नोटबंदी विचार स्तम्भ

नोटबंदी : कभी कभी लगता है कि हम असल में इतने मुर्ख है या होने का नाटक करते है

नोटबंदी : कभी कभी लगता है कि हम असल में इतने मुर्ख है या होने का नाटक करते है

अभी अभी नोट बंदी के आकडे आये साफ़ हो गया की प्रधानमन्त्री ने अपने भाषण में नोट बंदी के जितने फायदे गिनाये थे उनमे से एक भी सफल नहीं रहा.
न तो जाली नोट पकडाए, न तो काला धन पकडाया और न ही आतंकवाद ख़त्म हुआ तो सवाल है हुआ क्या. हुआ ये की अमीर हो या गरीब सब परेशान हुए, लोगों की मौते हुई, जीडीपी गिरी, कई शादियाँ रुकी, बुजुर्ग और गरीब सब बैंकों की लाइनों में दिखे, छोटे उद्योग बंद हुए, लोगों का रोजगार छिना, बैंकों के ट्रांसजिकशन टैक्स बढे, सेविंग और स्थाई जमा पर ब्याज घटा, नए रोजगार रुक गए.
मैं जब अपने दोस्तों और जानाने वालों से कहता था की ये सारी कवायत सिर्फ बैंकों के npa की भरपाई और सामानांतर अर्थव्यवस्था के पैसों को बैंकों तक पहुचाना था और देश के लिए हानिकारक होगा तो सब हसते थे. असल में मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं और न ही बहुत पढ़ा लिखा हूँ पर जीतनी समझ है उसके अनुरूप इसके परिणाम देख पा रहा था.
पर जब आज सच्चाई सामने है तब भी शायद वो इस बात पर यकीन न करेंगे. चलिए कोई बात नहीं पर ऐसे माहौल में कहीं महसूस जरूर होता है की हम कहीं अपनी अतिबुधिमत्ता और स्वार्थ में इतने समा गए है की हम देश हित को कहीं भूलते जा रहे है.
चलिए वो तो दूर गया हम अपना ही अहित किसी का गुणगान कर, कर रहे है आत्म स्वाभिमान को पहचाने और मीडिया के पहनाये चश्मे से बाहर आकर सरकार के कार्यों का सही आकलन करे और असल में स्वयं के भक्त बने. इसीलिए कभी कभी लगता है कि हम असल में इतने मुर्ख है या होने का नाटक करते है.

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Navendu Mishra

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