ताज महल और उत्तर भारत का वर्ग संघर्ष

RSS द्वारा स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन से दूरी अख्तियार करने की वजह से अंग्रेज़ सरकार ने इनाम के तौर पर इनको फलने फूलने दिया। संघ के लोग अंग्रेज़ सरकार के लिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जासूसी करते थे। संघ और अंग्रेज़ दोनों को ही मुग़लों से भारी नफरत रही है।
औपनिवेशवाद और फ़ासीवाद के विरोध के प्रतीक के रूप में मुगल अंग्रेजों के लिए, 1757 से 1857, एक बहुत बड़ा खतरा थे। मुग़लों को भारत की समन्वित परंपराओं (गंगा जमुनी तहज़ीब), बहुविधता, हिंदू-मुस्लिम एकता और किसान-कामगार (peasant-artisan) अर्थव्यवस्था के संरक्षक (मुहाफ़िज़) के बतौर जाना जाता है।
RSS की राजनिती गैरविविधता, हिंदू-मुस्लिम वैमनस्यता, कार्पोरेट-फ़ासीवाद हितों की रक्षा और किसान-मज़दूर विरोधी अर्थव्यवस्था के आधार पर टिकी है। यह भ्रम है की RSS मुगलों का विरोध सिर्फ मज़्हबी कारणो से करती है। RSS मूलतः मुगलों के किसान-कामगार आधारित प्राक-राष्ट्रवाद की विरोधी है।

ताजमहल

19वीं शताब्दी की कहानी

उन्नीसवी शताब्दी सन 1833 ईस्वी में, अंग्रेज़ भारतीय और सार्वभौमिक मूल्यों के महान प्रतीक ताज महल को गिराने के बहुत करीब पहुंच गए थे। 1833 में, लेफ्टिनेंट-जनरल लॉर्ड विलियम हेनरी केवेन्डिश-बेंटिंक भारत के गवर्नर जनरल बने। ‘सरकार की वित्तीय स्थिति’ में सुधार करने के लिए उन्होंने ताज की नीलामी का फैसला लिया। उस समय, ब्रिटिश अफसर और पर्यटक, भारत में मुग़ल इमारतों का दौरा करते हुए कीमती पत्थरों को ब्रिटेन ले जाते थे।
ताज के संगमरमर के कुछ भाग को भारतीय राजकुमारों को बेचा जाना था और आगे की बिक्री के लिए बाकी को ब्रिटेन भेजा जाना था। ब्रिटेन की तुलना में भारत में अधिकतर संगमरमर को बेचने की कोशिश करने का विचार आया, क्योंकि दिल्ली के लाल किले के संगमरमर इंग्लैंड में ज़्यादा नही बिके। इंग्लैंड तक संगमरमर पहुंचाने का दाम उसके बिकने की कीमत से ज़्यादा पड़ा।

ताज की बिक्री

अंग्रेज़ों ने ताजमहल को मथुरा के सेठ लक्ष्मीचंद को 1.5 लाख रुपये में बेच दिया था। लेकिन मथुरा के सेठ को, शाहजहां द्वारा स्थापित आगरा के ताजगंज मोहल्ले में, हिंदू और मुस्लिम कामगारों द्वारा आयोजित, ज़बरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा। यह कामगार उन श्रमिकों के वंशज थे जिन्होंने ताजमहल बनाया था। सेठ लक्ष्मीचंद को पीछे हटना पड़ा और बिक्री बंद हो गयी।
अंग्रेजों ने एक बार पुनः उसी सेठ लक्ष्मीचन्द को ताजमहल 7 लाख रूपये में बेच दिया। मगर इमारत को गिराने और संगमरमर को ले जाने की लागत इतनी अधिक थी, कि उससे लाभ कमाना व्यवहारिक नहीं था। एक बार फिर नीलामी को बंद करना पड़ा। बेंटिंक अपनी मेज पर बैठकर कुछ सोचने लगा और अंत में लागत के मुद्दे को सुलझाने में कामयाब रहा।

ताज की एक पुरानी तस्वीर

किसानों ने बचाया ताज

एक ओर नीलामी की योजना बनाई जा रही रही थी। पर ख़बर लगते ही आगरा-दिल्ली-हरीयाणा-पश्चमी उत्तर प्रदेश स्तिथ हिंदू जाट एवं गूजर, तथा मुस्लिम रान्घर और मेवाती, किसानों ने हस्तक्षेप किया। अंग्रेज़ सैनिकों एवं आगरा मथुरा के सेठों पर किसानो ने हमला किया। 1857 के विद्रोह के उदय के दौरान इन्ही किसानो ने अंग्रेजों से ताजमहल को बचाने की आवाज़ भी उठायी।

ब्रिटिश संसद

जल्द ही यह मामला ब्रिटिश संसद में पहुंचा। ब्रिटिश सांसद दोहरी परेशानी में फंस गये। बेंटिंक को वापस बुलाने का फैसला लिया गया।

कर्ज़न और ताज

लार्ड कर्ज़न को ऐसे ब्रिटिश वायसराय के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने भारतीय स्मारकों को संरक्षित करने का कार्य किया। लेकिन 7 फ़रवरी 1900 को उन्होंने ताज की नीलामी बुलाई। वह प्रयास भी असफल रहा। पर कई पुराने चित्रों और कीमती नक्काशीदार पत्थर, जिसमें ताजमहल के कुछ सामग्रियों भी शामिल थीं, तोड़े गये और उनकी नीलामी हुई। यहां तक कि लॉर्ड हेस्टिंग्स ने ताजमहल के कई कीमती पत्थर लंदन भेजे।

सारांश में:-

1) ताजमहल सिर्फ एक स्मारक नहीं है। यह विविधताओं से भरे देश में भारत के राष्ट्र निर्माण का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक प्रतीक है। ताज फ़ारसी, तुर्की, गुजराती, राजस्थानी, मध्य एशियाई, सिंधी, उत्तर भारतीय विशेषताओं को घेरे हुए है। ताज में मुस्लिम, हिंदू एवं जैन स्थापत्य कला का मिश्रण है। इस प्रकार, ताज दुनिया के सामने भारत की अद्वितीय स्थिति और सभ्यता को प्रकट करता है।
2) कुछ अंदरूनी शक्तियां, जैसे RSS, भारत की स्वाभिक राजनीतिक प्रवृत्ति को पीछे छोड़ राज करने की कोशिश कर रहीं हैं। उनको ताजमहल एक बाधा के रूप में नज़र आता है। इस तरह, ‘अति-राष्ट्रवादी’ होने की कोशिश में RSS खुद को राष्ट्र विरोधी बना लेती है।
3) उन्नीसवी शताब्दी से ताज को ऊपरी वर्गों के द्वारा नहीं बल्कि उत्तरी भारत के किसानों और कामगार वर्गों द्वारा संरक्षित किया गया है। उनका यह कार्य ताजमहल को साम्राज्यवाद विरोधी, कुलीन वर्ग विरोधी एवं जनता के आन्दोलन का प्रतीक बनाता है।

स्रोत: –

  • ‘द ताजमहल’, प्रोफ़ेसर रामनाथ ‘आगरा एंड नेबरहुड्स’,
  • एचजी केन्स ‘द अगरा पेपर्स’,
  • ब्रिटिश संसद के अभिलेख
  • ‘द आगरा डिस्प्यूट’, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अभिलेख
Avatar
About Author

Amaresh Mishra

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *