भारतीय राजनीति के इतिहास में अपने आप को समाजवाद की नई परिपाटी के साथ स्थापित करने वाली समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक व्यवस्था में अधिक लोकप्रिय रही है । वही समाजवादी जिसने अपने बल पर सत्ता में परिवर्तन कर राज्य को विकास मूलक कार्यो में जोड़ा , प्रदेश के युवाओं को भी बेहतर शिक्षा देने , भारतीय संस्कृति की गंगा जमना तहज़ीब को असल मे सन्तुलित रखने वाली पार्टी भी आज सकते म नजर आ रही है ।

हर एक पार्टी की तरह ही सपा पर भी वंशवाद के आरोप लगते रहे है , जिसका फिलहाल का ही उदहारण आजम खान के बेटे के राजनीति में उतरने ओर विधानसभा सीट पर विजय पाने के चलते भी समाने आया । ये पार्टी के नेता और वरिष्ठ नेता आजम खां का अपना एक व्यक्तिगत मामला है । जिस पर चर्चा लगातार की जा रही है । इस सब से अलग समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता ,पार्टी अध्यक्ष के चाचा शिवपाल यादव खुद को अब पार्टी से उपेक्षित महसूस करने लगे है , जिसके चलते एक नया माजरा सामने आया है जो कि समाजवादी सेक्युलर मोर्चा के गठन का है , बीते बुधवार को शिवपाल ने औपचारिक रूप से समाजवादी सेक्युलर मोर्चे के आह्वान किया ।

पार्टी आंतरिक कलह से पिछले 2 सालों से जूझ रही है जिस वक्त पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पार्टी प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाकर चाचा शिवपाल को नियुक्त कर दिया था , तभी से पार्टी में कलह का पौधा जड़ पकड़ने लगा था । बीते एक जनवरी 2017 को अखिलेश की पार्टी अध्यक्ष की ताजपोशी के दिन ही शिवपाल को पार्टी अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था । जिसके परिणामस्वरूप अखिलेश यादव ने शिवपाल के मंत्रिमंडल से कई नेताओं को बर्खास्त कर दिया था ।

ये स्वभाविक है जहाँ दो बर्तन एक साथ होते है वहां आवाज का आना लाज़मी है , लेकिन अब गौर करने वाली बात ये है कि क्या शिवपाल द्वारा तैयार मोर्चा 2019 लोकसभा में अपने उम्मीदवारों को उतारने की जद्दोजहद में है ? पिछड़े वर्गों ओर क्षेत्रीय पार्टीयों का समर्थन पाकर क्या शिवपाल यादव समाजवादी पार्टी के लिए ही नया राजनीतिक अड़ंगा बनना चाह रहे है ?

इसी के साथ कुछ राजनीतिज्ञ इसे बीजेपी के समर्थन के तौर पर देख रहे है । इस तरह से समाजवादी पार्टी के नेता और खुद पार्टी की जड़े कमजोर हो रही है । क्योंकि समाजवादी पार्टी का वर्चस्व हमेशा से उत्तर प्रदेश के राजनीति में रहा है जिसके चलते पार्टी की गरिमा आज भी बनी हुई है परन्तु इस तरह के कार्य और संगठनो का तैयार होना समाजवादी पार्टी के लचर प्राशासन के होने की ओर संकेत कर रहे है और पार्टी को आशंका की श्रेणी में खड़ा कर रहा है ।

पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में परिवर्तन पार्टी और वरिष्ठ नेताओ के लिये हानिकारक साबित हो सकता है या तो नेता पार्टी से व्यक्तिगत तौर पर इस्तीफा दे खुद को अलग कर लेंगे या वह पार्टी के कार्यो में रोचीपूर्ण रूप से कार्य नही करेंगे और पार्टी के विघटन के लिये तत्तपर रहेंगे । यदि ऐसा होता है तो यह प्रदेश के राजनीति में नया मुद्दा ओर राजनीतिक इतिहास बन कर संरक्षित हो जाएगा ।

अयूब अली
डॉ भीम राव अम्बेडकर कॉलेज