October 29, 2020

आज नौ अगस्त … भारत छोडो आन्दोलन की स्मृति साथ ले आया है. यह वही आन्दोलन था जिसने भारत की स्वतंत्रता सुनिश्चित कर दी. चूँकि मैं बलिया से हूँ और इस आन्दोलन ने बलिया को पन्द्रह दिन तक अंग्रेज प्रशासन से पूर्ण आज़ादी दिला दी.

बाद में अंग्रेज सेना ने फिर से लौटकर कब्ज़ा किया। गांधी जी का 9 अगस्त 1942 के उद्घोष ‘करो या मरो’ ने देश के लोगों में आज़ादी के लिए जोश व जूनून भर दिया. कांग्रेस के सारे नेता गिरफ्तार कर लिए गए.

 
जयप्रकाश नारायण व लोहिया ने भूमिगत होकर आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया. इलाहाबाद, बनारस आदि विश्वविद्यालयों को बंद कर सभी छात्रावास खाली करा दिया गया. मगर प्रशासन का ये कदम उसके लिए आत्मघाती सिद्ध हुआ, जब यहाँ से छात्र गाँव के दूर-दराज़ में जाकर आन्दोलन को नेतृत्व देने लगे तो ये आन्दोलन तेज़ी से गाँव-गाँव तक फ़ैल गया.
बनारस से जब ये छत्र ट्रेन से चले तो हर स्टेशन पे वहाँ के स्थानीय लोग ट्रेनों को रोक देते और इन छात्रों से बनारस व इलाहाबाद की स्थिति के बारे में जानकारी लेते। इस तरह लगभग हर स्टेशनों पर सभा होती और आन्दोलन के बारे में स्थानीय लोगों को बताते व उन्हें संबोधित करते हुए देशभक्ति व आज़ादी के रंग में डुबो देते.
एक चीज़ और साथ में करते चलते, वो ये कि टेलीफोन वगैरह के तार काट देते ताकि प्रशासन सूचना आगे को प्रसारित न कर सके. बलिया बयालीस के आन्दोलन की पूर्ण सफलता व उसके बाद इसको अन्य जगहों पे प्रसारित न कर पाने व स्वतंत्रता को ज्यादा लंबा न खींच पाने की असफलता का भी उदाहरण है.

आज “भारत छोडो” आन्दोलन पर बलिया के जगदीश ओझा ‘सुंदर’ जी का एक नव गीत साझा रहा हूँ इन पंक्तियों के साथ …
जगदीश कवि बलिया के रहे
जिनके नव-गीत मनोहर हैं
वो ‘सुन्दर’ गीत सुधा से सने
जनु काव्य-कला की मोहर हैं …
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भारत छोडो के नारे की
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भारत छोड़ो के नारे की, बलिया एक अमिट निशानी है
जर जर तन बूढ़े भारत की यह मस्ती भरी जवानी है
हो उठा क्रांति का शंखनाद, चल पड़ी अहिंसक सैन्य सघन
छा गयी शत्रुदल पे जाकर, गहराती प्रलय घटा बन बन
प्रलयन्कर मानव रूप देख आसुरी शक्ति असमर्थ हुई
तलवारें कर से छूट पड़ी, बंदूकें उसकी व्यर्थ हुई
अरिदल ने घुटने टेक दिए, यह कल की अभी कहानी है
भारत छोड़ो के नारे की…
कट गये तार लाइने उखड़ी, रेलो का चलना बंद हुआ
विद्युत वेगी शाही शासन का लौह तंत्र निस्पंद हुआ
बढ़ चले छात्र स्कूल छोड़, आज़ादी के अरमान लिए
बन बन ध्रुव औ प्रहलाद चले, करतल में कोमल प्राण लिए
देखा सबने इन बच्चों में, कितना पे कितना पानी है
भारत छोड़ो के नारे की…
कचहरियों पर अधिकार हुआ, कारागारों के द्वार खुले
भारत माँ का जय ध्वनि गूँजी, अपने बंदी सरदार खुले
फिर अपनी ही सरकार हुई, शासन का भव्य विधान बना
जनता की सेवा सत्य-प्रेम, शासन का लक्ष्य महान बना
चौदह दिन अपना राज रहा, जिसके हम सब अभिमानी हैं
भारत छोड़ो के नारे की………
पर शस्त्रों से सज्जित होकर सेना आ गयी निदर-सोली
फिर धुआँधार मच गया अरे, अविराम लगी चलने गोली
शोणित सरिता बह चली जिधर मुड़ पड़ी दानवी यह टोली
अंधेरा हुआ मच गयी लूट, जल उठी मकानों की होली
हमने देखी बैरटशाही, देखी स्मिथ की शैतानी है
भारत छोड़ो के नारे की…

प्राणों से क्रीड़ा होती थी, होते थे फायर पे फायर
थे गाँव-गाँव जलियाँवाला, हर दारोगा था ओ’डायर
पशुता की यह तांडव-लीला, टोले टोले दिन रात हुई
भालों ने शोणित पान किया, तलवारें रक्त स्नात हुई
नादिरशाही की जिसे देख बढ़ गयी आज हैरानी है
भारत छोड़ो के नारे की…………..
चढ़ विषम क्रांति की लहरों पर, हमने स्वराज का शासन देखा
निज हुंकारों से हिला हुआ, दृढ़ शाही सिंहासन देखा
हमने गोली वर्षा वाला, शोणित वाला सावन देखा
बयालीस में हमने एक बार फिर वही खूनी सत्तावन देखा
है कुंवर सिंह हर नर, हर नारी झाँसी वाली रानी है
भारत छोड़ो के नारे की………..
चुकता करने के हित ही तो माता का ऋण पाई पाई
एक-एक गोली पर दिखी यहाँ, उफ़ लाख लाख की तरुणाई
घर फूँक फूँक कर अपना ही, अपने हम बने तमाशायी
हम स्‍वतंत्रता के दीवाने, हम आज़ादी के सौदाई
अपने शोणित से की हमने अंकित निज अमर कहानी है
भारत छोड़ो के नारे की ..
इसके बलिदनो की गाथा, मधुकर से कलियों से पूछो
इन सुंदर सड़कों से पूछो, इन तन्वंगी गलियों से पूछो
पूछो उन अमर शहीदों की अगणित विधवाओं से पूछो
उन मदन सरीखे शिशुओं की व्यथिता माताओं से पूछो
बलि एक यहाँ के दानी थे, अब तो अगणित बलिदानी हैं
भारत छोड़ो के नारे की…………
जालिम की जुल्मों की जिनने प्रतिकार किया है सीनों से
पूछो उनसे यह लाल कथा, जो खेल चुके संगीनो से
अब भी बलिया के युवकों में बयालीस का खून उबलता है
नर नारी क्या इस नगरी के, कण कण में शोणित जलता है
यह अमर शहीदों की बस्ती, इक खेल यहाँ कुर्बानी है
भारत छोड़ो के नारे की……….
भृगुधाम नही ऋषिधाम नही, अब तो बलिया बलिधाम हुआ
राष्ट्रीय तीर्थ रसड़ा अब है, बैरिया वीरता ग्राम हुआ
अब बाँसडीह बलिदान-डीह स्वतंत्र सदन अभिराम हुआ
है धन्य-धन्य यह धराधाम, बयालीस में जिसका नाम हुआ
जिसके बूढ़ों की भी रग में युवकों सा जोश जवानी है
भारत छोड़ो के नारे की……………
घर घर है अपने अंतर में बर्बरता का उपहास लिए
कण कण गर्व आलोकित है, कुर्बानी का इतिहास लिए
ध्वंशसीन खंडहर भी है, निज नाशों पर उल्लास लिए
मानवता यहाँ मचलती है, निज भावी विमल विकास लिए
बर्बादी पे आँसू ढलना, समझा हमने नादानी है
भारत छोड़ो के नारे की..
आ यहाँ अदब से रे राही, इसको कुछ सुंदर फूल चढ़ा
आदर से इसको शीश झुका, सिर पर आँखों पर धूल चढ़ा
पथ में इसके बलिदनो की रक्तिम कल कथा सुनता जा
जा झूम झूम आज़ादी के, पुरजोश तराने गाता जा
यह स्वतंत्रता की यज्ञ भूमि, यह वरदायिनी कल्याणी है
भारत छोड़ो के नारे की, बलिया एक अमिट निशानी है
जर जर तन बूढ़े भारत की, यह मस्ती भरी जवानी है

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Masaud Akhtar

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