा परिषद में कम्युनिस्ट ब्लॉक बढ़े। 1950 तक आते आते शीत युद्ध की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी और अमेरिकी विदेश नीति कम्युनिस्ट विरोध पर केंद्रित हो गयी।

तब अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन फ़ॉस्टर डलेस ने रूस को रोकने और कम्युनिस्ट ब्लॉक को कमज़ोर करने के लिये भारत को अन्य अनौपचारिक चैनल से यह संदेश भेजा कि वह चीन की जगह सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बन जाय। जबकि यूएन संविधान के अनुसार बिना चार्टर में संशोधन किये यह संभव ही नहीं था। तब विजय लक्ष्मी पंडित अमेरिका में भारत की राजदूत थी। यह संदेश उन्हें मिला और उन्होंने इसे पीएम नेहरू के पास भेजा।

विजय लक्ष्मी पंडित के अनुसार,

” कल मैं जॉन फ़ॉस्टर डलेस और फिलिप जेसप जो अमेरिकी राजदूत थे, से मिली थी। उन्होंने यह संकेत दिया कि वे स्थायी सदस्यता के बारे में सोच सकते हैं। और ऐसा ही संकेत वाशिंगटन पोस्ट के पत्रकार मार्कविस चाइल्ड ने भी उन्हें दिया है। डलेस ने यह भी कहा कि वे इस विषय मे जन समर्थन भी जुटाएंगे। ”

नेहरू ने इस संदेश को भारत और चीन के बीच रिश्तों को तोड़ने की साज़िश मान कर इसे खारिज कर दिया। यदि  अमेरिका यह बात चाहता तो भी चार्टर की जटिल संशोधन प्रक्रिया के कारण यह संभव भी नहीं था। अमेरिका के भी मन मे भारत का हित नहीं था बल्कि उसका उद्देश्य ही कम्युनिस्ट ब्लॉक को तोड़ना था जो आगे चले शीत युद्ध मे स्पष्ट हो गया। वह एशिया में अपनी दमदार मौजूदगी चाहता था। पाकिस्तान ने आगे चलकर अमेरिका का हित पूरा किया।

अमेरिका भारत को अपना सहयोगी देश बनाना चाहता था पर उसका यह उद्देश्य अपने कूटनीतिक लाभ के लिये था। भारत का रुख जापान समझौता और कोरिया युद्ध के मुद्दे पर अमेरिका के खिलाफ था। कोरिया मुद्दे पर अमेरिका के खिलाफ भारत ने वोट भी दिया था। भारत ने दो ध्रुवीय विश्व से अलग एशिया और अफ्रीका के नव स्वतंत्र देशों के बीच खुद को नेतृत्व के लिये तैयार किया और नेहरू, टीटो, नासिर की त्रयी ने गुट निरपेक्ष देशों का एक नया ब्लॉक बनाया, जिसे तीसरी दुनिया कहा गया। अमेरिका के तथाकथित ऑफर पर के शंकर बाजपेयी कहते हैं,

” यह धारणा ही हवा में थी। भारत का अमेरिका के साथ मतभेद तो जापान समझौता और कोरिया युद्ध के समय खुल कर आ गया था। यह कूटनीतिक संकेत तो भारत को अपने खेमे में लालच दे कर फुसलाने का था। नेहरू अमेरिका की यह कूटनीतिक चाल समझ गए थे, और वे यह भी भांप गये थे कि खुद अमेरिका भी इस तथाकथित ऑफर पर संजीदा नहीं था। इस प्रकार की हल्की फुल्की बातचीत को गंभीर पेशकश या ऑफर कूटनीतिक भाषा मे नहीं कहा जाता है। ”

यह विवाद नया नहीं है। 27 सितंबर 1955 को लोकसभा में डॉ जेएन पारिख ने सरकार से इस आफर के बारे में सवाल भी पूछा था।

लोकसभा में नेहरू का उत्तर था

” ऐसा कोई भी ऑफर नहीं था। न औपचारिक और न ही अनौपचारिक। प्रेस में इस संबंध में ऐसी कुछ खबरें ज़रूर छपी हैं पर उनका कोई आधार नहीं है। सुरक्षा परिषद का गठन यूएन चार्टर के अनुसार हुआ है। अतः किसी नए सदस्य का शामिल होना और पुराने सदस्य का हटना बिना चार्टर में संशोधन के संभव ही नहीं है। अतः किसी भी प्रकार के स्थायी सदस्यता के ऑफर करने और उसे अस्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता है। हमारी घोषित नीति है कि इस विश्व संस्था में दुनिया के सभी देशों को सम्मिलित किया जाय। ”

जवाहरलाल नेहरू का यह बयान इस संबंध में उठ रहे सभी विवादों का शमन कर देता है।

© विजय शंकर सिंह