व्यंग

व्यंग – जब नुक्कड़ में मेरा सामना नए नए राष्ट्रवादी से हुआ

व्यंग – जब नुक्कड़ में मेरा सामना नए नए राष्ट्रवादी से हुआ

उस तरफ नुक्कड़ पे एक नवोदित राष्ट्रवादी भाई मिल गए थे। बड़े विद्वान, आधुनिक और आला-मिजाज… खिजाब से रँगे बालों का घना गुलछट, माथे पर तिलक, दाढ़ी-मूँछ सफाचट, कंधे पर केसरिया गमछा, नीली जीन्स और सूती का सफेद कुर्ता! मुँह में पान, कुर्ते की कॉलर के पीछे से झाँकती पीली जनेऊ और पैरों में घिसी हुई हवाई चप्पल उनकी शोभा खूब बढ़ा रहे थे।
अँगोछे से चेहरा साफ करके हाथ के हिंदी अखबार को तोड़-मरोड़कर काँख के नीचे दबाते हुए हमारी ओर तीक्ष्ण दृष्टि से उन्होंने देखा और पान की पीक सँभालते हुए बम की तरह “जय श्री राम” का नारा उछाला। हम सावधान की मुद्रा में आ गए। हर्ष, विस्मय, कुतूहल और समादर से भरकर हमने जवाब दिया, “हर हर महादेव।”
“जय हो, जय हो” वे बोले। फिर पीक घूँटकर यूँ बोले… “श्रीमान! सत्तर सालों से हम अपमान का घूँट पीते जा रहे हैं। देशवासी पिस रहे हैं। देश के शासक ही शोषक हो गए हैं। फिर इस मुर्दा हो चुके देश में नवजीवन का संचार करने के लिए श्रीराम और श्री लक्ष्मण जी महाराज की तरह सामने आए श्री नरेंद्र मोदीजी और श्रीयुत अमित शाह जी। आज लोग उनकी भी ख़िलाफ़त कर रहे हैं। ऐसे देवता जैसे नेताओं का विरोध करने वाले आखिर ये भ्रष्ट बुद्धिजीवी चाहते क्या हैं? कैसे बचेगा देश? कैराना की हार क्या कहती है? जरा सोचिए। देश फिर से मुसलमानों के अधीन हो जाएगा। नहीं? हो जाएगा कि नहीं?? हो जाएगा न??? आप क्या कहते हैं??? कुछ बोलिये। ऐसे चुप मत बैठिये। सत्तर साल आप चुप रहे लेकिन अब बोलना होगा। अब मुँह खोलना होगा। मुकाबला करना होगा। डट कर लोहा लेना होगा और भारत माता की रक्षा के लिए अपने प्यारे हिंदुस्तान को हिन्दू राष्ट्र घोषित करना होगा। समझ रहे हैं न आप? हमें मोदीजी के सपने को साकार करना होगा।”
अचानक राष्ट्रवादी भाई की अंटी में रखे फ़ोन की घण्टी बजी… रिंगटोन था… “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे…!”
“भैण के… खान्ग्रेसी है! जब देखो तब फ़ोन घुमा देता है।” चट से फ़ोन काटकर बोले। कहने लगे, “फेसबुक पर सारा दिन मुसलमानों की तरफदारी करता है। गाँधी और नेहरू जैसे देश के गद्दारों की जयजयकार करता है। वीर सावरकर, गुरु गोलवलकर और पंडित दीन दयाल जी पर छींटाकशी करता रहता है। पड़ोस का दुकानदार है। बीड़ी उधार दिया करता है। फेसबुक पर ब्लॉक भी तो नहीं कर सकते न!”
थोड़ी देर चुप रहे जैसे कुछ सोच रहे हों। फिर बचा-खुचा पान चबाकर जोर से थूकते हुए उन्होंने हमारी ओर घूरा। हम सकते में थे। होठों के कोने से ठुड्ढी पर लटकती लार की लाल लड़ी को छाती पर टपकने से बचाने को अँगोछा झटककर मुँह पोछते हुए महानुभाव की गंभीर वाणी गूँजी, “आप भले आदमी लगते हैं। आपको पता होगा। मँहगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार और कुशासन की जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ पिछली सरकारें हैं। मोदीजी तो केवल उनके पाप धो रहे हैं। आप समझते होंगे। बुद्धिमान हैं। सामाजिक चिंतन और राष्ट्रीय विमर्श के कई बिंदु हैं जिन पर विचार होने चाहिए। अधिक समय नहीं है। संक्षेप में कुछ बिंदु कहे देता हूँ। घर जाकर जरूर सोचिएगा और दूसरों से भी कहियेगा।”
हम खामोश खड़े सुन रहे थे। अचरज से हमारी आंखें फटी जा रही थीं। गर्मी की भयानक दोपहरी में वे गरज रहे थे… “वैदिक काल की व्यवस्था को देखिये। कितनी उन्नति और कितना उत्कर्ष दीख पड़ता है! महाभारत कालीन वैज्ञानिक प्रगति की सोच लीजिये। लोग मनमोहन सिंह और नरसिम्हा राव के फिजूल के अर्थशास्त्र की बात करते हैं…! अजी, भारत सोने की चिड़िया थी, सोने की चिड़िया…!! और लंका तो पूरी तरीके से सोने की ही थी!!! रावण के पुष्पक विमान और सेतुसमुद्रम से क्या संकेत मिलते हैं? विचारियेगा कभी। गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी की ही बात ले लीजिए। क्या समृद्धि और क्या प्रौद्योगिकी! एक से बढ़कर एक उदाहरण!! मगर फिर काले अध्याय जुड़ने शुरू हो गए… मुग़ल, जहाँगीर और लोदी, जयचंद की कहानी और भारत के मुसलमान…!!! थू है थू… और अब ये खान्ग्रेसी… एक तो करेला कड़वा और ऊपर से नीम सना।”
कहते-कहते महोदय का मुँह गुस्से से लाल हो गया। होंठ कँपने लगे। मुट्ठियाँ भिंचने लगीं। गमछे से पसीना पोंछते हुए महाराणा प्रताप की तरह सीना तानकर रिक्शे पर बैठे और कड़क स्वर में “जय श्री राम” का नारा बुलंद किया। मेरा हृदय सहम चुका था। धीरे-धीरे कुछ शब्द मेरे होठों पर आए… “हर हर महादेव!” राष्ट्रवादी महोदय का रिक्शा किसी विजय रथ की तरह बढ़ता जा रहा था। मैं उनका तुड़ा-मुड़ा हिंदी अखबार हाथ में लिए सन्नाटे में खड़ा था… कह नहीं सकता कितनी देर!
© मणिभूषण सिंह

नोट – यह लेख मणिभूषण सिंह जी की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है

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Manibhushan Singh

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