सन् 85 के बाद पैदा होने वालों के साथ एक बड़ी दिक्कत हो रही है। इनमें से अधिकतर को देश और धर्म के बीच फर्क करना नहीं आ रहा है। ये दिक्कत कश्मीर में उन लोगों के साथ भी है जो सशस्त्र संघर्ष कर रहे हैं, और उनके भी साथ है जो बाकी भारत में मुसलमानों को पीटते हुए भारत मां की जय बोल रहे हैं। हो सकता है कि पाकिस्तान, वेटिकन या किसी और देश का आधार धर्म हो , लेकिन आपकी बदकिस्मती या खुशकिस्मती से भारत का आधार धर्म नहीं धर्मनिरपेक्षता है। अगर आप धर्म को किसी देश के बनने या होने का आधार मानते हैं तो दरअसल आप अनजाने में मोहम्मद अली जिन्ना के साथ खड़े हैं।

भारत आपके रुझान से नहीं बल्कि सोची-समझी नीति के तहत धार्मिक आधार पर देशों को मान्यता नहीं देता। यही वजह थी कि वो इज़रायल को भी मान्यता देने से झिझकता रहा। ऐसी कोई भी मान्यता उसे पाकिस्तान के पक्ष को सही मानने के लिए मजबूर कर सकती है। आपकी भोथरी सोच उस नीति तक पहुंचती ही नहीं, क्योंकि ना आपको पढ़ने-लिखने से मतलब है और ना मुक्त विचार से संबंध। कश्मीर में 1947 से शुरू हुआ राजनीतिक संकट आज वहां चल रही मिलिटेंसी से एकदम अलग है। जो पीढ़ी राजनीतिक संकट से जूझ रही थी वो जा चुकी। उसकी जगह मज़हबी उन्माद में पागल लड़कों ने ली है।

ये कहानी सन 1988 के बाद से बदली है। ठीक यही बाकी हिंदुस्तान में बाबरी गिरने के बाद 1992 से हुआ है। यहां भाजपा और शिवसेना जैसी पार्टियों ने लोगों को ये समझाने में कामयाबी हासिल कर ली है कि हिंदू इस देश का मूल और सच्चा नागरिक है। उसने धर्म को देशभक्ति सिद्ध करने की कसौटी बना डाला है। यही वो कसौटी है जो जिन्ना ने पाकिस्तान बनने से पहले सामने की थी और बनने के बाद पलट गए थे। तो कई तरह से उस वक्त की मुस्लिम लीग और आज की भाजपा में बहुत फर्क नहीं है। सिद्धांत के स्तर पर दोनों एक -दूसरे की दोस्त हैं।

इस देश को बचाना है तो इस सोच से मुक्त होना पड़ेगा कि मुसलमान गद्दार है या वो मन ही मन पाकिस्तान की तरफ है, या फिर वो आबादी बढ़ाकर देश पर कब्ज़े की किसी साज़िश में शामिल है (ऐसा कहीं नहीं हुआ है, और हिंदू आबादी के बढ़ोतरी का प्रतिशत अब भी ज़्यादा है)। अगर ये देश भाजपा की इकहरी सोच के सामने सरेंडर कर देता है तो अंग्रेज़ों की भविष्यवाणी सच हो जाएगी। इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब में लिखते हैं कि ब्रिटिश लोग अपने विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे कि हिंदुस्तान को विभाजित होना ही है क्योंकि वो देश के तौर पर असफल रहेगा। इतनी भाषा, संस्कृति और धर्म का एक साथ चल पाना व्यवहारिक नहीं है।

तो नेहरू को लाखों गाली दीजिए क्योंकि वो गलती भी करते थे लेकिन अंग्रेज़ों की भविष्यवाणी को इतने सालों तक हम गलत ही नेहरू की नीति के चलते साबित कर सके.. और उनकी नीति धर्म और देश को अलग रखने की थी।

– नितिन ठाकुर