मिडिल क्लास फैमिली के लड़के, गाँव से शहर आए लड़के, नए नए लिबरल बने लड़के सेक्स हेतु मज़हब को बिस्तर पर बिछा देने के लिए बदनाम हैं।
कथित कम्यूनिस्ट बने मुसलमान लड़कों के परिवारों की राजनीतिक,धार्मिक तथा सामाजिक स्तर पर अवलोकन करेंगे तो पाएंगे वे इस्लाम को ही फॉलो करते हैं परंतु लड़के, परिवार से इतर मात्र यौनिक सुख हेतु कम्यूनिज्म, एथिज्म आदि का हाथ पकड़ते हैं और मकसद में कामयाबी मिलते ही पलटी मार जाते हैं।
मैंने आज तक किसी भी मुसलमान लड़के को चार-पांच साल से अधिक नास्तिक/कथित कम्यूनिस्ट/ बने हुए नहीं पाया। कॉलेज लाइफ खत्म, ‘विचार’ धारा खत्म। न जाने कितने विचारक रोज़ाना हमारे नीचे से गुजर जाते हैं। लोड नहीं लेते किसी का, काहे कि सब तरह की ज़िंदगी जी कर बैठे हैं और खूब पहचानते भी हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश खासकर हिंदी भाषाई क्षेत्रों के लड़के बड़े शहर या मझोले शहर की कॉलेज लाइफ में तमाम तरह के लोगों से मिलते हैं। मोहल्ले तक सीमित उनकी फैंटेसी कैम्पस पहुंच कर हिलेरे भरने लगती है। जो चालाक होते हैं वे ‘कथित लिबरल’ का चोंगा डाल लड़कियों के साथ आनंद से जीते हैं और जो बेचारे पीछे रह जाते हैं वे रास्ते में खड़े होकर सीटी बजाते हुए,’ओकरा के देबू,हमरा के डंटबू।’ कह कर बदनाम होते रहते हैं।
जेएनयू, एएमयू, जामिया या फिर डीयू की वे लड़कियां जो विचारधारा की कड़ाही में गलाई गईं होती हैं कभी उनसे बात करेंगे तो पाएंगे कि वे प्रेम में छली गईं। फिर प्रेम किया क्योंकि उनके लिबरांडू ब्वॉयफ्रेंड ने उन्हें छोड़ दिया। यह प्रेम चक्र लगातार चलता रहता है। लड़की इसी को आज़ादी समझ बैठती है और लड़कों की पूरी मौज़ हो जाती है। लड़की ने ज़रा सा मुंह खोला तो लड़का ‘क्रांतिकारी दल’ के बीच उस लड़की को कमज़ोर, पिछड़ी और पीछा करने वाली कह कर खुद को सेफ कर लेता है और लड़की अकेली ठगी बेचारी नकली हिम्मत और दृढ़ता का प्रदर्शन करते हुए एक बार फिर से खुद को किसी और के लिए तैयार करती है।
एएमयू में कोई विचारक नामक मंच है। वहां पर इस्लाम की आलोचना नहीं होती बल्कि बियर पीते हुए लड़के और लड़कियां बियर वाली तस्वीर के नीचे लिखते हैं ’नारा ए तक बियर’ ‘किंगफिशर अकबर’ ‘किंगफिशर अकबर’ और इतने से मन नहीं भरता तो इस्लामोफोबिक लोगों के साथ बैठ कर, इस्लाम को मन भर कर गरियाते हैं। न तो मुझे एएमयू के किसी प्रगतिशील लड़के से कोई दिक्कत है न तो किसी नास्तिक से। शराब पीकर सड़क पर लोट जाएं तो भी मुझे आपत्ति नहीं। लेकिन इस्लाम, कुरान , नमाज़ या फिर मुसलमानों के प्रति नफरत, अभद्र भाषा, गाली गलौच का इस्तेमाल होगा तो न सिर्फ आपत्ति होगी बल्कि मन क्रोधित हो जाएगा।
एएमयू के किसी भी प्रगतिशील या नास्तिक स्टूडेंट्स को क्या यह नहीं पता है कि बेवजह किसी को गाली नहीं देनी चाहिए, किसी को उकसाना नहीं चाहिए। मानता हूं कि आप एक आज़ाद देश के आज़ादख्याल लोग हैं, हम कूड़मगज कट्टरपंथी। लेकिन महाराज, हमने आपसे कभी कहा कि शराब न पियो, सेक्स न करो, लौंडियाबाज़ी में पीएचडी मत करो। नहीं कहा न। आप अपने हिसाब से ज़िंदगी जी रहे हैं, जीते रहिए। हमें हमारा अल्लाह प्यारा है। हमें कुरान पर यक़ीन है। हम नमाज़ी और रोज़ेदार हैं। अब आप सीने पर चढ़ कर कहोगे कि नमाज़ बंद करो, ये लो बियर पियो। तो भैया ई तो नहीं हो सकता न। अब आप ने हमको पीट दिया, हम थाने गए रिपोर्ट दर्ज हुई तो लगे रोने। अरे बड़े भैया। देश में कानून है। हम उसी के हिसाब से चलेंगे न। बियर पीनी थी तो पीते। तस्वीर लगानी थी तो लगाते। बोतल क्या पूरा बाल्टी भर के पियो। लेकिन कैप्शन में ‘नारा ए तक बियर’ लिखोगे तो पेले तो जाओगे न। जब पी रहे थे तो हम बोतल में मूतने तो आए नहीं। ऊंगली करोगे पहले। और हां, ऊंगली चाहे एथीस्ट को करो, चाहे प्रोग्रेसिव को या फिर मज़हबी इंसान को, दर्द सबको बराबर होता है।
और हां एएमयू के बैलेंसवादियों, तुम अभी इतने काबिल नहीं हुए हो कि तुम्हारे लिखने से डिस्कोर्स चेंज हो जाए। अंडा हो, चूज़ा तभी बनोगे जब हम फोड़ेंगे। देखा है हमने एक से बढ़ कर एक प्रोग्रेसिव, एथीस्ट, शराबी और गंजेड़ी। बहुत भगाते हैं हम ऐसे लोगों को अगर पीछे पड़ जाते हैं तो। हमने नाच नचाना शुरू कर दिया तो तुम सबका भोंपू सा बज जाएगा।

नोट : यह लेख पत्रकार मोहम्मद अनस की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है

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Mohammad Anas

लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं, पूर्व में राजीव गांधी फाउंडेशन व ज़ी मीडिया में कार्य कर चुके हैं।

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