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नज़रिया – मज़ाक उड़ाने का विषय नहीं रहे "राहुल गांधी"

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यह लेख मूलतः विख्यात अमरीकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट में अंग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित हुआ था. जिसे प्रसिद्ध अंग्रेज़ी पत्रकार बरखा दत्त ने लिखा था, हमारी कोशिश होती है कि अंग्रेज़ी भाषा में लिखे गए अच्छे लेख हिंदी भाषा के दर्शकों तक पहुंचाये जाएँ.


राजनीती में सबकुछ होता है, सबकुछ चलता है, सबकुछ वास्तविकता भी है और सबकुछ काल्पनिक भी, राजनीती का भ्रमजाल बेतरतीबी से गढ़ा हुआ कोई खेल लगता है, जिसमे हर रोज कोई जीतता है तो कोई हारता है. भारत के सबसे ताकतवर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में हाल ही में चुनाव सपन्न हुए, जिसमे भारतीय जनता पार्टी रिकॉर्ड छठी बार सत्ता पर काबिज़ हुई लेकिन रोचक बात यह है की इस चुनाव के नतीजों ने गुजरात में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी की छवि में बेहद जरुरी सुधार किया है.
यह चौंकाने वाला इसलिए भी है की भाजपा भले ही यह चुनाव जीतने में कामयाब रही है लेकिन उसे उम्मीद से बेहद कम सीटें हासिल हुई हैं और कांग्रेस हारने के बावजूद कई मायनो में जीत गयी है. लगभग एक साल पहले मैं उत्तर प्रदेश में अपने भ्रमण के दौरान एक कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता से मिली जिसने मुझसे बातचीत के दौरान यह सवाल किया की “आप सब मीडिया वाले क्यों राहुल गाँधी को पप्पू कहते हैं? आप देखेंगी की एक दिन यही पप्पू शानदार जीत हासिल करेगा”.
हालाँकि कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन उपाध्यक्ष, अभी के अध्यक्ष और नेहरू-गाँधी परिवार के वारिस, राहुल गाँधी के लिए ‘पप्पू’ शब्द का इस्तेमाल साफ़ मायनो में अपमानजनक और बेहूदा था, लेकिन राहुल गाँधी के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग कोई आम बात नहीं थी. राहुल गाँधी के साथ मूलभूत समस्या यही रही है, व्हाट्सएप्प से लेकर फेसबुक पर मीम बनाने तक, राहुल गाँधी को कभी गम्भरीता से नहीं लिया जाता रहा है.

हालाँकि अपने चिर प्रतिद्वंदी और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उम्र में करीब २० साल कनिष्ठ होने के बावजूद वो इस ‘युवा’ छवि को भुना नहीं पाए हैं. यही नहीं राहुल गाँधी पर उनके बात करने के लहज़े, भाषण देने के तरीके और उनके छुट्टियों पर विदेश जाने तक का उपहास उड़ाया जाता रहा है. उनकी छवि विदूषक सरीखी बनायीं गयी है. और उनके सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ‘सेल्फ-मेड’ व्यक्ति के तौर पर दिखाया जाता रहा है,जिन्होंने राहुल गाँधी की तरह सत्ता विरासत में नहीं पायी है.
लेकिन गुजरात चुनाव ने तस्वीरें बदल दी हैं, भारतीय राजनीती आज दो खेमों की लड़ाई के रूप में समझी जा सकती है,जहाँ एक ओर कांग्रेस की विरासत वाली राजनीती है. तो वहीँ दूसरी तरफ मोदी के नेतृत्व में नवोदित भाजपा है. हालाँकि अगर गुजरात की बात की जाये तो राहुल गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी है और यह देखना रोचक है की कांग्रेस गुजरात चुनाव हार जाने के बावजूद आत्मविश्वास से भरी नजर आ रही है, जिसमे राहुल गाँधी की विशेष भूमिका है.

चुनाव प्रचार के दौरान गुजरात में राहुल गांधी


गुजरात की लड़ाई में राहुल गाँधी सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभर कर आये हैं जिन्होंने अंतिम क्षणों तक चुनाव में प्रचार किया और यह कहना गलत नहीं होगा की पिछले २२ सालों में भाजपा के गुजरात में सबसे ख़राब प्रदर्शन के लिए वो ही जिम्मेदार हैं. राहुल गाँधी ने गुजरात में लड़ाई भले हारी हो लेकिन उन्होंने अपना सम्मान जरूर जीता है.
हालाँकि कांग्रेस के सामने मुश्किलें बहुत भीषण हैं, गुजरात चुनाव में जिस तरह से राहुल गाँधी मंदिरों में दर्शन करते दिखाई दिए उसने नेहरू की धर्मनिरपेक्षता वाली सोंच पर एक प्रश्नचिन्ह लगाया है. जहाँ नेहरू खुद ‘धर्म एवं राजनीती’ को एक दूसरे से जुदा देखते थे, वहीँ आज कांग्रेस अपने आपको ‘हिन्दू-विरोधी’ छवि से बाहर निकालने की जुगत में तरह तरह के प्रयास कर रही है. फिर भले वह राहुल गाँधी का खुदको महाकाल का भक्त कहना हो या उनकी पार्टी का उन्हें एक हिन्दू बताना हो.
भाजपा की तुलना में कांग्रेस अपने आप को किसी धर्म विशेष के करीब दिखाने में नाकाम रही है और यही वजह थी की जब मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर पाकिस्तान से गुजरात चुनाव पर चर्चा करने का आरोप लगाया तो कांग्रेस उसका कोई कठोर जवाब नहीं दे पायी क्यूंकि उसे किसी भी धर्म विशेष को आहत होते नहीं देखना था.

गुजरात चुनाव में कांग्रेस किसानों के अधिकारों की बात करने और ग्रामीण क्षेत्रों में ‘पैरेलल नैरेटिव’ बनाने में कामयाब रही हालाँकि भाजपा ने उसे शहरी इलाकों में पछाड़ दिया बावजूद इसके की नोटबंदी और जीएसटी का बुरा प्रभाव शहरी क्षेत्रों पर खूब पड़ा था और भाजपा को शहरी इलाकों में जबरदस्त शिकस्त पाने का खतरा था.
कांग्रेस के लिए समस्या यह है की वो शहरी क्षेत्रों में किस भी प्रकार से अपने संगठन को मजबूत करने में कामयाब नहीं हो पायी है. लेकिन अभी के लिए, गुजरात से दो तथ्य जरूर उभर कर आते हैं और वह हैं मोदी की राजनैतिक सूझबूझ और राहुल गाँधी का एक सफल नेता के रूप में उभार.
राहुल गाँधी की बदलती छवि का अंदाजा इसी बात से लगता है की जब हाल ही में गुजरात चुनाव के हार के पश्च्यात राहुल गाँधी को ‘स्टार वार्स’ नामक मूवी देखने जाने के लिए एक प्रमुख न्यूज़ चैनल की आलोचना झेलनी पड़ी थी तो अन्य मीडिया ने उसी चैनल को आड़े हाथ लिया था और उस चैनल पर बेवजह मामले को तूल देने का आरोप लगाया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में भले कोई कमी न हुई हो लेकिन यह तय है की राहुल गाँधी का उपहास उड़ाना अब बंद करदेना चाहिए.
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