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दंगा भड़काने में रोड़ा बन रहे थे, शायद इसलिए मारे गए सुबोध कुमार सिंह

ये उसी शिखर अग्रवाल की पोस्ट है जिसने तीन दिसंबर की सुबह को खेतों में गाय कटी हुई देखी। दो दिसंबर की सुबह में इसने सभी स्वयंसेवकों की मीटिंग रखी और अगले दिन गाय कटी हुई प्राप्त हुईं। यदि सही और ईमानदारी से जांच हो तो पता चलेगा कि गाय किन लोगों ने काटी और उनका मकसद क्या था?

सुबोध कुमार सिंह हत्या पर की गई FIR

 

महत्वपूर्ण सवाल –

  1. आखिर दो दिसंबर की मीटिंग क्यों रखी गई?
  2. बुलंदशहर में आयोजित इज्तिमा में देश भर से लाखों मुसलमान आए थे, कहीं इज्तिमा को डिस्टर्ब करने के लिए इस मीटिंग में कोई योजना बनाई गई?
  3. आखिर मुसलमान खेतों में पंद्रह से बीस की संख्या में गाय क्यों काटेगा? क्या स्थानीय मुसलमानों को नहीं पता कि इससे कितना बड़ा बवाल होगा और नुकसान उठाना पड़ेगा। अपने पैरों पर कोई कुल्हाड़ी क्यों मारेगा?
  4. कटी हुई गायों का इतने बड़े पैमाने पर मिलना और फिर तुरंत ही सैकड़ों की संख्या में लोगों का जुटना और कोतवाली पर हमला करना, क्या सुनियोजित नहीं था?
  5. बजरंगदल संयोजक योगेश राज तथा भाजपा युवा मोर्चा स्याना अध्यक्ष शिखर अग्रवाल ने कटी हुई गायों को सबसे पहले देखा। आखिर ये दोनों एक साथ खेतों की तरफ क्यों और किस मकसद से गए?
  6. पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह ने गुस्साई भीड़ को शांत कर दिया था, लेकिन योगेश राज एवं शिखर अग्रवाल ने ट्रैक्टर पर कटी गायों को रख मुख्य मार्ग जाम कर दिया। इसी वक्त इज्तिमा से लौट रहे लोग उस मार्ग से गुजर रहे थे। इनकी योजना थी रास्ता रोक कर इज्तिमा से लौट रहे लोगों पर हमला करने की, जबकि इंस्पेक्टर सुबोध ने लाठीचार्ज करवा कर रोड खाली करवानी चाही ताकि अप्रिय घटना न घटे।
  7. पुलिस ने जब बजरंगदल और भाजयुमों के पदाधिकारियों के मंसूबे फेल कर दिए तो कोतवाली और चौकी पर हमला बोला गया। इंस्पेक्टर के आँख में गोली मारी गई तथा पुलिसवालों को चौकी के कमरे में बंद कर आग लगा दी गई। खिड़की तोड़ कर पुलिसवाले बगल के कॉलेज में घुस गए जिससे उनकी जान बची।
  8. पुलिसवालों ने दंगा भड़काने की कोशिश कर रहे शिखर एवं योगेश का प्लान चौपट कर दिया, क्या इस कारण से इंस्पेक्टर को मारा गया?
मोहम्मद अनस
स्वतंत्र पत्रकार तथा सोशल मीडिया विशेषज्ञ
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नज़रिया – तरुण गोगोई के इस ट्वीट के बाद क्या राहुल गांधी का घेराव करेंगे NRC पीड़ित

असम में चालीस लाख नागरिकों की नागरिकता ख़तरे में है। ट्वीटर पर असम के पूर्व मुख्यमंत्री श्री तरूण गोगोई ने एलान करते हुए लिखा है कि NRC उनकी दिमाग की उपज थी। असम में NRC की कोई ज़रूरत नहीं थी फिर भी हमने बनाया।
15 साल तक ये आदमी असम का मुख्यमंत्री रहा। 2001-16 तक। जिन चालीस लाख नागरिकों की नागरिकता पर आज तलवार लटक रही है वह तलवार इन कांग्रेसियों ने लटकाई है। भाजपाईयों का इसमें कोई कसूर नहीं। कांग्रेस गड्ढा खोदती रही और हमें लगा कि भाजपा खोद रही है।
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अब साफ हो गया कि कांग्रेस ने ही असम में यह संकट खड़ा किया है। मैं दिल्ली समेत देश भर के अपने सामाजिक कार्यकर्ता मित्रों से पूछना चाहता हूं कि वे नागरिकता के इस अतिमहत्वपूर्ण सवाल को लेकर श्री राहुल गाँधी का घेराव कब कर रहे हैं?
जिस नर्क का निर्माण कांग्रेसियों ने असम में आम लोगों हेतु किया है क्या उसके प्रति जवाबदेही आदरणीय राहुल गाँधी जी की नहीं बनती? क्या उनसे सवाल वे लोग करेंगे जो हर दूसरे दिन भाजपा को सांप्रदायिकता के मुद्दे पर सड़क पर घसीट लेते हैं। इस संकट का सबसे बड़ा शिकार मुसलमान बन रहे हैं।
कांग्रेस का हमदर्द बनने की जितनी भी कोशिशें करता हूं, हर बार कांग्रेस के कारनामों से उससे दूर हो जाता हूं। बीते समय में काग्रेस की कम्यूनल पॉलिटिक्स, जोड़तोड़ को भुलाने का भरसक प्रयास करता हूं, लेकिन वर्तमान में कांग्रेस की तरफ से उनके प्रति ऐसा कोई भी सकारात्मक कदम नही उठाया जाता जिनकी पीढ़ियों को बर्बादी के कगार पर खुद कांग्रेस ने छोड़ा था। आख़िर 2019 में कांग्रेस का साथ दिया भी जाए तो क्यों दिया जाए।

मोहम्मद अनस
नोट: यह लेख पत्रकार मोहम्मद अनस की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है
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नज़रिया – एथीस्ट ,प्रोग्रेसिव या मज़हबी, उंगली करने पर दर्द सबको होता है

मिडिल क्लास फैमिली के लड़के, गाँव से शहर आए लड़के, नए नए लिबरल बने लड़के सेक्स हेतु मज़हब को बिस्तर पर बिछा देने के लिए बदनाम हैं।
कथित कम्यूनिस्ट बने मुसलमान लड़कों के परिवारों की राजनीतिक,धार्मिक तथा सामाजिक स्तर पर अवलोकन करेंगे तो पाएंगे वे इस्लाम को ही फॉलो करते हैं परंतु लड़के, परिवार से इतर मात्र यौनिक सुख हेतु कम्यूनिज्म, एथिज्म आदि का हाथ पकड़ते हैं और मकसद में कामयाबी मिलते ही पलटी मार जाते हैं।
मैंने आज तक किसी भी मुसलमान लड़के को चार-पांच साल से अधिक नास्तिक/कथित कम्यूनिस्ट/ बने हुए नहीं पाया। कॉलेज लाइफ खत्म, ‘विचार’ धारा खत्म। न जाने कितने विचारक रोज़ाना हमारे नीचे से गुजर जाते हैं। लोड नहीं लेते किसी का, काहे कि सब तरह की ज़िंदगी जी कर बैठे हैं और खूब पहचानते भी हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश खासकर हिंदी भाषाई क्षेत्रों के लड़के बड़े शहर या मझोले शहर की कॉलेज लाइफ में तमाम तरह के लोगों से मिलते हैं। मोहल्ले तक सीमित उनकी फैंटेसी कैम्पस पहुंच कर हिलेरे भरने लगती है। जो चालाक होते हैं वे ‘कथित लिबरल’ का चोंगा डाल लड़कियों के साथ आनंद से जीते हैं और जो बेचारे पीछे रह जाते हैं वे रास्ते में खड़े होकर सीटी बजाते हुए,’ओकरा के देबू,हमरा के डंटबू।’ कह कर बदनाम होते रहते हैं।
जेएनयू, एएमयू, जामिया या फिर डीयू की वे लड़कियां जो विचारधारा की कड़ाही में गलाई गईं होती हैं कभी उनसे बात करेंगे तो पाएंगे कि वे प्रेम में छली गईं। फिर प्रेम किया क्योंकि उनके लिबरांडू ब्वॉयफ्रेंड ने उन्हें छोड़ दिया। यह प्रेम चक्र लगातार चलता रहता है। लड़की इसी को आज़ादी समझ बैठती है और लड़कों की पूरी मौज़ हो जाती है। लड़की ने ज़रा सा मुंह खोला तो लड़का ‘क्रांतिकारी दल’ के बीच उस लड़की को कमज़ोर, पिछड़ी और पीछा करने वाली कह कर खुद को सेफ कर लेता है और लड़की अकेली ठगी बेचारी नकली हिम्मत और दृढ़ता का प्रदर्शन करते हुए एक बार फिर से खुद को किसी और के लिए तैयार करती है।
एएमयू में कोई विचारक नामक मंच है। वहां पर इस्लाम की आलोचना नहीं होती बल्कि बियर पीते हुए लड़के और लड़कियां बियर वाली तस्वीर के नीचे लिखते हैं ’नारा ए तक बियर’ ‘किंगफिशर अकबर’ ‘किंगफिशर अकबर’ और इतने से मन नहीं भरता तो इस्लामोफोबिक लोगों के साथ बैठ कर, इस्लाम को मन भर कर गरियाते हैं। न तो मुझे एएमयू के किसी प्रगतिशील लड़के से कोई दिक्कत है न तो किसी नास्तिक से। शराब पीकर सड़क पर लोट जाएं तो भी मुझे आपत्ति नहीं। लेकिन इस्लाम, कुरान , नमाज़ या फिर मुसलमानों के प्रति नफरत, अभद्र भाषा, गाली गलौच का इस्तेमाल होगा तो न सिर्फ आपत्ति होगी बल्कि मन क्रोधित हो जाएगा।
एएमयू के किसी भी प्रगतिशील या नास्तिक स्टूडेंट्स को क्या यह नहीं पता है कि बेवजह किसी को गाली नहीं देनी चाहिए, किसी को उकसाना नहीं चाहिए। मानता हूं कि आप एक आज़ाद देश के आज़ादख्याल लोग हैं, हम कूड़मगज कट्टरपंथी। लेकिन महाराज, हमने आपसे कभी कहा कि शराब न पियो, सेक्स न करो, लौंडियाबाज़ी में पीएचडी मत करो। नहीं कहा न। आप अपने हिसाब से ज़िंदगी जी रहे हैं, जीते रहिए। हमें हमारा अल्लाह प्यारा है। हमें कुरान पर यक़ीन है। हम नमाज़ी और रोज़ेदार हैं। अब आप सीने पर चढ़ कर कहोगे कि नमाज़ बंद करो, ये लो बियर पियो। तो भैया ई तो नहीं हो सकता न। अब आप ने हमको पीट दिया, हम थाने गए रिपोर्ट दर्ज हुई तो लगे रोने। अरे बड़े भैया। देश में कानून है। हम उसी के हिसाब से चलेंगे न। बियर पीनी थी तो पीते। तस्वीर लगानी थी तो लगाते। बोतल क्या पूरा बाल्टी भर के पियो। लेकिन कैप्शन में ‘नारा ए तक बियर’ लिखोगे तो पेले तो जाओगे न। जब पी रहे थे तो हम बोतल में मूतने तो आए नहीं। ऊंगली करोगे पहले। और हां, ऊंगली चाहे एथीस्ट को करो, चाहे प्रोग्रेसिव को या फिर मज़हबी इंसान को, दर्द सबको बराबर होता है।
और हां एएमयू के बैलेंसवादियों, तुम अभी इतने काबिल नहीं हुए हो कि तुम्हारे लिखने से डिस्कोर्स चेंज हो जाए। अंडा हो, चूज़ा तभी बनोगे जब हम फोड़ेंगे। देखा है हमने एक से बढ़ कर एक प्रोग्रेसिव, एथीस्ट, शराबी और गंजेड़ी। बहुत भगाते हैं हम ऐसे लोगों को अगर पीछे पड़ जाते हैं तो। हमने नाच नचाना शुरू कर दिया तो तुम सबका भोंपू सा बज जाएगा।

नोट : यह लेख पत्रकार मोहम्मद अनस की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है

मिडिल क्लास फैमिली के लड़के, गाँव से शहर आए लड़के, नए नए लिबरल बने लड़के सेक्स हेतु मज़हब को बिस्तर पर बिछा देने के लिए…

Mohammad Anas यांनी वर पोस्ट केले रविवार, १० जून, २०१८

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वे बताना चाहते हैं कि इस देश में तुम्हें रहना है तो दब कर रहो

अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में आज पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को छात्रसंघ द्वारा आजीवन सदस्यता प्रदान की जानी थी। बीजेपी इस बीच पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना की तस्वीर जो कि एएमयू के यूनीयन हॉल में लगी है को वहां से निकालने की बात करने लगी।
गोपाल कृष्ण गोखले ने मोहम्मद अली जिन्ना के बारे में कहा था कि वे हिंदू मुस्लिम एकता के दूत हैं यही बात सरोजनी नायडू ने भी दोहराई। एएमयू में उनकी तस्वीर 1938 में लगाई गई। जबकि पाकिस्तान की मांग उन्होंने 1940 में की थी। 1938 के पहले तक वह एक क़ाबिल वकील और सेक्यूलर विचारधारा के नेता थे। एक तरफ हिंदू महासभा थी तो दूसरी तरफ मुस्लिम लीग। दोनों का बराबर योगदान रहा भारत के बंटवारे में।

अकेले जिन्ना ही नहीं बल्कि एएमयू छात्रसंघ ने महात्मा गाँधी, जेपी, आंबेडकर समेत बहुत सी विभूतियों को आजीवन सदस्यता प्रदान की है और उनकी तस्वीर परंपरानुसार वहां मौजूद है। पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी तथा भाजपा के रिश्ते जगजाहिर हैं। भाजपा ने उन्हें कभी भी सम्मान नहीं दिया। यहां तक की उनके विदाई समारोह में भी पीएम मोदी ने उन पर कटाक्ष किया था।

आज जब एएमयू में हामिद अंसारी मौजूद थे तभी भाजपा के लोगों ने गेट पर पहुंच कर नारेबाज़ी शुरू कर दी। छात्रों ने उन्हें पकड़ कर पुलिस को सौंप दिया। न्यायसंगत तो यही था कि उन प्रदर्शनकारियों की जमा तलाशी ली जाती। छात्रों का कहना है कि वे सब हथियार से लैस थे। ख़ैर पुलिस ने आधा दर्जन भाजपाईयों को तुरंत ही छोड़ दिया और फिर छात्रों को घेर कर पीटना शुरू कर दिया।


यह कोई मामूली बात नहीं है। यह इस देश में अल्पसंख्यकों को भयभीत तथा उनके शैक्षणिक संस्थानों की नींव हिलाने की साज़िश का हिस्सा है जिसे आरएसएस अंजाम दे रही है। जब भीतर देश का पूर्व उपराष्ट्रपति आजीवन सदस्यता ग्रहण कर रहा हो तभी बाहर राज्य पुलिस उनकी पिटाई करे जो पूर्व उपराष्ट्रपति को यह सम्मान दे रहे हों तो संदेश साफ है।
वे क्या कहना चाहते हैं। वे बताना चाहते हैं कि इस देश में तुम्हें रहना है तो दब कर रहो। दोयम दर्जे का नागरिक बन कर रहो। लेकिन संघियों। अभी तुममें इतनी हिम्मत और ताक़त नहीं है कि इस प्यारे वतन जिसका नाम हिंदुस्तान है, यहां की आबो हवा से तुम हमारा नाम मिटा सको। चार दिन की सरकार है। कर लो जितना अन्याय करना है। फिर वापस से वही शाखा। वही पैंट। वही खो खो। वही कबड्डी। आज सरकार है,पुलिस है तो उसका इस्तेमाल कर लो। हम डंटे रहेंगे। घेर कर मारोगे फिर भी हटेंगे नहीं। हम इस देश के संविधान के रखवाले हैं। अंग्रेज भी ऐसे ही पीटते थे क्रांतिकारियों को। हम उस दौर की याद दिला रहे हैं। मारोगे पर हरा नहीं पाएओगे।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी ज़िंदाबाद।
छात्र एकता ज़िंदाबाद।
हामिद अंसारी ज़िंदाबाद।
मोहम्मद अनस,
स्वतंत्र पत्रकार तथा सोशल मीडिया विशेषज्ञ

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गुलबर्गा के निसार अहमद के जेल में बीते 23 साल क्या कांग्रेस वापस करेगी ?

तारीख़ थी पन्द्रह जनवरी 1994. जगह थी कर्नाटका. शहर था गुलबर्गा. एक नौजवान जो उस वक़्त फार्मेसी की पढ़ाई कर रहा था. इंटर पास किये हुए उसे सिर्फ दो साल हुए थे. कॉलेज में एडमिशन हुआ और वक़्त बीतने लगा. उसे इस बात का इल्म बिल्कुल नहीं था की जब वह फार्मेसी की पढ़ाई कर रहा होगा तो एक दिन उसे कर्नाटका पुलिस ट्रेन बम ब्लास्ट का आरोपी बता गिरफ्तार कर लेगी.
जिस नौजवान को 15 जनवरी 1994 को गुलबर्गा पुलिस ने अपनी जीप में भर लिया था उसे 28 फरवरी 1994 को कोर्ट में पेश किया गया. एक महीने तेरह दिन तक निसार अहमद का कुछ अता पता नहीं चलता. वो कहाँ है, किस हाल में है ,इसकी ख़बर न उसके घर वालों को थी न ही कॉलेज को. निसार के बाद उनके भाई ज़हीर अहमद को भी पुलिस उठा ले जाती है. आरोप होता है बाबरी मस्जिद विध्वंस का बदला लेने के लिए ट्रेन में ब्लास्ट.
जिस वक़्त निसार और ज़हीर गिरफ्तार होते हैं उस वक़्त कर्नाटका के मुख्यमंत्री जनता दल के एच डी देवगौड़ा होते हैं जो बाद में देश के प्रधानमंत्री भी बनते हैं. देवगौड़ा के बाद कांग्रेस का राज आता है कर्नाटका में. एस एम कृष्णा और फिर उसके बाद धरम सिंह मुख्यमंत्री बनते हैं. इनमें से धरम सिंह तो गुलबर्गा शहर के ही रहें वाले थे. उसी गुलबर्गा जहाँ से निसार और उसके भाई ज़हीर को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया था. गुलबर्गा शहर में तब कांग्रेस के विधायक हुआ करते थे. मौजूदा वक़्त में कमरुल इस्लाम गुलबर्गा उत्तर से विधायक हैं. मैं यह सब इसलिए बता रहा हूँ ताकि आपको पता चल जाए की जब निसार और ज़हीर के माँ बाप भाई बहन अपने दो नौजवान बेटों की इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे थे उस वक़्त कर्नाटका में भाजपा का राज नहीं था. जिस वक़्त निसार अहमद के माँ बाप अपना सब कुछ गँवा कर सत्ता की बेईमानी और पुलिस की मक्कारी के विरूद्ध अदालत की चौखट पकड़ कर खड़े थे उस वक़्त वहां भाजपा की सरकार नहीं थी.

ज़हीर को जेल में कैंसर हो जाता है तो अदालत उसे बिमारी के बिना पर 2008 में बरी कर देती है. निसार उम्र कैद की सज़ा काट रहा होता है.
केंद्र में कांग्रेस थी. राज्य में कांग्रेस थी. गुलबर्गा में भी कांग्रेसी ही थे लेकिन जेल में निसार था. इस मुल्क के सेक्युलरिज्म को बिरयानी के प्लेट में रख जब दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक के दाढ़ी टोपी वाले मुसलमान , फैब इण्डिया का कुरता पहने प्रगतिशील, मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षिता पर हैबिटेट सेंटर के अन्दर मंच सजाने वाले वामपंथी डकार मार रहे थे तब गुलबर्गा में निसार के अब्बा दम तोड़ देते हैं. जवान बेटों की बेगुनाही साबित करते करते 2006 में ज़हीर और निसार के अब्बा नूरुद्दीन अहमद दुनिया से चले जाते हैं. बेटे जेल में और बाहर बाप कब्र में. यही दिया है इस देश की एक बड़ी सियासी पार्टी ने जिसने सेक्युलरिज्म का तमगा हम मुसलमानों से ही हासिल किया है. जिनके हाथ हमारी नौजवान नस्ल की बर्बादी से रंगे हो उनकी पहचान कांग्रेसी है.
क्या निसार की रिहाई के लिए कर्नाटका में एक भी मुस्लिम नेता नहीं मिला? क्या कर्नाटका का एक भी कांग्रेसी निसार और उसके परिवार के लिए नहीं उठ खड़ा हो सकता था ? बात मज़हब की न भी करें तो कम से कम इंसानी हुकूक के लिए क्या एक भी नेता नहीं था इस प्रदेश में ? एक अकेला बाप लड़ता रहा और कहता रहा की मेरे बच्चे बेगुनाह हैं और आखिरकार 23 साल बाद. जी हां तेईस साल के बाद निसार बेगुनाह जेल से छूट जाता है. पिछले दो तीन दिनों से गोरखपुर बीआरडी मेडिकल कॉलेज के डाक्टर कफील की रिहाई का जश्न मनाया जा रहा है. भाजपा राज्य और केंद्र दोनों जगह है. जब भी मुसलमानों के विरूद्ध अन्याय होता है तो हर तरह के लोग बचाव में सामने आ जाते हैं. यही कारण रहा की कफील सिर्फ नौ महीने के भीतर ही रिहा हो गये यदि कांग्रेस का शासन होता और कफ़ील जेल में होते तो उनकी रिहाई इतनी जल्दी न हो पाती, क्योंकि हम कांग्रेस के अन्याय और अत्याचार से आँख मूंदे बैठे रहने वाले लोग हैं. कांग्रेस की गोली हमें ज़हर नहीं बल्कि अमृत लगती है और भाजपा का चांटा हमें खंजर की मार.
कार्नाटका में चुनाव हो रहे हैं. गुलबर्गा के निसार , ज़हीर , उनके मरहूम अब्बा ,अम्मा ,बहनों के साथ जो अन्याय की गाथा लिखी गयी, उसका हिसाब लिए बगैर इन कांग्रेसियों का पक्ष लेना मेरी नज़र में सबसे बड़ी बेईमानी है.
मोहम्मद अनस
स्वतंत्र पत्रकार एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ

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भारत -पाकिस्तान संबंध

जब लाहौर में वाजपेयी बोले -"हम जंग न होने देंगे"

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई जी को उनका 93 वाँ जन्मदिन मुबारक। पाकिस्तान यात्रा के दौरान लाहौर गवर्नर हाउस में सुनाई गई उनकी एक प्रसिद्ध कविता।

हम जंग न होने देंगें

हम जंग न होने देंगे।
विश्व शांति के हम साधक हैं, जंग न होने देंगे।
कभी न खेतों में फिर खूनी खाद फलेगी,
खलिहानों में नहीं मौत की फसल खिलेगी,
आसमान फिर कभी न अंगारे उगलेगा,
एटम से नागासाकी फिर नहीं जलेगी,
युद्धविहीन विश्व का सपना भंग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
हथियारों के ढेरों पर जिनका है डेरा,
मुँह में शांति, बगल में बम, धोखे का फेरा,
कफन बेचने वालों से कह दो चिल्लाकर,
दुनिया जान गई है उनका असली चेहरा,
कामयाब हो उनकी चालें, ढंग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी,
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी,
हमने छेड़ी जंग भूख से, बीमारी से,
आगे आकर हाथ बटाए दुनिया सारी।
हरी-भरी धरती को खूनी रंग न लेने देंगे
जंग न होने देंगे।

भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ रहना है,
प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है,
तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महँगा सौदा,
रूसी बम हो या अमेरिकी, खून एक बहना है।
जो हम पर गुजरी, बच्चों के संग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
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देश

हत्यारे की मदद ! यह सब राजनीति है, और आप उसके ईंधन बन चुके हैं

Indian Express की ख़बर है कि अफराज़ुल की क्रूरता पूर्वक हत्या करके उसका वीडियो बनाने वाले वहशी दरिंदे शंभू रेगर ऊर्फ शंभू भवानी की पत्नी के बैंक अकाउंट में देश भर से 512 लोगों ने 3 लाख रूपए जमा करवाए हैं। पुलिस ने हत्यारे शंभू भवानी की पत्नी का बैंक अकाउंट सीज़ करते हुए दो बिजनेसमैन प्रकाश सिंह तथा दिनेश सिंह को पैसा भेज कर उसकी पर्ची फेसबुक पर पोस्ट करने की वजह से धारा 151 CRPC के तहत गिरफ्तार कर लिया।
शंभू भवानी एक हत्यारा है। हत्यारे की मदद के लिए आगे आने वाले लोग भी हत्यारी मानसिकता के होते हैं। अफराज़ुल की जगह कोई और होता, मान लीजिए आपके परिवार का कोई सदस्य होता, तब भी ऐसे ही सोशल मीडिया पर हत्या को सही करार देते?
इस समाज के बड़े बूढ़े आगे आएं। नौजवानों को हत्यारा बनने से बचाएं। जो सब सोशल मीडिया पर गंदगी देखते हैं न, यह सब राजनीति है। आप ईंधन बन चुके हैं। आपको जला कर कुछ लोग रोटी सेंकते हैं। इस बात का एहसास कब होगा?
वसुंधरा सरकार ने कम से कम थोड़ी बहुत कार्यवाई तो की, हरियाणा में मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर पुलिस गिरफ्तार करना तो छोड़िए, नोटिस भी नहीं लेती। हो सकता है एकाध महीने के बाद कानूनी कार्यवाई ढीली कर दी जाए और शंभू भवानी बाहर आ जाए।

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नज़रिया – यूपी निकाय चुनाव में सपा से क्यों छिटका मुस्लिम वोटर्स

यादव जाति से ताल्लुक रखने वाले नेताओं को समाजवादी पार्टी के लिए एक बलिदान देने की ज़रूरत है। चूंकि समाज का बड़ा तबका अब इस जाति की राजनैतिक महत्वकांक्षा का उतना ही विरोधी बन गया है जितना कभी ब्राह्मणों का विरोधी था। सबसे ज्यादा यादवों का विरोध पिछड़ी जाति के कुर्मी,मल्लाह, कोईरी,कुशवाहा, केवट आदि करने लगे हैं, वे सपा द्वारा यादव तुष्टिकरण से इतने खिन्न हुए कि मजबूरी में भाजपा के साथ हो गए।
समाजवादी पार्टी का शुरूआती दौर यादवों को सबल बनाने में बीता, सबने स्वागत किया। लेकिन उसके बाद यादवों में सत्ता के प्रति जो लालच उत्पन्न हुई उसने अन्य जातियों के हक़ और हुकूक को पूरी तरह से पार्टी के भीतर से समाप्त कर दिया। यादव होना ही सबसे बड़ी मेरिट बन गई। पिछले पांच सालों का राजनैतिक समीकरण यदि देखा जाए तो सत्ता के लालची यादवों ने भाजपा का दामन खुल कर थामा।
यादवों की इस हरक़त का मुसलमानों ने दबे स्वर में विरोध तो किया लेकिन भाजपा भय ने उन्हें खुल कर समाजवादी पार्टी का विरोधी नहीं बनने दिया। यूपी निकाय चुनाव में पश्चिम यूपी समेत पूरे उत्तर प्रदेश में सपा के इस यादवीकरण का मुसलमानों ने विरोध किया और शहरी मुसलमानों ने समाजवादियों को बड़े स्तर पर नकारते हुए कांग्रेस-बसपा की तरफ रूख कर दिया।ग्रामीण इलाक़ों में भी मुसलमानों ने यादवीकरण के विरोध में निर्दलीय प्रत्याशी को वोट दे दिया लेकिन समाजवादी को नकार दिया।
यदि समाजवादी कार्यकर्ता अथवा नेता इसके पीछे ओवैसी फैक्टर या फिर मुसलमानों की गद्दारी को वजह बताते हैं तो यह उनकी मूर्खता होगी। जो लोग दूसरों की दया पर कुर्सी पर बैठे होते हैं उन्हें दान-दक्षिणा देने वालों को गद्दार नहीं कहना चाहिए। मुसलमानों के सब्र को सलाम कीजिए, सबक़ सीखिए न कि ऊंगली उठाइए।

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नज़रिया – क्या दलितों और पिछड़ों का झुकाव उग्र हिंदुत्व की तरफ है ?

आरक्षण से पहले जातिगत आधार पर हिंदुओं का ध्रुविकरण होता था, आरक्षण के उपरांत आरक्षण प्राप्त जातियों के भीतर का आक्रोश आखिर कहां फूटता, वह मुसलमानों के विरूद्ध इस्तेमाल होने लगा। पिछड़े,दलित तथा आदिवासियों का जीवन स्तर जितनी तेजी से सुधरा वे उतनी ही उग्रता से हिंदुत्व की ओर बढ़े। हिंदू बनने की इस होड़ में गली मोहल्ले में नए नए उत्सव त्योहार की शक्ल लेने लगे। दलितों तथा पिछड़ों की बस्तियों में देवी-देवता की चौकियां नब्बे के दशक से पहले या तो होती नहीं थी या फिर नाममात्र की होती थी।
जातिय आंदोलन का पूरा फोकस हिंदुत्व अर्थात ब्राह्मणवाद के विरोध पर टिका हुआ था। हक़ मिला तो समाज के हाशिए पर पड़े लोग उठ कर आगे आने लगे। अब होड़ मची हिंदू बनने की, इस पर किसी भी क्षेत्रीय राजनीतिक दल या वैचारिक संगठन ने ध्यान नहीं दिया। महाराष्ट्र में इस पर अम्बेडकरवादियों ने भले ही कार्य किया हो परंतु यूपी-बिहार में उनकी मौजूदगी का कोई भी असर नहीं पड़ सका।
आज गुजरात में जातिय गोलबंदी हो रही है। कांग्रेस जो कि खुद ब्राह्मणवाद पर टिकी राजनैतिक पार्टी है,वह झोली फैला कर जातिगत आधार पर वोटबैंक की भीख मांग रही है लेकिन वहां भी सांप्रदायिकता के सवाल पर चुप्पी है। यह चुप्पी ख़तरनाक न सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए है बल्कि देश के संवैधानिक चरित्र के लिए संकट पैदा करने वाली है।
खाया पिया आदमी धर्म रक्षा के लिए सबसे ज्यादा उत्तेजित रहता है, खाली पेट सबसे पहले भूख मिटाने का इंतज़ाम करता है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि लोग जब तक हाशिए पर रहते हैं तभी तक उनमें दंगाई प्रवृत्ति नहीं पाई जाती, लेकिन यह भी सच है कि आरएसएस-भाजपा के प्रति जिस तेजी से यह वर्ग आगे बढ़ रहा है वह उनके भीतर हिंदू बनने या उससे अपनी पहचान करवाने की ललक साफ समझ आती है।

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क्या मुस्लिम सियासी मुहब्बत और सियासी नफ़रत से बाहर आयेंगे ?

मौलाना आज़ाद ने क्या किया, क्या नहीं किया और वह क्या और कर सकते थे, इस पर खूब बहस हो सकती है. नेहरू को भी हम सुक़ूत-हैदराबाद जो होम मिनिस्टर पटेल के दौर में हुआ और उस क़त्ल आम, उसके लिए उन पर ऊँगली उठाते हैं. लेकिन ये भी सच है कि मौलाना आज़ाद की शख्सियत की वजह से बोहत कुछ बच गया और 47 के बाद के दौर में जब लाखों हिन्दू-मुसलमान मारे गए थे, भारत आये लाखों रिफ्यूजियों में एक बोहत बड़ी तादाद अपने साथ उत्तर भारत में मुसलमानों के लिए नफरत ले कर आई थी. अर्बन सेंटर यानी शहर जिनसे मुल्क की तहज़ीब बनती है, ख़ुसूसन देहली मुसलमानों से खाली हो चूका था. देहली में जो मुस्लिम आबादी बच गयी, पनाहगुज़ीन की तरह रह रहे मुसलमान, उनको आज़ाद के देहली में होने की वजह से बड़ी तक़वियत थी.
यूपी के हालात का तो अंदाजा तो सिर्फ उस अहद की जनरेशन ही कर सकती है, जिन्होंने झेला है और जो जानते हैं. पटेल के पास होम था, पुलिस थी, इंटेलिजेंस था, गांधी पर कई हमले हो चुके थे फिर भी सिक्योरिटी नहीं बढ़ी और उनके होम मिनिस्टर होते हुए गांधी का क़त्ल हुआ, जो उनके करियर पर एक धब्बा है (जिसकी बात नहीं की जाती), कितना बड़ा फेलियर, इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स के बावजूद देहली में बाबा-ए -क़ौम मार दिए गए. उस ज़माने की कांग्रेस कैसी थी. पुरुषोत्तम दास टंडन, सम्पूर्णानन्द, राजेंद्र प्रसाद जैसे बड़े नेता और नेहरू से ज़्यादा सीनियर कांग्रेसी जो जंगे आज़ादी के लोग थे मगर उनका मुसलमानों को ले कर रुख कौन नहीं जानता और जिनको ओवररूल कर पाना, उनको रोकना, डील करना आसान नहीं था. इनमें ज़्यादातर का मुसलमानों के लिए क्या नजरिया था, ये शायद अब लोग भूल गए हैं, पढ़ा नहीं, या किसी और वजह से नहीं जानते. पंत के सामने नेहरू की यूपी तक नहीं चल पाती थी. [ये इंदिरा का अहद नहीं था जब पार्टी, सरकार, कांग्रेस वर्किंग कमिटी सब वज़ीर आज़म के हाथ में आ गयी].
गोडसे ने गांधी को मारा, इससे संघ थोड़ा बैकफुट पर हुआ मगर ये भी हर जगह नहीं हुआ था. अफसरशाही किस हद तक कम्यूनल थी. वह तो सरदार पटेल के निधन के बाद हालात बदले और नेहरू की पार्टी में चलना शुरू हुई।

पंडित नेहरू, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल एवम अन्य

कांग्रेस के ताक़तवर बड़े लीडर सख़्तगीर संघी ज़ेहनियत के लोग थे जो मुस्लमान को एक इंच नहीं देना चाहते थे. आज के संघ के लोगों का क्या ज़िक्र इनके सामने, ये लोग तो स्पेन को दोहराना चाह रहे थे, ४७ के ज़ोर में. जिसे हम आज संघ कहते हैं उससे बोहत हायर डिग्री के संघी उस ज़माने में कांग्रेस में मौजूद थे. ग्वालियर में क्या हो रहा था, अलवर में महाराजा ने क्या किया था, ये तो बोहत दूर थे, उससे पहले ही देहली में जो किचेन में इस्तेमाल होने वाली छुरियां मुसलमानों के घरों से ज़ब्त करवाएं थी और जब नेहरू खुद सड़क पर आये थे.
नेहरू जो थे वह थे. सत्तर या अस्सी के बाद पैदा हुई नस्ल को ये अंदाजा ही नहीं है ये नामनिहाद कांग्रेसी कैसे थे या कि कस्टोडियन का डर क्या होता था. हम लोग एक गलती करते हैं–शख्सियतों को बिलकुल रिजेक्ट करना या पैशनेट मोहब्बत, बिलकुल जज़्बाती काम. हर शख्सियत में अच्छाइयां भी होती है बुराइयां भी, सब ब्लैक एंड व्हाइट नहीं, ग्रे शेड्स भी होते हैं. मौलाना आज़ाद ने कितने इंस्टीटूशन, कितने इलाक़े बचा लिए, खामोशी से, नेहरू उनकी बात मान ही जाते थे, बोहत कुछ सुन लेते थे, कई मामलों में चीज़ें बढ़ती नहीं थीं या न्यूट्रलाइज हो जाती थीं.
उस ज़माने में कोई मीडिया नहीं था, चीफ मिनिस्टर और चीफ कमिश्नर राज (स्टेस में) की ज़्यादतियों की कोई सुनवाई नहीं थी. ये आज़ाद ही थे जो एक फोन पर सेठ गोविन्द दास जैसे ताक़तवर कांग्रेसी (संघी) का एक वार रोक कर ऐसा फैसला बदल कर, सब कुछ कर लेते थे. कांग्रेस और जंग आज़ादी में उनके सबसे विज़िबल चेहरा होने की वजह से मौलाना आज़ाद को हिन्दू राइट टारगेट नहीं कर पाया.
बातें बोहत हैं, बेरब्त हैं, क्या क्या लिखा जाए. उस ज़माने में सूबों में ब्यूरोक्रेसी का कम्यूनलिज़्म, हैरतअंगेज़ आर्डर जो मुसलमानों को टारगेट करते थे. कांग्रेस एक पॉलिटिकल पार्टी थी और उस पर जिनका तसल्लुत था, सब जानते हैं, इसके बावजूद उस पार्टी में तमाम नामुसाएद हालात के बावजूद, मौलाना ने जो किया है (एक बड़े साथी के नाते नेहरू पर उनका असर और उस के ज़रिये भी), वोह सुनहरे अलफ़ाज़ में लिखा जाने और कभी न भुलाये जाने लायक है. वैसे मौलाना हिफजुर रहमान और मौलाना हुसैन अहमद मदनी या हसरत मोहनी ने जो बन पड़ा किया, मगर आज़ाद और नेहरू की केमिस्ट्री बाद के दौर में आप कह सकते हैं रफी को जो फ्री हैंड था मगर वह यूपी के हालात में कुछ कर सकने की पोज़िशन में थे!!! (सिर्फ नेहरू के आइज़ और इयर्स के तौर पर). हमें कांग्रेस से कोई मोहब्बत कभी नहीं रही.
1962 और फिर इंदिरा के दौर में फसादात का एक सिलसिला शुरू हो गया मगर ये सच है कि जो कुछ बचा खुचा नाम निहाद सेक्युलरिज़्म या थोड़ा बोहत है, उसके लिए 1950 से 1958 और उसके बाद नेहरू के इंतक़ाल तक जो हुआ था, उसका बड़ा रोल है. नेहरू का मिज़ाज, उनकी पीएम बनने की ललक (किस में नहीं होती), उसके बावजूद, नेहरू को एक दम से रिजेक्ट करना भी ज़्यादती है. और आज़ाद का कंट्रीब्यूशन तो खैर बेहद बेहद अहम है, इसके बगैर हिंदुस्तान का ये चेहरा भी न बचा होता.
इंडिपेंडेंस के बाद हिन्दुतान में शुमाली रियासतों में हमने खुद अपनी सियासी बसीरत और तदब्बुर का इस्तेमाल नहीं किया. सियासत है, हर जगह, हर पार्टी, हर मुक़ाम पर, हर जगह चैनल ऑफ़ कम्यूनिकेशन होना चाहिए, टेक्टिकली, फिर कोई पार्टी हो… यूपी के मुस्लमान तो पाकिस्तान बनने के बाद उसकी डिमांड को लेकर खुदबखुद एक गिल्ट में मुब्तिला रहे, ऐसा गिल्ट जो कई नस्लों को चट कर गया.
बाक़ी कांग्रेस का क्रिटिसिज़्म तो हम दशकों से कर रहे हैं और करते रहेंगे, मगर जिसका जो कंट्रीब्यूशन है (निस्बतन जो बेहतर थे) उसका एतराफ़ ज़रूरी है. सब उम्मीदें और प्लानिंग थीं, स्पेन को दोहराने की. मार दिए जाएँ, डरा दिए जाएँ, नौकरियों के दरवाज़े बंद, ज़बान-कल्चर पर हमला, ज़मीनें छीनना, अजीब क़ानून जो सूबों में नाफ़िज़ हो जाते थे, जान माल पर हमले, कि नतीजे में भाग जाएँ पाकिस्तान और 10-11 से स्टेडिली घट कर मुस्लिम आबादी 5-6% या उससे भी नीचे कुछ दशकों में आ जाती. मगर कुछ ऐसे हालात हुए, सरदार पटेल के इंतक़ाल के बाद, और काफी बातें हैं। नेहरू से संघ की नफरत यूं ही नहीं है. जितना कुछ और जिस लेवल पर वह तब सैंतालीस के पुश में कर सकते थे, वोह नहीं कर पाए. आज दस बीस को मार सकते हैं, मगर उस स्केल पर जो वह चाहते थे, नहीं हो पाया