इस समय हमारा मुकाबला, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से है। तभी हमारे मीडिया चैनल पाकिस्तान की जितनी फिक्र करते हैं उतनी हमारी नहीं करते हैं। अल्पसंख्यक उत्पीड़न से राहत देने के नाम पर नया नागरिकता कानून भी इन्ही तीन देशों के, हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्मावलंबियों को नागरिकता देने की बात तो करता है। पर अन्य पड़ोसी देश, म्यांमार, चीन, नेपाल, भूटान और श्रीलंका के अल्पसंख्यक जो इन्ही धर्मावलंबियों में से हैं कि कोई बात नहीं करता है।

गृह मंत्री अमित शाह ने 18 जनवरी को कर्नाटक के हुबली में एक जनसभा को संबोधित करते हुए भारत के पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों को हो रही प्रताड़ना का भी जिक्र करते हुए देश में सीएए की जरूरत को बताया। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं है।

दरअसल शाह ने जो दावा किया स्थिति इसके उलट है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में अल्पसंख्यक चुनाव लड़ सकते हैं। शाह के इस बयान पर बीबीसी ने फैक्ट चेक किया जिसमें सामने आया है कि इन देशों में अल्पसंख्यकों को चुनाव लड़ने का अधिकार तो है ही बल्कि उनके लिए सीटें भी आरक्षित हैं।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में अल्पपसंख्यक  समुदाय द्वारा चुनाव लड़ने के निम्न प्राविधान वहां के संविधान में हैं।

अफ़ग़ानिस्तान

  • साल 2002 में यहां अंतरिम सरकार बनाई गई और हामिद करज़ई राष्ट्रपति बने. इसके बाद साल 2005 के चुनाव में देश की निचली सदन और ऊपरी सदन में प्रतिनिधि चुन कर पहुंचे और अफ़गानिस्तान की संसद मज़बूत बनी।
  • अफ़ग़ानिस्तान की आबादी कितनी है इसका सही आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है क्योंकि 70 के दशक के बाद यहां जनगणना नहीं हो सकी. लेकिन वर्ल्ड बैंक के मुताबिक यहां की आबादी 7 करोड़ है। अगर अमरीका के डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस की रिपोर्ट की मानें तो जिसमें हिंदू-सिख अल्पसंख्यकों की संख्या यहां महज़ 1000 से 1500 के बीच हैं।
  • अफ़ग़ानिस्तान की निचली सदन यानी जहां प्रतिनिधियों का सीधा चुनाव जनता करती है वहां 249 सीट हैं. यहां अल्पसंख्यकों को चुनाव लड़ने की आज़ादी है।. लेकिन नियमों के मुताबिक अफ़ग़ानिस्तान में संसदीय चुनाव में नामकरण भरते वक़्त कम से कम 5000 लोगों को अपने समर्थन में दिखाना पड़ता था।
  • यह नियम सभी के लिए एक समान थे लेकिन इससे अल्पसंख्यक समुदाय के लिए अपना प्रतिनिधि संसद में भेजना मुश्किल था. 2014 में अशरफ़ ग़नी सत्ता में आए और उन्होंने हिंदू-सिख अल्पसंख्यकों के समीकरण को देखते हुए निचले सदन में एक सीट रिज़र्व की है।
  • इस वक़्त इस सीट पर नरिंदर सिंह खालसा सांसद हैं. इसके अलावा अफ़गानिस्तान की ऊपरी सदन में एक सीट धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए रिज़र्व है. इस वक़्त अनारकली कौर होनयार इस सदन में सांसद हैं।
फ़ोटो – अफ़गानिस्तान के सांसद नरिंदर सिंह खालसा राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ व संसद के उच्च सदन में सांसद अनारकली  कौर होनयार
  • अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से ये नाम तय किए जाते हैं जिसे राष्ट्रपति की ओर से सीधे संसद में भेजा जाता है।
  • इसके अलावा कोई भी अल्पसंख्यक अपने चुनावी क्षेत्र के उम्मीदवार को वोट कर सकता है. साथ ही अल्पसंख्यक किसी भी सीट से चुनाव भी लड़ सकते हैं बशर्ते वो अपने लिए पांच हज़ार लोगों का समर्थन जुटा लें।
  • साल, 2005 से देश में स्थिर सरकार बन रही है. लेकिन कभी अल्पसंख्यकों को वोटिंग या चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं किया गया. पिछले तीन दशकों में हिंदू-सिख ही नहीं अन्य धार्मिक मान्यताओं को मानने वाले लोगों ने भी पलायन किया है. गृह युद्ध इसकी वजह रही है।

बांग्लादेश

  • बांग्लादेश में कोई भी अल्पसंख्यक चुनाव लड़ सकता है ।
  • बांग्लादेश में संसदीय चुनाव में किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सीटें आरक्षित नहीं की गई हैं बल्कि महिलाओं के लिए 50 सीटें ही आरक्षित की गई हैं।
  • बांग्लादेश संसद में 350 सीटें हैं जिसमें से 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. 2018 में हुए संसदीय चुनाव में 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों में से 18 उम्मीदवार जीतकर संसद पहुंचे थे।
  • इससे पहले बांग्लादेश की 10वीं संसद में इतने ही अल्पसंख्यक सांसद थे. स्थानीय अख़बार ढाका ट्रिब्यून के मुताबिक बांग्लादेश की नौंवी संसद में 14 सांसद अल्पसंख्यक समुदाय से थे, जबकि आठवीं संसद में आठ सांसद अल्पसंख्यक थे।
फ़ोटो : बांग्लादेश के हिन्दू सांसद – बीरेन सिकदर, जया सेनगुप्ता और रमेश चंद्र सेन (बाएं से दाएं)

पाकिस्तान

  • पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 51 (2A) के अनुसार पाकिस्तान की संसद के निचले सदन नेशनल असेंबली में 10 सीटें अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं. साथ ही चार प्रांतों की विधानसभा में 23 सीटों पर आरक्षण दिया गया है।
  • पाकिस्तान में कुल 342 सीटें हैं और जिनमें से 272 सीटों पर सीधे जनता चुनकर अपने प्रतिनिधि भेजती है. 10 सीटें अल्पसंख्यकों के लिए और 60 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
  • इन आरक्षित 10 सीटों का विभाजन राजनीतिक पार्टियों को उन्हें 272 में से कितनी सीटों पर जीत मिली है इसके आधार पर होता है. इन सीटों पर पार्टी खुद अल्पसंख्यक उम्मीदवार तय करती है और संसद में भेजती है।
  • दूसरा विकल्प ये है कि कोई भी अल्पसंख्यक किसी भी सीट पर चुनाव लड़ सकता है. ऐसे में उसकी जीत जनता से सीधे मिले वोटों पर आधारित होगी।
  • कोई भी अल्पसंख्यक अपने चुनावी क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे किसी भी उम्मीदवार को वोट करने के लिए स्वतंत्र है. यानी वोटिंग का अधिकार सभी के लिए समान है।
  • आज़ादी के बाद पाकिस्तान का संविधान 1956 में बना फिर इसे रद्द करके 1958 में दूसरा संविधान आया और इसे भी रद्द कर दिया गया और 1973 में तीसरा संविधान बना जो अब तक मान्य है. ये संविधान पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को समान अधिकार देने की बात करता है।
  • यानी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए सीटें तो आरक्षित हैं ही, साथ ही वो अन्य सीटों से चुनाव भी लड़ सकते हैं। 2018 के चुनाव में महेश मलानी, हरीराम किश्वरीलाल और ज्ञान चंद असरानी सिंध प्रांत से संसदीय और विधानसभा की अनारक्षित सीटों से चुनाव लड़े और संसद पहुंचे।
फोटो – पाकिस्तानी सांसद रमेश वंकवानी, महेश मलानी और कृष्णा कोहली

गोएबेलिज़्म 1932 से 39 के कालखंड में जर्मनी में इसलिए भी सफल हो गया कि उस समय यूरोप या दुनिया भर में जन संचार के साधनों के रूप में या तो अखबार थे या रेडियो। सरकारी रपटें गोपनीय डिस्पैच के माध्यम से जाती थी। अफवाहबाज़ी करना, उसे फैलाना आसान था, और उसका खंडन मुश्किल। तथ्यो की पड़ताल के साधन नहीं थे जो थे, उन तक सबकी पहुंच नहीं थी। लेकिन आजकल संचार बाहुल्य के युग मे अधिकतर रेफरेंस नेंट पर, किताबे किंडल पर और अगर संपर्क हो तो दुनियाभर में बैठे पढ़ाकू तथ्यान्वेषी मित्र बैठे हैं जो थोड़ी ही देर में तमाम दस्तावेज मेल या व्हाट्सएप्प पर भेज देंगे। जब आज गोएबल सफल नहीं हो सकता है तो हिटलर की क्या बात कीजिए।

( विजय शंकर सिंह )