स्वास्थ्य

क्या बिन तम्बाकू वाले पान मसाले 'सेफ' हैं

क्या बिन तम्बाकू वाले पान मसाले 'सेफ' हैं

बिन तम्बाकू वाला पान मसाला खा रहे हैं, कत्था, चूना, सुपारी जैसी नैचुरल चीज़ें हैं इसमें। दिक्कत क्या है?”
नहीं, ये किसी नशेड़ी पाउच पिचकू के विचार नहीं बल्कि एक सभ्य, सम्भ्रान्त, उच्च शिक्षित महिला के विचार हैं।
थोड़ा ढूंढने पर समान विचारधारा वाले कई ‘मासूम’ मिले, जो समझते हैं तम्बाकू ही सारे फसाद की जड़ है।
दरअसल हममें से ज़्यादातर यही सोचते हैं कि तम्बाकू ही मेन कलप्रिट है बाकी सब निर्दोष हैं।
कई एडिक्ट यह भी मानते हैं कि तम्बाकू भी एंवें ही बदनाम है। हमारे बाप दादा खाते थे, हम खाते हैं किसी को कुछ नहीं हुआ अब तक।
एक बात ध्यान रखें, कैंसर किसी एक कारण से नहीं होता। कोई एक श्योर शॉट फैक्टर नहीं होता। अलग अलग कारक मिलकर काम करते हैं। हर किसी को हो ज़रूरी नहीं पर नुकसान हर एक को होगा ही यह अटल सत्य है।
हम जिस हवा में सांस ले रहे हैं, जो पानी पी रहे हैं, जो खा रहे हैं, कई कई बीमारियों के जीवाणु अंदर ले रहे हैं। हमारे शरीर में पहले से भी काफी मौजूद हैं। हमारे कई जींस में बड़ी बड़ी बीमारियों के कारक मौजूद हैं।
ये वर्षों तक या जीवनपर्यंत सुसुप्तावस्था में पड़े रह सकते हैं। या जब भी अनुकूल माहौल मिले, कई कारक इकट्ठा हो जायें, हमारा प्रतिरक्षा तंत्र या इम्युनिटी कमज़ोर हो जाये, तो ये उस बीमारी को ट्रिगर कर देते हैं।
बाजार में जीरो टोबेको के नाम से बिक रहे मशहूर ब्रांडों के पान मसाला भी गुटखा और तंबाकू जितने ही खतरनाक हैं। इनमें गुटखा और तंबाकू उत्पादों से कहीं ज्यादा मात्रा में निकोटिन पाया गया है, जबकि यह जीरो प्रतिशत होना चाहिए। यह खुलासा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की सिफारिश पर केंद्रीय तंबाकू अनुसंधान संस्थान (सीटीआरआई) राजमुंदरी की जांच रिपोर्ट में हुआ।
सीटीआरआई ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की सिफारिश पर बाजार में मौजूद पान मसाला, तंबाकू और गुटखा उत्पादों के सैंपल लिये थे जिनमें अत्यधिक मात्रा में निकोटिन पाया गया।
मप्र के भोपाल की स्टेट फूड टेस्टिंग लेबोरेट्री की जांच में पान मसाला में किडनी और लीवर को डेमेज करने वाले खतरनाक तत्व पाए गए। मप्र के खाद्य व औषधि विभाग ने आरएमडी, राजश्री और विमल प्रीमियम पान मसाला के सैंपल लेकर स्टेट लेब में भेजे थे। जांच में सभी पान मसाला में टोटल एश, एश इन्सॉल्यूबल इनडाइल्यूट हाइड्रोक्लोरिक एसिड और मैग्निशियम काबरेनेट जैसे खतरनाक तत्व पाए गए। इन तत्वों का पान मसाला में प्रयोग पूरी तरह प्रतिबंधित है।
सीटीआरआई तंबाकू पर शोध करने वाली केंद्र सरकार की सर्वोच्च संस्था है। यह संस्थान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अधीन काम करता है। इसकी रिपोर्ट विश्वसनीय मानी जाती है।
इसके अनुसार निकोटिन (%) पान मसाला (रजनीगंधा )2.26 गुटखा (गोवा 1000)2.04 गुटखा आरएमडी1.88 खैनी (राजा)1.02 खैनी (चैनी-खैनी)0.58 पाया गया।
पान-मसाला, सुपारी, ज़र्दा, तंबाकू आदि के सेवन करने से होठ, गाल, दांत, गर्दन और फेफड़ों का कैंसर हो सकता है।
तम्बाकू न भी मिला हो तो सुपारी, चूना, कत्था और ढेरों केमिकल्स, आर्टिफिशयल फ्लेवरिंग एजेंट्स और हानिकारक तत्व बक्कल कैविटी को डैमेज करके प्रि कैंसरस लीज़न्स बनाने में सक्षम हैं। सबम्यूकोज़ल फाइब्रोसिस होकर मुँह न खुल पाने की समस्या तो आम है ही।
इनसे मुंह में छाले बनने लगते है, संपर्क भाग की म्यूकस ग्रंथियों में सिकुड़न आ जाने के कारण कोई भी कड़ी वस्तु चबाने-खाने में दर्द होता है।
जबड़ों का खुलना निरंतर घटता जाता है पान-मसालों व गुटका आदि में विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थ मिलाये जाते हैं। कई अपुष्ट सूत्र बताते हैं कि नशे के लिये छिपकली का पाउडर भी मिलाया जाता है हालांकि पुख्ता नहीं है ये बात, पर घोषित कंटेंट्स पर भी मुझे तो विश्वास नहीं। जो डालते हैं, सब कुछ कौन बताता है?
वैसे भी इन पदार्थों में पाए जाने वाले विभिन्न विष ही मुंह के कैंसर के लिए पर्याप्त हैं।
ये पदार्थ मुंह, गले व भोजन की नली तथा पाचन संस्थान में पहुँचकर पतली तह के रूप में जम जाते हैं।
ये धीरे-धीरे सूजन का रूप धारण कर आंतरिक त्वचा पर जम जाते है जो आसानी से साफ नहीं होती। ये आंतों में भी जम जाते है और धीरे-धीरे कैंसर में बदल जाते हैं।
मुंह व गले में छाले, खाने में जलन यहाँ तक कि ताजे पानी से भी जलन, रक्तचाप बढ़ना, हृदयगति तेज होना, घबराहट, उल्टी, चक्कर आना, छाती का दर्द जैसी प्रारम्भिक शिकायतों के बाद में समस्या गम्भीर भी हो सकती है।
मसूड़े जो दांत की पकड़ मजबूत करने का काम करते हैं, वे कमजोर पड़ जाते हैं। दांत पीले हो जाते है।
यहां तक कि ये हानिकारक तत्व हमारे डीएनए में बदलाव करने में भी सक्षम हैं।
ये मेल इनफर्टिलिटी का भी कारण बन सकते हैं।
केवल इन पदार्थों के प्रयोग से ही प्रतिवर्ष लगभग ८ लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है।
सुनने में आया है कि सुपारियों में प्रति सुपारी 10 से 12 घुन (एक प्रकार के कीड़े) लग जाते हैं, तभी वे पान मसालों या गुटखा बनाने में हेतु काम में ली जाती हैं।
टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल के अनुसार
Pan masala (PM) is a mixture of areca nut with slaked lime, catechu and other flavoring agents. It is widely available and used by all the sections of the Indian society. It is genotoxic as it increases sister chromatin exchange and chromatin aberrations. Among humans, it is a leading cause of oral submucous fibrosis that often progresses to oral cancer. Among experimental animals, it leads to neoplastic lesions in lung, liver and stomach. It is hepatotoxic leading to increased level of enzymes, deranged carbohydrate and lipid metabolism. It is harmful to kidneys and testes leading to increased creatinine and sperm deformities respectively. PM is a very harmful substance affecting almost all organ systems, and there is immediate need for a national policy on complete ban on the production, storage, sale and marketing of PM.
सरकारें तो वैधानिक चेतावनी छपवाकर कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं, बाकी स्वास्थ्य आपका है। इसी शरीर में जीवन बिताना है न पूरा??

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