प्रेम प्रकाश जी वरिष्ठ पत्रकार हैं और मेरे मित्र हैं। कम लिखते हैं पर लाजवाब लिखते हैं। उनकी एक रोचक लेख नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ। उसे पढ़ने के पहले मेरी यह बात भी पढ़ लीजिएगा।

प्रेम प्रकाश जी ने कल्पना की है कि अगर भगवान राम स्वतः 29 तारीख को आ कर बनारस कचहरी में लोकसभा चुनाव के संदर्भ में अपना पर्चा दाखिल कर दें तो मोदी समर्थकों की क्या प्रतिक्रिया होगी। जो भी प्रतिक्रिया हो सकती है वह आप प्रेम जी की पोस्ट में पढें, पर मैं ऐसी ही स्थिति से रूबरू हो चुका हूं, तो जो मैंने देखा सुना है वह अब आप पढिये।

1990 में मैं अयोध्या में था। रामलला तब तंबू में नहीं भेजे गए थे। अयोध्या गुलज़ार थी। शाम को अक्सर मंदिर आंदोलन से जुड़े लोग जन्मस्थान पर ही आ जाते थे। उनसे बात चीत होती रहती थी। एक दिन ऐसे ही मंदिर आंदोलन के एक नेता जी ने कहा कि राम का जन्म यहीं हुआ था और मंदिर भी यहीं बनना चाहिये। मेरे एक सीनियर अफसर ने कहा कि ” अगर थोड़ा हट के बन जाय तो क्या दिक्कत है। ” उन्होंने कहा कि, ” जब जन्म यहीं हुआ है तो हट कर क्यों बने ।”

ऐसी ही बहसी बहसा चलती रही। हम सब भी खाली बैठे रहते थे। ऐसी बतकही मनोरंजक भी होती थी। साथ ही चाय भी आती रहती है। जब देर तक बहस होने लगी और मंदिर आंदोलन के नेता अपने इतिहास और पुरातत्व ज्ञान से, हर बार यही साबित करते रहे कि राम का जन्म यहां हुआ था। जिसके पास जो भी ज्ञान था वहीं उड़ेल देता था। गनीमत थी तब तक व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञान अवतरित नही हुआ था।

हमलोगों के साथ ही बीएसएफ के एक नए डीएसपी जो अभी अभी नौकरी में आये थे, जिनकी कम्पनी वहां ड्यूटी पर मेरे साथ थी भी उसी बहस में शामिल हो गये।  मैं गर्भगृह का प्रभारी था तो मेरा दिन भर वही गुजरता था। सुबह 10 बजे वहां पहुंच जाता था, देर शाम तक रहता था। वह डीएसपी साहब बिहार के रहने वाले और इतिहास के छात्र रह चुके थे। पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने एमए इतिहास से किया था।  कुछ तो नए होने और कुछ अपने इतिहास की पृष्ठभूमि के कारण पुरातत्व और रामकथा के विविध सन्दर्भो से नेता जी के रामजन्म के स्थान की थियरी पर सवाल उठाने लगें। अब बहस अकादमिक हो चली थी। अकादमिक बहस से नेता जी असहज होने लगे थे। अंत तक  नेता जी ने यही कहते रहे कि यह मेरी आस्था है राम यहीं जन्मे थे। कह कर उन्होंने उसी विवादित भवन की ओर इशारा किया।

तब मेरे एक वरिष्ठ अधिकारी जो, यह सब सुन रहे थे,  काफी मजाकिया स्वभाव के हैं, और आजकल वह रिटायर होकर वाराणसी में रहते है, ने कहा कि, ” अब आप लोग बहस बंद कीजिए और अपने अपने काम पर लगिये। अगर अब भगवान राम साक्षात प्रगट होकर भी यह कह दें कि मैं यहां नहीं वहां पैदा हुआ था, तो भी यह मंदिर आंदोलन वाले कहेंगे राम से कि, अब आप चुप रहिये। हम जहां कह रहे हैं वही आप जन्मे थे।”

इस पर जोर से ठहाका लगा और वह नेता जी भी उसी ठहाके में शामिल हुए। वह नेता जी आजकल एमपी हैं। कई बार एमपी रह चुके हैं। विपन्नता से संपन्नता के कई सोपान वे, पार चुके हैं। मेरे अच्छे मित्र तब भी थे और अब भी हैं ।

विद्वान कहते हैं, राम का स्वरूप, महत्वपूर्ण नहीं है, राम के स्वरूप से अधिक राम के नाम का महात्म्य है। पर अब तो राम के स्वरूप और राम के नाम से अधिक राममंदिर के एजेंडे का महात्म्य है। क्यों कि रामनाम भले ही मुक्ति दिलाता हो पर ‘ मुक्ति ‘ देखता कौन है, और इस मुक्ति का करना क्या है ! पर राममंदिर का विवाद तो सत्ता दिलाता है और ऐश्वर्य लाता है। तंबू में विराजे राम से अच्छा मुद्दा भला क्या हो सकता है ? यह अलग बात है अब राम ही इनके एजेंडे से अलग हो गए हैं।

यह तो हुयी मेरी बात अब आप प्रेम प्रकाश जी की पोस्ट पढ़ लें।

मान लीजिए, अगर पता चले कि कल 29 तारीख को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम स्वयं महीयसी सीता माता के साथ अकस्मात काशी पधारे और सीधे कलेक्ट्रेट जाकर महामना मोदी जी के खिलाफ पर्चा भर आये, तो क्या सोचते हैं, फेसबुकिया भक्तों की दीवारें कैसे फटेंगी

भक्त1– जय श्री राम की ऐसी तैसी, बताइये हम इनका भव्य मंदिर बनवाने में लगे हैं और इनको चुनाव लड़ने की पड़ी है। अरे देशभक्त होते तो टाट में पड़े रहते, लेकिन इनको तो अब संसद की एसी चाहिए। चुनाव लड़ने वाली कौमें क्रांति नही करती। तब क्यो नही लड़े, जब बाप ने देशनिकाला दे दिया था? कौन बाप निकालता है अपने लड़के को ऐसे भरी जवानी में? नाकारा रहे होंगे तभी तो।

भक्त2-पूरे रविवंश में ऐसा कपूत नही हुआ कोई। प्राण जाय पर वचन न जाई वाली परम्परा का तेल निकाल कर रख दिया। माँ बाप ने इनको अकेले वनवास दिया था तो बीवी को भी साथ ले गए। वनवास था कि वनविहार? याद रखियेगा, भाई को भी भाई नही, नौकर बनाकर ले गए थे।

भक्त3– अरे बीवी छोड़नी ही थी तो मोदी जी की तरह छोड़ते, बेचारे धोबी के कंधे पर रखकर बन्दूक चला दी। नाहक बदनाम किया बेचारे गरीब को। यही है, यही है सामंती मानसिकता, साफ पता चलता है कि दलित और पिछड़ा विरोधी आदमी थे। जिस बीवी को छोड़ने के लिए बेचारे धोबी को बदनाम कर दिया, उसी बीवी के लिए ब्राह्मण रावण को मारा बताइये। ये जाति द्रोही आदमी है, इनका तो पर्चा खारिज कर देना चाहिए।

भक्त4– रोज 30 बाण मारते थे। दस सिर और बीस भुजाएं काटते थे। वो सब फिर से उग आता था। देश का धन बरबाद करते रहे, वो तो मोदी जी ने कान में असली राज बताया कि इसकी नाभि में अमृत है। तब जा के 31वाँ बाण नाभि में मारा। तब जा के अमृत सूखा था, लेकिन बिकाऊ मीडिया ये सब नही बताएगा आपको।

भक्त5– मियां बीवी ने मिलकर बेचारे लक्ष्मण को तो मरवा ही डाला था। सोने के मृग वाला इतिहास वामी इतिहासकारों का लिखा इतिहास है। असली इतिहास पढ़िए तो पता चलेगा, मारीच से मिल के लक्ष्मण को मारने का पूरा प्लान था। लक्ष्मण तो समझ भी गए थे पर त्रिया चरित्र भी तो कोई चीज़ होती है।

बीजेपी आईटी सेल- बेकार का, बाप के पैसे पर राज करने का सपना देखने वाला जानकर जब बाप ने देशनिकाला दिया तो हजरत राजसिंहासन का रत्नजड़ित खड़ाऊं चुरा ले गए।भागते भूत की लँगोटी भली। वो तो भरत की पारखी नज़र ने ताड़ लिया और पूरे लाव लश्कर के साथ वो कीमती और ऐतिहासिक खड़ाऊं ले आने वन आये। आप असली इतिहास पढ़ के देखिए, भरत इनको मनाने नही आये थे। वही रत्नजड़ित खड़ाऊं लेने आये थे और पूरे समय वही मांगते रहे, अंत मे लेकर ही माने।

ये है इतिहास इन तथाकथित सूर्यवंशियों का। चुपचाप वही टाट में पड़े रहते तो भव्य क्या, मोदी जी दिव्य मंदिर बनवा देते। लेकिन ये तो देशद्रोही निकले। अब रहिये वहीं।”

© विजय शंकर सिंह