विचार स्तम्भ

क्या आपको ये हत्याएं एक जैसी नज़र नहीं आती

क्या आपको ये हत्याएं एक जैसी नज़र नहीं आती

मता-ए-लौह-ओ कलम छिन गई तो क्या गम है
कि खून ए दिल में डूबो ली हैं उंगलियां मैंने
RIP Freedom of Expression

फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का आलम ये है कि सोशल मीडिया पर अगर आप अपने देश के प्रधानमंत्री से ये पूछते हैं कि वो सिलेक्टिव साइलेंस क्यों अख्तियार करते हैं,तो आप से पलट के कहा जाएगा कि पीएम क्या हर बात पर ट्वीट करेंगे और आप पूछने वाले हैं कौन। भईया इसलिए कि छोटे-बड़े जैसे भी हैं हम सब इस देश के नागरिक हैं। वो देश के मुखिया की कुर्सी पर हैं, और जवाबदेही उन्हीं की है। उनसे ना सवाल करेंगे तो किससे करेंगे ? और एक बात सिलेक्टिव साइलेंस का ऑप्शन पीएम के पास नहीं है। संविधान उनसे अपेक्षा करता है कि वो सबके हों।
प्रधानसेवक जी सेलेक्टिव साइलेंस बहुत सही चीज़ नहीं है। ये लोगों को अपने हिसाब से खामोशी को अलग-अलग तरीके से पढ़ने का मौका देती है।
खुद को राष्ट्रवादी कहने वालों से सिर्फ एक सवाल बाकी सारी बातें छोड़ भी दी जाएं तो क्या किसी की भी हत्या को जायज़ ठहराना सही है? अगर ऐसा है तो वो भीतर झांकें और देखें कि वो अब इंसान भी बाकी रह पाएं हैं कि नहीं।
जून 2014 में डॉ कलबुर्गी के धारवाड़ वाले घर पर पत्थर फेंके गए थे,जान से मारने की धमकी दी गई थी। घटना के बाद उन्हें पुलिस सुरक्षा दी गई,जो कुलबर्गी ने ये कह कर हटवा दी ‘रोज़ाना दर्जनों छात्र अपने कई सारे सवाल लेकर मिलने आते हैं इस उम्मीद में कि इस घर में उन्हें सवालों के जवाब तलाशने में मदद मिलेगी
ऐसे में पुलिस सुरक्षा का तामझाम उनके लिए दिक्कतें पैदा करता है जो मुझे मंजूर नहीं”।जाहिर है पुलिस सुरक्षा हटने के कुछ महीने बाद ही उन्हें घर में घुसकर मौत के घाट उतार दिया गया।
मौत का खतरा मंजूर था लेकिन उदारवादी फितरत छोड़ना नहीं । तार्किकता और उदारवाद की ज़मीन भी खुले आसमान की ओर खुलती है। लेकिन कट्टरपंथ की संकरी गली में पीछे से हमला करने वालों को ये बात कभी समझ नहीं आएगी। उन्हें ना कलबुर्गी समझ आएंगे,ना ही गौरी लंकेश।

  • 2015 के नवंबर में सरकार राज्य सभा में कहती है पनसारे,दाभोलकर,कलबुर्गी की हत्या का आपस में कोई कनेक्शन नहीं है। 3 नवंबर 2015 को किरण रिजिजू ने राज्यसभा में कहा था कि ”दाभोलकर,पनसारे और कलबुर्गी की हत्याओं के तार आपस में जुड़े नहीं हैं। अब जबकि जांच कर रही एजेंसियों ने इनके तार अदालत के सामने रख दिए हैं। एक सवाल उठना जायज़ है कि सरकार के इस अतिआत्मविश्वासी बयान के पीछे कौन से सॉलिड तर्क थे ?
  • उसी साल पनसारे की बहू मेघा ने कहा कि हत्याओं का आपस में कनेक्शन है,इसलिए जांच एजेंसियों को मिलकर काम करना चाहिए
  • 2016 में बॉम्बे हाईकोर्ट सीआईडी और सीबीआई दोनों को इन केसों पर मिलकर काम करने का आदेश देती है ।
  • 28 अगस्त 2017 को कोर्ट ने जांच एजेंसियों की रिपोर्ट को देखकर कहा कि ये तय हो गया है कि पनसारे और दाभोलकर हत्याकांड के तार आपस में जुड़े हुए हैं ।
  • गौरी,कलबुर्गी ,पनसारे और दाभोलकर। इन चारों हत्याओं में कई चीज़ें,कई सुराग आपस में गुत्थे हुए दिखते हैं।

ये अलग बात है कि सरकार को शुरुआत से ही कोई समानता नहीं दिखती थी. इन सारी बातों के बाद जिन लोगों को इन हत्याओं में साम्य नहीं दिखता, वो या तो बहुत सीधे हैं,या फिर बहुत शातिर।
(यह लेख लेखक की फ़ेसबुक पोस्ट को एकत्रित करके प्रकाशित किया गया है)

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