October 26, 2020
देश

सवाल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का है

सवाल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का है
25 अक्टूबर 1951 को आज़ाद भारत ने पहली बार आम चुनाव में हिस्सा लिया, मतदान की प्रक्रिया चार महीने तक चली, इसी के साथ भारत ने दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र बनने के लिए पहली सीढ़ी पर अपना कदम रखा। तब से आज तक भारत अपनी लोकतांत्रिक गरिमा को विश्व के समक्ष मिसाल के रूप रखता है। “इतिहास का सबसे बड़ा जुआ” कहे जाने वाले भारतीय चुनाव आज व्यवस्थित मानवीय जीवन का पर्यायवाची बन गया है। कुछ अंग्रेज़ नुमाइंदो के मुताबिक वह लाखो अनपढ़ लोगों के मतदान की बेहूदी नौटंकी थी, वो बात अलग है कि वर्तमान समय मे वो नुमाइंदे अपने शब्दों पर सिर्फ़ अफ़सोस ही व्यक्त कर सकते हैं। भारत में अंनपढ़ता व गरीबी को चुनावी व्यवस्था का रोड़ा न समझते हुए इनसे ऊपर उठकर इन्हीं की भलाई के लिए इन्हीं लोगो द्वारा एक ऐसी व्यवस्था तैयार की गई जी भविष्य में भारत की रूपरेखा, पहचान, आत्मा का कार्य करेगी।
यह चुनाव इस बात का समझने के लिए काफ़ी था कि गरीबी व अशिक्षित व्यक्ति भी मानवता के विकास, साझा विरासत, सहयोग जैसे मुद्दों न सिर्फ़ को समझता है बल्कि उचित निर्णय करने में भी सक्षम है। इस पूरी प्रक्रिया को सफल बनाने का जिम्मा व सफलता का श्रेय चुनाव आयोग को जाता है, सुकुमार सेन ने स्वतंत्र भारत में होने जा रहे पहली बार चुनाव का खाका तैयार कर उसमें पूरी भारतीय व्यवस्था को समेट दिया। भारत में होने वाले चुनाव सिर्फ़ इसलिए ख़ास नहीं थे क्योंकि वो भारत में पहली बार हो रहे थे बल्कि इसलिए भी ख़ास थे क्योंकि इसमें मतदान करने वाली 80% आबादी अशिक्षित थी, इन्हीं चुनावों में पहली बार सर्वभोमिक मताधिकार व महिलाओं के मताधिकार को महत्व दिया गया था, यह उन अमीर और शिक्षित पश्चिमी देशों के लिए शर्म का अवसर था जिन्होने महिलाओं को मताधिकार से वंचित रखा।
भारतीय चुनाव व्यवस्था व चुनाव आयोग की सफलता का बखान आज भी हर चुनाव किया जाता है, लेकिन 1952 से 2017 तक आते आते चुनाव अयोग की छवि कुछ धूमिल हो गईं है। राजनीतिक षड्यंत्रों के काले बादलों ने आयोग को अपनी चपेट में ले लिया लिया। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति हो या निष्पक्ष मतदान, संदेह की ऊंगली इसकी भूमिका पर उठनी शुरू हो गई जो कि भारत जैसे सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में चिंता का विषय होना चाहिए।
इसमें कोई दो राय नहीं की चुनाव आयोग भारतीय जनतंत्र को अपने कंधो पर 65 सालो से उठाए हुए है बिना इसके लोकतंत्र के मंदिरों में कोई दीपक जलाने वाला ना होगा। लेकिन ये भी एक कटु सत्य है कि यहां आगे से इसे अपने विश्वास को पुनः प्राप्त करने में कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। पिछले दिनो कुछ राज्यों के मतदान में हुई गड़बाद, मतो को गिनने में गलतियां व गुजरात में चुनावों के लिए केंद्र सरकार के आदेश का इंतज़ार करना, जनता अपना हृदय कड़ा करके इसकी तरफ़ संदेह की नज़र डालने पर मजबूर करता है.
जहाँ चार कदम पर पानी व आठ कदम पर वाणी बदल जाती है इतनी विविधता वाले राष्ट्र में सबसे मुश्किल कार्य होता है “चुनाव कराना”। चुनाव आयोग की प्रवृत्ति एक साधु की भांति होनी चाहिए जी स्वयं को सभी मोह माया, प्रलोभनो से दूर रखे व सिर्फ़ ईश्वर (लोकतंत्र) की पूजा करे। इस वक़्त इसकी भूमिका संदेह से घिरी हुई है लेकिन अन्य कुछ मेहकमो /आयोगो की तरह चुनाव आयोग पर भी लोगो का गुस्सा फूट पडे इससे पहले चुनाव आयोग को अपना राजनीतिक मोह त्याग देना चाहिए ऐसी कामना की जाती है।
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Ankita Chauhan

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