महिला सशक्तिकरण

क्या संदेश छोड़ गया बीएचयू की छात्राओं का आंदोलन?

क्या संदेश छोड़ गया बीएचयू की छात्राओं का आंदोलन?

पिछले कुछ दिनों से हमारे देश का मीडिया, सरकार, बुद्धिजीवी व छात्र वर्ग काफी बेचैन और व्यस्त दिखाई पड रहे है इसका कारण एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जिसने सभी लोगो को एक बार फिर अपने सामाजिक, राजनीतिक कार्यो की जांच पड़ताल करने पर मजबूर कर दिया।
जिस पर पूरे जोश के साथ कवरेज की जा रही थी भाषण दिए जा रहे थे क्यूंकि मुद्दा भारत की आधी आबादी का था क्यूंकि मुद्दा महिलाओं का था।
बनारस विश्विद्यालय में एक शाम घटी छेड़खानी की घटना ने यदि पूरे देश का ध्यान अपनी और आकृष्ट किया तो उसका कारण वो लड़कियां थीं जिन्होने अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को प्रधानसेवक तक पहुंचाने की कोशिश की।
लड़कियों के द्वारा शुरू किए गए आंदोलन का प्रारंभ व अंत अन्य सभी आंदोलनो जैसा ही था, चरम पर पहुंचकर पतन तक आना। जो हर आंदोलन की प्रवृत्ति होती है इसकी भी थी लेकिन यहां कुछ और भी घटित हुआ जिसपर गौर करना ज़रूरी है।

  • भारत जैसे देश में छेड़छाड़ पर चुप रहने जाने वाली महिलाएं यहां इसी सच्चाई को समाज के सामने रख रहीं थीं जहाँ विरोध करने वाली महिलाएं स्वयं को सदैव अकेला पातीं है वहां आज एक साथ हज़ारों लड़कियां एक साथ खड़ी हैं।
  • बदलाव का यह जीता जागता सबूत है ये विकास का सही मापदंड है। अस्मिता पर लगी आंच के खिलाफ आवाज़ उठाने से लेकर समाज और सरकार को बदलाव की चुनौती देने तक का सफर छोटे छोटे कदमों से चलकर हमारी देश की महिलाएँ यहां तक आईं है।
  • ये आंदोलन छेड़छाड़ बंद नहीं कर सकते लेकिन महिलाओं को हिम्मत देने व पुरूषो को सोचने पर ज़रूर मजबूर कर सकते है।

जब जब हम इस घटना से जुड़ी तस्वीरें देखते है तब तब हमे अपने केश कटाए एक महिला दिखाई पड़ती है जिसने छेड़छाड़ के विरोध में अपनी खूबसूरती का त्याग कर दिया।

महिला की लंबे बाल उसकी खूबसूरती का ही नहीं उसकी जिम्मेदारियां, कठिनाइयों, नारीत्व, लड़ाई का भी प्रतीक होते है केश कटाए उस महिला ने अपने नारीत्व के संकेत का त्याग कर हमारे सामने नारी के स्वाभिमान से जुड़ी काली सच्चाई को खड़ा कर दिया अगर महिला की खूबसूरती उसके विकास, सम्मान, न्याय के रास्ते में आ रही है तो वो निसंकोच अपनी खूबसूरती का त्याग कर सकती है।

अपने खिलाफ हुए अन्याय की आवाज़ को ये लड़कियां भारत के सत्ताधारियों का पहुंचाना चाहती थीं लेकिन दुख की बात है कि भारतीय प्रधानसेवक अपनी जनता की पीड़ा को सुनना नहीं चाहता। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के मूल बिन्दु में जनता व शासक का आपसी सहयोग एंव शासक की जनता के प्रति वचनबद्धता होती है परंतु हमरे प्रधानमंत्री इस भावना से अभी कोसो परे हैं।
जिस समाज जिस राष्ट्र में लड़कियां स्वयं को घर, परिवार, पढ़ाई तक ही सीमित रखती थी वहां इनका इतना बड़ा आंदोलन कर देना देश और समाज के लिए शुभ संकेत देता है
यह बात हमारे प्रशासको को जल्द से जल्द समझ लेनी चाहिए कि जो महिलाये अपने स्वाभिमान के लिए सड़क पर उतर सकती है है वो महिलाएं सरकार को सड़क पर ला भी सकती हैं।
ना सही जांच, ना उचित सुनवाई जितना अच्छा व क्रांतिकारी ये आंदोलन था उतना संतोषजनक इसका अंत नहीं हो पाया फिर भी समाज के ठेकेदारों और पुरुषवादी सोच रखने वालो के कान खड़े कर देने के अपने उदेश्य को इस आंदोलन ने पूरा किया।

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Ankita Chauhan

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