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नहीं रहे 'उर्दू शायरी में गीता' लिखने वाले 'अनवर जलालपुरी"

नहीं रहे 'उर्दू शायरी में गीता' लिखने वाले 'अनवर जलालपुरी"

कल 01 जनवरी 2018 को ब्रेन हेम्रेज के कारण अनवर जलालपुरी का इन्तकाल हो गया। अनवर जलालपुरी का जन्म 6 जुलाई 1947 को उत्तर प्रदेश के आम्बेडकरनगर जिले के जलाल पुर नामक ग्राम में हुआ था।
पूरा नाम अनवार अहमद – अनवर जलालपुरी दशकों से पूरे हिंदुस्तान और खाड़ी देशों में भी वे मुशायरों के संचालन के लिए जाने जाते थे। उनकी निज़ामत एक मामूली शायर को बकमाल शायर बनाने की सलाहियत रखती थी। उन्हीं के अल्फाज़ो में

मैं हर बे-जान हर्फ़-ओ-लफ़्ज़ को गोया बनाता हूँ
कि अपने फ़न से पत्थर को भी आईना बनाता
—-अनवर जलालपुरी

हर इन्टरनेशनल मुशायरे में भारत पाकिस्तान और खाड़ी देशों में अनवर जलालपुरी की निजामत चार चाँद लगा देती थी।

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” उर्दू शायरी में गीता ” के लेखक अनवर जलालपुरी

अनवर जलालपुरी गंगा जमुनी तहज़ीब के पुरोधा के रूप में पहचान बनाने वाले जिनका एक कारनामा कई पीढ़ियां याद रखेंगी। अनवर जलालपुरी ने महान ग्रंथ गीता को उर्दू के अशआरों में ढाल दिया।
भूतपूर्व अखिलेश सरकार ने उत्तरप्रदेश के सर्वोच्च पुरस्कारों में शामिल यश भारती पुरस्कार से इन्हें नवाजा था।

पिछले दिनों आज तक टी.वी.ने आपका साक्षात्कार लिया था। उसके मुख्य अंश आपके जवाब वतन से मुहब्बत के आयाम को ज़ाहिर करते हैं।

आपके पसंदीदा लेखक-शायर?

मीर, नजीर (अकबराबादी), मीर अनीस, गालिब, इकबाल. धर्म के रास्ते पर देखंर तो मौलाना आजाद और गांधी का कैरेक्टर मेरी जिंदगी को प्रभावित करता रहा है. गांधी के यहां कथनी-करनी में कोई फर्क नहीं.

नमाज पढ़ते हैं? खुदा से कोई शिकायत?

हां पढ़ता हूं. खुदा से शिकायत करने वाले से बड़ा कोई नादान नहीं.

अब आप लखनऊ में रह रहे हैं. यहां के कौन-से रस्मोरिवाज आपने अपनाए?

मैं अंग्रेजी का लेक्चरर रहा और कुर्ता-पाजामा पहन के कॉलेज जाता रहा. ज्यादा सब्जी खाता हूं. गोश्त में चिकन कभी-कभी, वरना दाल, सब्जी और तला मिरचा.

नई सरकार कॉमन सिविल कोड, धारा 370 और अयोध्या पर नई बहस छेड़ रही है. इन मुद्दों पर आपकी राय क्या है?

इन तीनों की अभी स्पष्ट व्याख्या की ही नहीं गई है. गोलमोल बातें हुई हैं. कॉमन सिविल कोड मुसलमानों के स्वीकारने की बात बाद में है, पहले उत्तर के, दक्षिण के, सवर्ण-दलित तो स्वीकारें. और 370, मैं बगैर कश्मीर के हिंदुस्तान का नक्शा नामुकम्मल समझता हूं.

ख्वाहिश मुझे जीने की ज़ियादा भी नहीं है
वैसे अभी मरने का इरादा भी नहीं है
हर चेहरा किसी नक्श के मानिन्द उभर जाए
ये दिल का वरक़ इतना तो सादा भी नहीं है
वह शख़्स मेरा साथ न दे पाऐगा जिसका
दिल साफ नहीं ज़ेहन कुशादा भी नहीं है
जलता है चेरागों में लहू उनकी रगों का
जिस्मों पे कोई जिनके लेबादा भी नहीं है
घबरा के नहीं इस लिए मैं लौट पड़ा हूँ
आगे कोई मंज़िल कोई जादा भी नहीं

–अनवर जलालपुरी

अनवर जलालपुरी अब इस दुनिया से आगे सफर कर चुके है। अदब के हर मोड़ पर उनकी याद हमारी रहनुमाई करते रहेगी।

“खान”अशफाक़ ख़ान
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Ashfaq Khan

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