कई सवालों और कई जवाबों के साथ गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत हमारे सामने है. इस बात से कोई इंकार नहीं है की भाजपा के लिए तमाम विपरीत समीकरणों के होते हुए भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता ने दोनों प्रदेशों में पार्टी को बहुत फायदा पहुँचाया है. जनतंत्र में किसी नेता पर इस प्रकार लोगों का अटूट विश्वास कोई आम बात नहीं है.
संभवतः जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अब नरेंद्र मोदी ही उस लीग के नेता नजर आते हैं जिनको तमाम आलोचनाओं के होते हुए भी जनता का अभूतपूर्व समर्थन मिला. हालाँकि यह देखना होगा की नरेंद्र मोदी के लिए इस प्रकार का अपार लगाव उन्हें और राज्यों में कितनी मदद करता है. इस चुनाव के बाद यह जरूर तय हो गया है की कांग्रेस को राहुल गाँधी की अध्यक्षता में एक नयी शुरुआत करने की जरुरी प्रेरणा अवश्य मिली है, हालाँकि उन्हें गुजरात में जीत सकने की स्थिति के करीब पहुँच कर हार कर लौट आने का अफ़सोस जरूर होगा.
कांग्रेस के लिए गुजरात में पहली समस्या की अगर बात करें तो की वो यह थी की वो शहरी-ग्रामीण समीकरण बनाने में असफल रहे. यह बहुत साफ़ था की ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूदा भारतीय जनता पार्टी से लोगों की खासी नाराजगी है, और इस रोष को कांग्रेस वोट में तब्दील कर पाने में सफल भी रही है हालाँकि वह पूरे गुजरात में जीत हासिल कर लेने के लिए काफी नहीं था. कांग्रेस को इस पेंच को समझना होगा की केंद्र में सरकार बनाने के लिए शहरी-ग्रामीण समीकरण आवश्यक होगा, कांग्रेस को शहर के इलाकों में भी एक ‘पैरेलल नैरेटिव’ गढ़ना होगा, जिसे हाल में गढ़ पाने में वह असफल रही है. उदहारण के तौर पर अगर हम देखें तो गुजरात में चार बड़े जिलों (सूरत, राजकोट, वड़ोदरा, अहमदाबाद) की कुल 55 सीटों हैं जिनमे से कांग्रेस ने मात्र 9 सीटों पर जीत हासिल की है, जबकि भारतीय जनता ने पार्टी ने बची 46 सीटों पर जीत हासिल की है. इसके अलावा समूचे प्रदेश में बची 127 सीटों में से कांग्रेस ने 71 तो भाजपा ने 53 सीटों पर जीत हासिल की है. यह आंकड़ा इस बात की ओर संकेत देता है की कांग्रेस ने शहरी इलाकों के आस पास मुद्दे मजबूती से से नहीं रख पायी न ही वह इन इलाकों में कोई लकीर खींच पायी.
कांग्रेस की दूसरी बड़ी समस्या रही उसका जातीय समीकरण पर हद से ज्यादा भरोसा करना और यह समझना की कोई विशेष जाती (खासकर के पटेल) उसे एकमुश्त वोट दिला पाने में सफल रहेगी, जोकि हुआ नहीं. हम अगर बारीकी से देखें तो यह मालूम चलता है की गुजरात में पटेलों के आरक्षण को लेकर जिस प्रकार की उम्मीद कांग्रेस पार्टी जगा रही थी वह साफतौर पर मुमकिन होता नहीं दिख रहा था. और यह कहना गलत नहीं होगा की गुजरात की जनता में यह सन्देश भी गया की कांग्रेस जातीय राजनीती के पेंच भिड़ने में लगी है जो गुजरात की जनता को अतीत में ढकेलने जैसा होगा.
इसके विपरीत अगर नरेंद्र मोदी की बात करें, तो वह अपने चुनावी भाषणों में जनता के सामने एक सुनहरा भविष्य प्रस्तुत करते हैं और गुजरात में भी उन्होंने यही किया, हालाँकि ऐसी उम्मीदों एवं वादों की वास्तविकता भले ही कोई खास न हो, लेकिन जनता को उम्मीद की किरण से काफी संतोष मिलता है. कांग्रेस को इस बात को भी समझना होगा की सिर्फ गुजरात ही नहीं अपितु पूरे देश में उसकी छवि एक भ्रष्टाचार करने वाली पार्टी की बन चुकी है, जिससे निकलना बहुत जरुरी है. कांग्रेस पार्टी का काम भाजपा के खिलाफ रोष को भुनाने से नहीं चलने वाला है क्यूंकि जनता शायद कांग्रेस को फ़िलहाल विकल्प के रूप में नहीं देखती है.
तीसरी और सबसे बड़ी समस्या कांग्रेस के साथ यह भी रही की उन्हें मुद्दों के लिए गुजरात में तीन युवाओं की ओर रुख करना पड़ा और उनके मुद्दे आउटसोर्स करने पड़े, जिससे जनता में यह सन्देश गया की कांग्रेस पार्टी के पास मुद्दों की कमी है और वह संगठन से बाहर के लोगों की उम्मीदों की सवारी कर रही है, हालाँकि कांग्रेस का प्रदेश में लचर संगठन भी हार की एक बड़ी वजह रहा है, और इससे इंकार नहीं किया जा सकता की  गुजरात की जनता में भाजपा की मजबूत पकड़ को ढीला करने के लिए एक सफल मुहीम चला पाने में कांग्रेस असफल रही.
इस हार को कांग्रेस किस नजरिये से देखती है और क्या सुधर करती है वह देखना होगा, परन्तु अभी के लिए कांग्रेस को २०१९ के लक्ष्य के लिए एक पैरेलल नैरेटिव गढ़ना अत्यंत आवश्यक है.

यह लेख इंडियन एक्सप्रेस पर प्रकाशित हुए प्रताप भानु मेहता के लेख के कुछ अंश का हिंदी अनुवाद है
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Sparsh Upadhyay

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