दक्षिण कश्मीर के एक इलाके से जम्मूकश्मीर के एक डीएसपी देवेंदर सिंह को अपनी गाड़ी में हिजबुल मुजाहिदीन के दो आतंकियों के साथ जम्मू जाते हुए गिरफ्तार किया गया था। जिस कश्मीर में कई दशकों से आतंकवाद और आतंकियों के खिलाफ पुलिस सहित सभी सुरक्षा बल एक साझा अभियान चला रहे हैं, उसी दक्षिण कश्मीर में एक डीएसपी अपनी ही गाड़ी में दो हिजबुल आतंकियों को लेकर कहीं जा रहा हो, यह बेहद चौकाने वाली बात है। देवेंदर सिंह को चेकपोस्ट पर तैनात डीआईजी ने बंदी बना लिया और अब उसके ऊपर आपराधिक धारा के मुक़दमे दर्ज कर लिए गए हैं और उस मुक़दमे की विवेचना एनआईए को दे दी गयी है। पर हैरानी की बात है कि उन मुकदमों में देवेंदर पर सेडिशन का मुकदमा दर्ज होने का उल्लेख नहीं है। यह भी हो सकता है कि, यह मुकदमा बाद में विवेचना के दौरान जोड़ दिया जाय।

एक डीएसपी की अपने निजी गाड़ी में रात के समय दो आतंकियों को लेकर जम्मू की तरफ जाना एक चिंतित करने वाली घटना है। हाइवे चेक प्वाइंट पर एक कार को रोका गया जिसमें यह आतंकी और डीएसपी देवेंदर सिंह बैठे थे। अब जैसा कि विस्तृत विवरण आ रहा है देवेंदर सिंह को राष्ट्रपति के मेडल से सम्मानित किया जा चुका है और वह सुरक्षा के दृष्टिकोण से सबसे संवेदनशील एयरपोर्ट श्रीनगर एयरपोर्ट के ऐंटी हाइजैकिंग सेल का प्रभारी था। उसकी एक फोटो भी हाल ही में श्रीनगर गये यूरोपीय यूनियन के राजनयिकों के प्रतिनिधि मंडल के साथ अखबारों में छपी थी।

एयरपोर्ट या सुरक्षा से जुड़े अतिसंवेदनशील स्थानों पर जिन पुलिस कर्मियों की नियुक्ति होती है वे निश्चित ही विभाग के तेज तर्रार और सबसे अच्छी सत्यनिष्ठा वाले अधिकारी होते हैं। देवेंदर के बारे में भी जेके पुलिस के अफसरों की भी यही धारणा रही होगी। राष्ट्रपति द्धारा प्रदत्त पदक भी इसी तथ्य को प्रमाणित करता है कि वह एक उत्कृष्ट कोटि का अफसर रहा होगा। हो सकता है, लंबे समय तक वह आतंकवाद विरोधी दस्ते में रहा हो और उसने कुछ ऐसे काम किए हों, जो भले ही सबकी जानकारी में सार्वजनिक न हों, पर विभाग और सरकार की तो जानकारी में होगा ही, अतः उसकी कुछ खास उपलब्धियों के कारण ही, हो सकता है, उसे गंभीर चुनौतियों वाले स्थान पर नियुक्त किया गया हो। पर इस शर्मनाक गिरफ्तारी से, न केवल जेके पुलिस की स्थिति बहुत ही असहज हुयी है बल्कि इससे आतंकवाद और आतंकवाद के खिलाफ चलाये जा रहे अभियान पर बहुत से सवाल उठ खड़े हुए हैं।

अपराधी पुलिस गठजोड़ कोई नयी समस्या या नया आरोप नहीं है। अक्सर ऐसी शिकायतें मिलती रहती हैं जब पुलिसकर्मियों के संपर्क अपराधियों से हो जाते हैं। आर्थिक भ्रष्टाचार तो इसका एक कारण होता ही है, और कभी कभी जाति, धर्म और क्षेत्र का भी एंगल इस निकटता में आ जाता है। पर इस मामले में आर्थिक भ्रष्टाचार का ही कोई एंगल है या कहानी और पृष्ठभूमि कहीं और गहरी है यह तो जांच से ही पता लगेगा। लेकिन इस घटना ने जेके पुलिस के बड़े अफसरों को एक बार फिर इस संदर्भ में सोचने और  विचार कर, अपनी रणनीति की समीक्षा करने को बाध्य कर दिया है कि ऐसी काली भेड़ केवल यही डीएसपी है या विभाग के कुछ और लोग भी हैं।

डीएसपी की गिरफ्तारी से अचंभित और हैरान डीआईजी ने जो प्रतिक्रिया दी है वह और भी चिंतित करने वाली है। उनके अनुसार, देवेंदर का उद्देश्य उन्हें कहीं ले जाना था, और रास्ते मे कोई चेकिंग न हो, इसलिए उसने अपना कवर उन आतंकियों को दिया था। अब वे कहां ले जाये जा रहे थे? वहां जाने का उद्देश्य क्या था? अगर देवेंदर किसी गोपनीय पुलिस ऑपरेशन के अंतर्गत दिए गए किसी टास्क के कारण ले जा रहा था, तो फिर इसकी जानकारी उसके अधिकारियों को थी या नहीं? फिर उसकी गिरफ्तारी जब हुयी तो यह टास्क, भले ही इसका विवरण उक्त डीआईजी को, जिसने चेक किया है, ज्ञात न हो तो भी यह तो बताया ही जा सकता था कि वह किसी निजी हैसियत से नहीं बल्कि सरकारी काम से ही यह काम कर रहा है। लेकिन जिस तरह से उसकी गिरफ्तारी की खबरें आ रही हैं, उसे देखते हुए यह बिल्कुल नहीं लगता है कि इस यात्रा का उद्देश्य सरकारी होगा।

अब अगर यह कृत्य धन के लिये है, जैसा कि कहा जा रहा है तो यह एक अपराधी पुलिस गठजोड जिसमे भ्रष्टाचार एक प्रमुख कारक तत्व होता है, की बात होगी, पर अगर यह आतंकी घटनाओं में उक्त डीएसपी की संलिप्तता की बात है तो यह एक बड़ी साजिश की पीठिका है। और इस साजिश में निश्चय ही, देवेंदर एक मोहरा होगा जो यहां एक कैरियर का काम कर रहा था। यह अकेला मामला होगा भी नहीं। हो सकता है ऐसे और भी देवेंदर सिंह हों जो सामने न आ पाए हों और यह एक मामला अचानक पकड़ा गया हो। एक तर्क यह दिया जा रहा है कि यह एक काउंटरइंसर्जेंसी का टास्क था। फिर भी अपनी गाड़ी में दो इनामी आतंकियों को साथ ले जाते हुए पकड़े जाना भी ऐसी किसी टास्क का हिस्सा नहीं होता है।

आतंकवादियों की मदद करने के आरोप की जांच अब एनआईए के अधिकारी करेंगे। कश्मीर में आतंकियों को सहायता और आर्थिक मामलों के अनेक आरोपो के कई मामलों की एनआईए पहले से ही छानबीन कर रही है। मामले में एनआईए की सबसे बड़ी चुनौती होगी ये तय करना कि आख़िर चरमपंथियों के साथ सहयोग करने के पीछे डीएसपी दविंदर सिंह रैना का असल मक़सद क्या हो सकता है। उंसके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उन्हें पैसों का बहुत लालच था और इसी लालच ने उन्हें ड्रग तस्करी, जबरन उगाही, कार चोरी और यहां तक कि चरमपंथियों तक की मदद करने के लिए मजबूर कर दिया। देविंदर सिंह पर पिछले साल पुलवामा में हुए चरमपंथी हमले में भी शामिल होने के आरोप लग रहे हैं। उनका कहना है कि हमले के समय देविंदर सिंह पुलिस मुख्यालय में तैनात थे। पुलवामा हमले में 40 से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी मारे गए थे।

हालांकि देविंदर सिंह को पुलवामा हमले से जोड़ने का कोई पक्का सबूत नहीं अभी तक सामने नहीं आया है। अब इस घटना और मुक़दमे की जांच सरकार ने नेशनल इंवेस्टिगेटिंग एजेंसी, एनआईए को सौंपी है।

जिन आतंकियों के साथ देवेंदर जा रहा था उसमें शोपियां का 17 मुकदमों में वाँछित, नावीद मुश्ताक नाम का एक कुख्यात आतंकी भी था। इसी गिरफ्तारी के बाद पूरे दक्षिण कश्मीर में सुरक्षा बलों ने आतंकियों की धड़पकड़ के लिये अभियान चलाया और उन्हें हथियारों की बरामदगी सहित अनेक सूचनाएं भी मिली हैं। ऐसे अपराधी के साथ देविंदर की गिरफ्तारी ने उससे जुड़े कई और मामलो में उसकी संलिप्तता पर संदेह खड़े कर दिए हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण है, संसद पर हमले के मामले में अफ़ज़ल गुरु की सज़ा और फिर फांसी का मामला। अब यह मुकदमा कानूनन खत्म हो गया है लेकिन इस गिरफ्तारी के बाद कुछ नयी बातें जो सामने आ रही हैं उनसे एक विवाद ही उत्पन्न होगा।

कहते हैं अफ़ज़ल गुरु ने अपनी तफतीश के दौरान देवेंदर से नजदीकी का ज़िक्र किया था, पर तब उस पर ध्यान नहीं दिया गया। उसने कहा था कि देवेंदर ने उससे एक व्यक्ति को दिल्ली ले जाने के लिये और उसके रुकने आदि का इंतजाम करने के लिये कहा था। वही व्यक्ति 2001 के संसद हमले में मुठभेड़ में मौके पर ही मारा गया था।  अब अफ़ज़ल के मामले में किसी चर्चा का कोई मतलब नहीं है लेकिन यह घटना यह बताती है आतंकवादियों के संजाल में, पुलिस की लिप्तता कितनी गहरी है। विभाग को भी इस बढ़ते गठजोड़ की चिंता ज़रूर होगी।

पिछले साल होने वाला पुलवामा हमला अब तक रहस्यमय बना हुआ है। 47 सीआरपीएफ के जवान उस हमले में शहीद हो गए। जिसकी जिम्मेदारी जैश ए मोहम्मद ने ली। हमने बालाकोट में उनके कैम्प पर हमला किया और उसे नष्ट कर दिया। पर यह आज तक रहस्य नहीं खुला है  कि वह घटना घटी कैसे ? कैसे वहां 300 किलो आरडीएक्स आया ? कैसे फोर्स के मूवमेंट का प्लान लीक हुआ ? क्यों नहीं फोर्स को हवाई जहाज से भेजा गया ? इस लापरवाही का कौन जिम्मेदार है ? खुफिया तंत्र की नाकामी का काऱण क्या है ? इन सारे सवालों के जवाब हो सकता है कुछ को असहज करें, पर जहां 47 जवानों की अकारण और योजनागत विफलता से जान जा चुकी हो, वहां इन सवालों को उठाया ही जाना चाहिये। शोक संदेश, रीथ, लास्ट पोस्ट की धुन और नेताओं के संदेश इस अभाव को कभी भी नहीं भर पाते हैं। उन ज़बको दंडित किया जाना चाहिये जो इस दुर्दांत हादसे के लिये जिम्मेदार हैं। बालाकोट कोई उपलब्धि नहीं है वह एक काउंटर अटैक है, जिसका कारण पुलवामा है।

यह भी कहा जा रहा है कि पुलवामा के समय देवेंदर वहीं नियुक्त था लेकिन इस हमले में उसकी क्या भूमिका है यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन इस गिरफ्तारी ने एक बात बिना किसी शक के साबित कर दी है कि देवेंदर का संबंध आतंकी गिरोहों से बहुत नज़दीकी का है। नावीद जैसा आतंकी अगर देवेंदर के साथ निश्चिंत होकर जा रहा है तो यह उसका भरोसा ही है। फिर जब पुलवामा में देवेंदर की नियुक्ति काल में इतनी बड़ी घटना होती है तो इस पर एक स्वाभाविक सन्देह उठेगा ही।

पुलवामा से पहले एक और आतंकी घटना हुयी थी, पठानकोट एयरबेस पर हमला। पठानकोट एयरबेस पंजाब के गुरदासपुर में है। उस समय भी एक पुलिस अफसर का नाम सामने आया था, वह सलविंदर सिंह था। अब जरा उसके बारे में जान लीजिये। सलविंदर सिंह पर आरोप लगा था कि वे पठानकोट के आतंकियों को अपनी गाड़ी में  बिठा कर पठानकोट के पास तक ले गए थे। इस पर उनका कहना था कि ” आतंकवादियों ने उन्हें घने जंगल में फेंक दिया और उनकी नीली बत्ती लगी एसयूवी गाड़ी लेकर फरार हो गए। बाद में आतंकी इसी वाहन में सवार होकर पठानकोट पहुंचे ओर  पठानकोट में आर्मी बेस कैम्प पर हमला किया। ”

वे यह भी कहते हैं कि, “वह पठानकोट के पास स्थित एक धार्मिक स्थल पर दर्शन के लिए जा रहे थे, जहां वो नियमित दर्शन के लिए जाते रहे हैं. वहां से लौटते हुए पाकिस्तान से आए छह आतंकियों ने उनका अपहरण कर लिया था। लेकिन उस धार्मिक स्थल की देखभाल करने वाले सोमराज का कहना है कि ” 31 दिसंबर को उन्होंने पहली बार एसपी को वहां देखा था। ”

उनके कुक मदन गोपाल से एनआईए ने लंबी  पूछताछ की थी  ओर यह भी पाया गया कि उनके ड्रग माफिया से सम्बंध थे। एनआईए के जांचकर्ता आखिर तक इस गुत्थी में उलझे रहे कि आखिर आतंकवादियों ने एसपी सलविंदर और उनके साथियों को क्यों छोड़ दिया, जबकि उन्होंने एक दूसरी गाड़ी को अगवा किया तो उसके ड्राइवर की हत्या कर दी थी ?

लेकिन कुछ दिनों बाद आश्चर्यजनक रूप से एनआईए ने सलविंदर सिह को उस पठानकोट केस में क्लीन चिट दे दी थी।हालांकि, 2019 में गुरदासपुर के पूर्व पुलिस अधीक्षक सलविंदर सिंह को किसी दूसरे केस में भ्रष्टाचार और रेप के मामले में 10 साल की सजा सुनाई गई ओर सजा सुनाए जाने के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया ।

यह दो उदाहरण सुरक्षा बलों के अंदर व्याप्त गंभीर रुग्णता की ओर संकेत करती हैं। पुलिस अपराधी या आतंकी गठजोड़ कोई अचंभित करने वाली बात नहीं है, बल्कि अचंभित करने वाली बात है कि ऐसे तत्वो को हल्के से छोड़ देना। सुरक्षा बल के लोग भी मनुष्य ही होते हैं और वे भी लोभ मोह आदि मनोभाव जन्य दुर्गुणों से मुक्त नहीं हो सकते हैं। हाल ही की एक रिपोर्ट के अनुसार, 32 सेना के जवान और अधिकारी जासूसी के मामलों में सन्देह के घेरे में हैं। हैरानी की बात यह है कि सलविंदर और देवेंदर के मामलों में जांच जितनी गहराई और तेजी से होनी चाहिये वह क्यों नहीं होती है। सलविंदर तो बच ही गये, अब देखना है देविंदर का क्या होता है और कब तक होता है।

यह तो सबको पता है कि पिछले तीस सालों से जम्मूकश्मीर अलगाववादी समूहों का एक केंद्र बना है जिसे पाकिस्तान का खुला समर्थन है। ऐसे आतंकी और अलगाववादी समूहों का पहला लक्ष्य ही सुरक्षा बलों पर हमला करना होता है। 2005 में मैं श्रीनगर गया था। मैं सीआरपीएफ के गेस्ट हाउस में रुका था। लेकिन मुझे कहा गया कि सरकारी गाड़ी लेकर और कम सुरक्षा व्यवस्था के साथ लाल चौक जाना निरापद नहीं है। मैंने और एक अन्य मित्र ने एक ऑटो से लाल चौक का भ्रमण किया, घूमा, वहीं कहवा पिया और सुरक्षित वापस आ गया। सुरक्षा बलों पर आतंकवादी हमलों का एक काऱण उनका मनोबल गिराना और सरकार को यह संदेश देना कि उनका इकबाल खतरे में है, यह जताना भी होता है। लेकिन इस खुली दुश्मनी के बावजूद भी पुलिस के खुफिया मुखबिर तंत्र भी उन्ही आतंकियों के ही गिरोह से निकलते हैं। यह मुखबिरी बिना आतंकियो को भरोसे में लिये होती भी नहीं है। यही से सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच निकटता की शुरुआत होती है जिसमे से कुछ निजी दोस्ती और फिर गठजोड़ नेक्सस का रूप ले लेती है। देवेंदर की निकटता किस प्रकार से हुयी है यह तो मैं नहीं बता पाऊंगा, पर मैं एक सामान्य तरीका अपने पेशागत अनुभव से बता रहा हूँ।

आतंकियों या बदमाशों में भरोसा पैदा कर के उन्हें चढ़ा कर मार देना या गिरफ्तार कर के उनका संजाल ध्वस्त कर देना काउंटर इंसर्जेंसी का ही एक रूप है। यह एक अलग तरह की पुलिसिंग होती है जो सबके बस की बात भी नहीं होती है। इस प्रकार के काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन में बहुत से काबिल और दिलेर पुलिस अफसरों की भी जान गयी है। ऐसी परिस्थितियों में आतंकियों और पुलिस के गठजोड़ के प्रति विभाग के वरिष्ठ अफसरों को शुरू से ही सतर्क रहना होगा। हमारे एक डीजीपी इसे प्राइवेट प्रैक्टिस कहते थे और वे यह बराबर कहते थे कि, मुखबिरी इकट्ठा करना तो ठीक है पर यह ध्यान गम्भीरता पूर्वक रखा जाना चाहिए कि, पुलिस उन्हीं की ही मुखबिर न हो जाय। अब जब जम्मूकश्मीर में सारी राजनीतिक गतिविधियों पर विराम लगा हुआ है, सारे बड़े नेता नज़रबंद हैं, सुरक्षा बलों की नियुक्ति बहुत अधिक है तो यह जिम्मेदारी सुरक्षा बलों के वरिष्ठ अफसरों की है कि वे ऐसे संभावित गठजोड़ के प्रति विशेष रूप से सतर्क रहें।

देवेंदर सिंह की गिरफ्तारी एक सामान्य घटना नहीं है। इसके तार बहुत ऊपर तक जुड़े हो सकते हैं। हालांकि एनआईए का हाल का रिकॉर्ड ऐसी तफ़्तीशों को लेकर बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है । इस मामले की जांच एक एसआईटी गठित करके और सुप्रीम कोर्ट के एक जज की सघन निगरानी में की जानी चाहिये। जांच अधिकारी केवल जज के ही सुपरवीजन में रहे। एनआईए की जांच करने की क्षमता और योग्यता पर अविश्वास नहीं है, बशर्ते वे अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी और मजबूत रखें। ऐसी जांचों में दबाव बहुत आता है। मुझे लग रहा है कि जांच का सिरा ऊपर तक जाएगा, कम से कम बिल्कुल ऊपर तक न जाय तो भी। हर संगठन में अच्छे बुरे होते हैं, यह भी अपवाद नहीं है।

यह घटना न केवल जेके पुलिस बल्कि अन्य सुरक्षा एजेंसी, रॉ, आईबी, सीआईडी, मिलिट्री इंटेलिजेंस के लिये भी एक सीख है। अगर यह घटना एक अफसर के धन की लालच में आतंकियों के कैरियर बनने की ही है तब यह एक और सवाल खड़ा करती है कि कैसे एक सम्मानित और कर्तव्यनिष्ठ अफसर घूसखोरी के इस संजाल में फंस गया ? लेकिन अगर यह घटना, देवेंदर और हिजबुल मुजाहिदीन के बीच आपसी गठजोड़ की है तो यह बेहद गंभीर बात है। दोनों ही परिस्थितियों में यह सुरक्षा बलों औऱ सरकार के लिये असहज करने वाली घटना है।

1947 के कबायली हमले के बाद कश्मीर एक जटिल समस्या बना हुआ है। पाकिस्तान की पूरी कोशिश है कि मुस्लिम बाहुल्य यह सूबा उनके देश का अंग बने और धर्म ही राष्ट्र है का सिद्धांत को कुछ जीवनदान मिले। लेकिन महाराजा हरि सिंह और शेख अब्दुल्ला ने पाकिस्तान का गेम खत्म कर दिया। फिर 1990 से कश्मीर एक नए तरह का आतंक देख रहा है। आतंकवाद को कभी भी केवल सुरक्षा बलों द्वारा खत्म नहीं किया जा सकता है। या तो अतिशय हिंसा से ऊब कर जनता खुद आतंकियों के खिलाफ खड़ी होने लगे या सरकार जनता का इतना भरोसा पा ले कि जनता सुरक्षा बलों के पक्ष में खड़ी हो जाय। पंजाब और असम के आतंक के इतिहास से यह आप समझ सकते हैं। 1980 से लेकर 1995 तक 15 साला आतंकी गतिविधियों का खात्मा पंजाब में तब हुआ जब जनता वहां खुलकर साथ आ गयी। लेकिन कधमीर में जनता के एक अच्छे खासे वर्ग के आतंकियों के विरोध में होने के बावजूद पाकिस्तान से घुसपैठ जारी है। अब अनुच्छेद 370 के खत्म होने के बाद कश्मीर की जनता का क्या रुख होता है यह अभी नहीं कहा जा सकता है। जब कश्मीर में सारे प्रतिबंध हट जाँय, स्थिति सामान्य हो और लोकप्रिय सरकार का गठन हो तभी इस बारे में कुछ कहा जा सकता है।

फिलहाल तो आतंकी गतिविधियों के शमन और उन्मूलन के काम मे लगी सुरक्षा बलों को देवेंदर सिंह टाइप सिंड्रोम से मुक्त होना पड़ेगा। उसके घर से सेना के कैंप का नक़्शा मिलना, हथियार मिलना, और हिजबुल मुजाहिदीन के साथ निकट संपर्क होना एक सामान्य पुलिस अपराधी गठजोड़ का मामला नहीं है। इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिये और ऐसा हो भी रहा होगा। देवेंदर सिंह टाइप अफसर अपनी पहुंच राजनीतिक और महत्वपूर्ण लोगों के साथ जानबूझकर कर बना कर रखते हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि वे वीआईपी और राजनीतिक लोग उनकी असलियत जानते हैं। वे बिल्कुल नही जानते। लेकिन ऐसे उच्च स्तरीय सूत्रों की जानकारी के कारण ऐसे अफसरों की विभाग में भी एक हनक बनी रहती है, जिसका लाभ उन्हें  ट्रांसफर पोस्टिंग में भी मिलता है। सुरक्षा बलों के अंदर संक्रमित हो रहे ऐसे लोगों से बलों को मुक्त होना पड़ेगा अन्यथा आतंकवाद विरोधी अभियान कहीं कहीं बैकफायर भी कर जाएगा।

© विजय शंकर सिंह