विचार स्तम्भ

लमहों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई है

लमहों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई है

कुछ गिने चुने लोगों के पाप की सजा कई नस्लों को भुगतना पड़ता है आमजनों को भुगतना पड़ता है बाबरी मस्जिद को गिराए जाने का पाप भी कुछ ऐसा ही है पिछले दो पीढियों ने भुगता है और आने वाली कई पीढयो को शायद भुगतना पड़े इस बात का बहुत ज्यादा फिक्र है
“इलाहाबाद हाईकोर्ट (2010 का फैसला) का फैसला आने से पहले, प्रधानमंत्री वीपी सिंह के ज़माने में विश्व हिन्दू परिषद के साथ कई राउंड्स की बातचीत हुई लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका पर कहा कि रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद मामले दोनों पक्षों को बातचीत के आधार पर हल निकालना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि कोर्ट से बाहर बातचीत कर दोनों समुदाय के लोग मसले का हल ढूंढ लें. कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जरूरत होगी तो कोर्ट इस मामले में मध्यस्थता करने को तैयार है. वहीं इस मामले में जब बाबरी एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी का कहना है कि, अगर सुप्रीम कोर्ट कोई लिखित में कुछ कहता है, या हमें आदेश देता है कि आपको समझौते के लिए आना चाहिए तो हम जरूर जाएंगे. लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी इस केस में कुछ भी नहीं है. कोर्ट हमें सीधे कहेगा तो जाएंगे. इस मुद्दे पर देश के पांच प्रधानमंत्री राजीव गांधी, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह ने समझौते की कोशिश की. तांत्रिक चंद्रास्वामी, शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती, रामजन्म भूमि के मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास और पर्सनल ला बोर्ड अध्यक्ष अली मियां, मौजूदा अध्यक्ष राबे हसन नदवी औऱ पर्सनल ला बोर्ड उपाध्यक्ष कल्बे सादिक, जस्टिस आलोक बसु आदि ने भी समझौते के प्रयास किए थे, लेकिन कुछ भी कामयाबी नहीं मिली.जिलानी ने कहा कि अगर सीजेआई हमें बातचीत के लिए बुलाते हैं तो हम जाएंगे. हमें उन पर विश्वास है. उन्होंने कहा कि कोर्ट के बाहर समझौता मुश्किल है. इससे पहले भी 9 बार समझौते की कोशिशें विफल हो चुकी हैं.
भारत के इतिहास में बाबरी मस्जिद को गिराए जाने से जिस तरह से देश में नफरत का सिलसिला दिन प्रतिदिन बढ़ता चला गया दो समुदायों के बीच में नफरत की दीवार खड़ी हुई दीवार पर चढ़ते हुए अनगिनत लोग बड़े बड़े नेता बन गए प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए मगर राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद मसले को ईमानदारी से हल होने नहीं दिया गया क्योंकि अगर यह मुद्दा हल हो जाता तो कईयों के राजनीति की दुकान हमेशा के लिए बंद हो जाती इसलिए हेडगेवार गोलवलकर और वी डी सावरकर की विचारधारा ने हमेशा इस आग में पानी डालने के बजाय घी डालने का प्रयास किया. इस आग से जो शोले भड़के उसकी लपटों में झुलसकर हजारों जाने चली गईं,कितने यतीम हो गए कितनी विधवाएं हो गई.
21 मार्च को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) की तरफ से कहा गया है कि दोनों पक्ष इस मामले को कोर्ट के बाहर सुलझा लें तो ठीक रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह धर्म और आस्था से जुड़ा मामला है इसलिए इसको कोर्ट के बाहर सुलझा लेना चाहिए। कोर्ट ने इसपर सभी पक्षों को आपस में बैठकर बातचीत करने के लिए कहा है। इसपर राम मंदिर की तरफ से लड़ रहे सुब्रमण्यम स्वामी ने बताया- कि कोर्ट ने कहा कि मस्जिद तो कहीं भी बन सकती है। इस मामले पर अब 31 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी।
बलबीर कहते है ” रामायण नामक एक सीरियल बनाया गया उस के द्वार लोगों के अंदर राम नाम की आस्था पैदा की गई फिर इसी इसी आस्था को बाबरी विध्वंश में काम लाया गया. समस्त साधु समाज को जोड़ने के लिए 1990 चरण पादुका यात्रा चलाई गई जिसके द्वारा समस्त साधु समाज को एक किया गया.
जिस समय यह यात्रा चलाई गयी उस समय देश के 406 सीटें थी फिर 40 हजार रथ पुरे देश में भेजे गए उन्होंने पूरे देश का चक्कर लगाया और इस यात्रा की कामयाबी के बाद 6 दिसंबर एक सडयंत्र रचा गया. फिर एक नारा दिया गया
‘राम लला हम आएंगे मंदिर वही बनाएंगे’ इस नारे ने अपना काम दिखाना शुरू कर दिया
मस्जिद को शहीद कर दिया गया ,और मस्जिद मंदिर की राजनीति ने कितने नेताओं को सत्ता तक पहुंचा दिया मगर विवाद समाप्ति तक नहीं पहुंच पाया
हम यह सोच कर परेशान हो उठते है कि हमारे बच्चे भी इस नफरत भरे माहौल में अपने भविष्य को बर्बाद होता देखेगा. राजनीति को छोड़ दीजिए राजनेताओं की भक्ति को त्याग दीजिए यदि आप को अपने बच्चों के भविष्य की जरा भी फिक्र है तो, वरन् हमारे बच्चे हमें कोसेंगे, हमारे बच्चों की बर्बादी हमारी आत्माओं को परेशान कर देंगी ।
 
फैजान तबरेजी
(शि• शिक्षा विभाग बिहार)

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Faizan Tabrazee

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