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इनका गुनाहगार कौन ?

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क़ायदे से देखा जाये तो कर्नाटक के किसी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का नाम टीपू सुल्तान के नाम पर होना चाहिए था क्योंकि आज कर्नाटक राज्य का नाम लो या वहाँ के महान हस्तियों का ज़िक्र करो तो टीपू सुल्तान का नाम सबसे पहले ज़हन में आता है।
ठीक इसी तरह दिल्ली जो मुग़लिया शान-ओ-शौक़त में पली बढ़ी जवान हुई और अपने हुस्न के जलवे से पूरी दुनिया में एक अलग मुक़ाम पाई। इनसब के पीछे मुग़लिया तहज़ीब का सबसे बड़ा योगदान रहा है। क़ायदे से देखा जाए तो दिल्ली स्थित अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का नाम आख़िरी मुग़ल बादशाह एवं जंग-ए-आज़ादी के मशहूर सेनानी बहादुर शाह ज़फ़र के नाम पर होना चाहिए।
अब बात करते हैं लखनऊ की, अगर कोई लखनऊ का नाम लेता तो वही नवाबी शान, अदब-ओ-तहजीब का मरकज़ यही सब ज़हन में तुरंत आता है।  लखनऊ का नाम और पहचान अगर किसी शख़्स के नाम के बग़ैर अधूरा है तो वो शख़्स नवाब वाज़िद अली शाह हैं। अगर क़ायदे से देखा जाए तो अमौसी एयरपोर्ट का नाम नवाब वाज़िद अली शाह के नाम पर होना चाहिये क्योंकि शहर की पहचान ही इनसे जुड़ी है।
अब सोचिए कि किसने ये सब होने से रोका और कौन है वो जिसने इन अज़ीम शख़्सियतों का नाम मिटाने की पूरी कोशिश की? कौन है वो जिसने तारीख़ को मिटा दिया? सिर्फ़ बीजेपी को गाली दे देने से जवाब नहीं मिल जाएगा।  पहचानों उन चेहरों को जिसने हुकूमतों में रहकर तुम्हें हर जगह से मिटाने की कोशिश की और कामियाब भी हुए।
जब टीपू सुल्तान का नाम कांग्रेस ने इस मुल्क की इतिहास से जड़ से मिटा दिया तो आज इन संघियों को भला बुरा कह के क्या मिल जाएगा। संघी तो जासूस थे इनकी नफ़रत तो लाज़मी है पर इन कांग्रेस के कथित ठेकेदारों ने क्या किया? इनका हिसाब कौन देगा?
लगभग सत्तर साल राज करने के बावजूद इनके नाम पर कोई एक भी सड़क, न यूनिवर्सिटी, न एयरपोर्ट न ही इतिहास में कहीं इनको कोई स्थान दिया उलटा संदिग्ध बनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ा और आज ये कमजर्फ़ लोग टीपू के नाम पर राजनीति की नौटंकी कर रहे हैं। सच्चाई यही है कि नैशनल हीरो “टीपू सुल्तान” के साथ हर एक सियासी दल ने ग़द्दारी की है, और असल धोखा तो सेक्युलर दलों में दिया है।

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