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तो क्या सत्ता के लिए गोपाल कांडा से भी परहेज़ नहीं ?

तो क्या सत्ता के लिए गोपाल कांडा से भी परहेज़ नहीं ?

महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा के चुनाव हो चुके हैं, और महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिल चुका है। अब बचा हरियाणा। हरियाणा में छुट्टा घोड़ो के घर मे घुस कर बांधने, छानने और लादने की कार्यवाही शुरू। दो घोड़े पकड़ कर विशेष विमान से सरदार के पास भेजे गए हैं। अन्य की तलाश और सौदेबाजी चल रही है। यह बात में हरियाणा के नवनिर्वाचित विधायकों के लिये कह रहा हूँ।
अब इस खरीद फरोख्त में एक किरदार का आगाज़ हुआ है, जिसका नाम है गोपाल कांडा । यह नाम और गीतिका शर्मा के नाम याद हैं  आप को ? गीतिका शर्मा जिसके पूरे परिवार को गोपाल कांडा ने बरबाद कर के तहस नहस कर दिया था। गीतिका की माँ ने इस गोपाल के दुर्दांत कांड से ऊब कर आत्महत्या कर ली थी और बेटी को मजबूर कर दिया गया मरने के लिए । इस कांडा ने अपने बचाव के लिए पहले मीडिया का दामन पकड़ा, पर बच न सका अंततः जेल भेजा गया। वही गोपाल कांडा अब सिरसा से निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत गया है । जिसकी जरूरत सत्ता की भूख मिटाने के लिए भाजपा को आज आ पड़ी है। उसी गोपाल कांडा को स्पेशल चार्टर्ड प्लेन से कल रात दिल्ली तलब किया गया । वह अपने साथ 6 निर्दलीय विधायकों का जुगाड़ कर रहा है।
भाजपा और उसके समर्थक कहते है कि बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओं उनका मिशन है । पर क्या इस कांडा के कांड को भुलाया जा सकता है ? सोच कर देखिये जिन लोगों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिये, आज वे किंगमेकर की भूमिका में संस्कार धर्म रक्षक और राष्ट्र निर्माण का ठेका लेने वाले दल के लिये सत्ता के जुगाड़ में लगे हैं। जैसे ही पार्टी में वैकेंसी हुयी, वैसे ही बेटी बचाओ के नाम पर बेटी शोषक गिरोह का यह शख्स घोड़ा पकड़ कोर ग्रुप में खींच लिया गया और वह विधायकों की खरीद फरोख्त में लग गया। बधाई माननीय गोपाल कांडा जी और सिरसा के अत्यंत धैर्यवान मतदाता बंधु ! गोपाल कांडा, आप बिल्कुल सही जगह पर आ गए हैं। यहां आप सीबीआई, ईडी आदि से भी सुरक्षित रहेंगे और रहा सवाल क्षवि का तो उनमें और आप मे बस उन्नीस बीस का ही फर्क है। चुनाव लड़ने में जो खर्चा पानी हुआ उसे भी निकालना है न । दुनिया मे मुफ्त कुछ भी नही है। खून में व्यापार जो है । सर्वेगुणा कांचनामाश्रयन्ति।
2012 के अखबारों की एक खबर पढें। साल 2009 में कांग्रेस को हरियाणा में 35 सीटें मिली थीं, पाँच विधायक भजनलाल की पार्टी से टूट कर आ मिले थे, संख्या 40 हो गयी थी. पर, सरकार बनाने के लिए और विधायकों की दरकार थी. तब गोपाल गोयल कांडा निर्दलीय जीते थे. उन्होंने बाक़ी निर्दलियों को साथ लाकर भूपिंदर हुड्डा को मुख्यमंत्री बनवा दिया. आपराधिक मामलों के बाद भी हुड्डा ने कांडा को गृह राज्यमंत्री का पद दिया. तीन साल बाद गीतिका शर्मा के आत्महत्या मामले में नाम आने और गिरफ़्तार होने के बाद कांडा को इस्तीफ़ा देना पड़ा था।
अब फिर गोपाल कांडा 40 की संख्या वाली भाजपा के लिए निर्दलीय जुटा रहे हैं। कांडा कांड में गीतिका आत्महत्या सिर्फ़ एक अध्याय है। यह कांड, हमारी लोकशाही भारतीय राजनीति, प्रशासन और व्यवसाय में कहीं घुन लगते जाने औऱ खोखला होते जाने की एक दारुण कथा है। चौटाला परिवार की छांव में कभी गोपाल कांडा की तरक़्क़ी हुयी,  आगे बढ़े, कैसे ताक़तवर नौकरशाही ने उनकी मदद की और धन का क्या आगम था,  कहाँ से आता रहा आदि प्रश्न बहुत से हैं। करोगे बात तो हर एक बात याद आएगी। कांडा अपवाद नहीँ है। वह राजनीति मे देश और दुनिया की अनेक ऐसे चटखारे लेकर कहे सुने जाने वाले किस्सों  में मात्र एक कथा है। आज जो सरदार के लिये अस्तबल अस्तबल घूमकर घोड़ा खोज रहे है, उन्हें  गुड़ खिला कर पकड़ रहे है और भाजपा का खेवनहार बने है उसी के खिलाफ भाजपा 2012 में गीतिका के न्याय की मांग के साथ एक अभियान चला रही थी। राजनीति, दुष्टों की आखिरी पनाहगाह है।
हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद किसी भी पार्टी की सरकार बनती नहीं दिख रही है. ऐसे में बीजेपी ने कोशिश शुरू कर दी है. सिरसा से हरियाणा जनहित पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते गोपाल कांडा के संकेत दिए हैं कि वह बीजेपी को समर्थन करेंगे। बीजेपी ने इसके लिए प्रयास भी तेज कर दिए हैं। गोपाल कांडा और रानियां से जीते निर्दलीय विधायक रणजीत सिंह चौटाला को लेकर बीजेपी की सांसद सुनीता दुग्गल दिल्ली रवाना हो गई हैं. कांडा और रणजीत सिंह चौटाला को एक चार्टर प्लेन से दिल्ली लाया जा रहा है।
दिल्ली में फिर इन घोड़ो के मोलभाव होंगे। धन के लिये गिरोही पूंजीपतियों को सन्देश  भेजे जाएंगे। कथित, स्वयंभू और स्वघोषित चाणक्य जैसा एक किरदार धन, अधिकार, मद और राजनीति के साम दाम दंड भेद के कॉकटेल से सत्ता रसायन आसुत करेगा और तब वे कहेंगे कि जनसेवा के लिये यह सब बड़ा ज़रूरी था। राजनीति में तो नैतिकता कहीं और कभी रही ही नहीं है। न सतयुग में, न द्वापर में और न त्रेता में। जब जब राज की बात चली है नीति की धज्जियां उड़ी है। येन केन प्रकारेण, सत्ता का पाना और उसे बचाये रखना यही सबसे बड़ा राजनीति का उद्देश्य बन गया है। और जनता, धूमिल के शब्दों में, एक भेड़ है, जो दूसरों की ठंड के लिये पीठ पर ऊन की फसल ढोती है।

© विजय शंकर सिंह
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Vijay Shanker Singh

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