ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 100वें स्थान पर है। Fb पे ये जानकारी हम सब एक दूसरे को प्रेषित कर रहे हैं।
इसका अर्थ समझा रहे हैं और इसकी भयावहता भी बता रहे हैं। ये सब हम एक दूसरे से कर रहे हैं जिसमें सभी ये जानकारी भी रखते हैं और इसकी समझ भी।
इस भयावहता को हम सब आपस में लिख और शेयर कर रहे हैं जिनमे दूर दूर तक कोई भूखा नही। मैं भी खुद चार परोठा भकोस ये जानी हुई जानकारी आपसे शेयर कर रहा हूँ। सोंचना तो ये है कि हम में से कौन है जो उस अंतिम आदमी तक इस भयावह खबर को पहुंचा पाया है जिसकी कल भूख से मौत होनी है?जो कल इस आंकड़े का हिस्सा होगा।

प्रतीकात्मक तस्वीर

दुनिया के तमाम मुद्दों पर सोशल मीडिया पे बहस होनी चाहिए,होती भी है क्योंकि उन मुद्दों का कोई न कोई एक पीड़ित सोशल मीडिया पर जरूर मिल जायेगा और इतना होते ही मुद्दे का उठना सार्थक माना जा सकता है पर “भूख” ही एकमात्र मुद्दा जिसकी चर्चा हम जिस सोशल मीडिया के जिस मंच पर कर रहे हैं उसका एक भी पीड़ित इस मंच पर मिलना मुश्किल है।

भूख का अर्थ जानते हैं न?

जो आदमी भूख से मर जाता होगा उसे आप गरीब समझने की भयंकर भूल मत कर दीजियेगा।
ये गरीबी से करोड़ों गुणा बद्तर और मानव अस्तित्व के समाप्ति की अंतिम अवस्था है. इसे जीडीपी की रफ़्तार से नही बचा सकता कोई देश.

भूख के मामले विकासशील देशों की सूची में भारत की स्थिति बयान करता यह चित्र

अब भारत 119 देशों में 100वें स्थान पर हो तो इसे देश के भावना और राजा की प्रतिष्ठा से जोड़ ये मत कुतर्क करने लगियेगा कि, “ये इंडेक्स केवल भूख और भुखमरी की नही, इसमें कई पहलू होते हैं जिसमे विटामिन की कमी,कुपोषण,पोषक तत्त्व की कमी इत्यादि भी शामिल है. जो खान पान की अनियमितताओं के कारण संपूर्ण भारत में है और इस आंकड़े में तो सभी वर्ग का लोग शामिल हैं। भारत के बढ़ते विकास से अमीर हुए जा रहे लोग के फ़ास्ट फूड भोजन कल्चर में भी विटामिन,पोषक तत्त्व की कमी रहती है सो ये आंकड़े उसी और इशारा करते हैं अतः ये चिंता मूल रूप से मध्यम और उच्च वर्ग के लोगों की है जिन्हें खान पान की पश्चिमी शैली छोड़ भारतीय स्वदेशी पारंपरिक आहार की ओर लौटना चाहिए जिससे जल्द ये आंकड़े ठीक हो सके,हम इसमें पतंजलि से भी सहयोग की अपेक्षा करेंगे जो लगातार इस आंकड़े से निकालने में देश की मदद कर रही है।”
इतने वाहियात तर्क मत ले आईयेगा, नही तो थेथर होने की पराकाष्ठा हो जायेगी।
सीधी बात ये है कि, ये एक ऐसा आंकड़ा है जिसकी जानकारी का खेल हमलोग आपस में fb fb पर न खेलें।
देश भूखा है, ये बात भूखों तक पहुंचाइए साथियों। हम चार टाइम खा के भूख पर चिंतनीय ब्लॉग लिख असल में कल के देश से खेल रहे हैं और भूख का मजाक ही उड़ा रहे हैं।
निकालिये fb से और गांव देहात के उन लोगों को बताइये कि देश भूखा नँगा है जिन्हें किसी ने ये बता रखा है कि “भारत माता सदा जय है।” देश के जिन करोड़ों भूखों को फोटो,पोस्टर,माइक से समझा दिया गया है कि भारत माता अमर है, उन्हें बताइये कि भारत माता भूखी है और दलिद्र देशों की लाइन में खड़ी है।
एक तंत्र वो है जो गांव गांव जा लोगों को समझा चुका है कि भले भूखे रह जायेंगे पर देश का मान न कम होने देंगे, पाकिस्तान को देख लेंगे,चीन को देख लेंगे…उन करोड़ों भोले लोगों को बताइये कि देश का मान भूखा रहने के कारण लुट जाता है।
उन्हें बताइये कि जिस देश के हाथ में दो रोटी तक नही वो देश हारा हुआ,मान सम्मान खोया हुआ देश कहलाता है। उन्हें समझाइए कि किसी भी भूखे देश की कोई इज्जत नही होती।
उन्हें समझाइए कि, तुम जिस चीन से लड़ने के लिए उकसाये जाते हो उसने तुम्हे मैदान से पहले ही थाली में ही हरा दिया है। उन भोले लोगों को बताइये कि, जिस नेपाल, बांग्लादेश को तुम्हे कीड़ा मकोड़ा बता अपने देश को महान बना देने का भरम दिया गया है वो अपना देश नेपाल,बांग्लादेश,म्यामांर,श्रीलंका जैसे छोटे मोटे देशों से भी ज्यादा दलिद्र है।
उन्हें बताइये कि, जब हमारे पास खाने को नही है ऐसे में कैसे हम किसी देश से नजर मिलाएंगे। उन्हें बताइये कि, दिवाली में चाइना बल्ब फोड़ देने से चीन नही हार जायेगा, वो तो दम भर खाता पीता देश है।
(फ़ोटो – साभार टाईम्स ऑफ़ इंडिया ) ग्लोबल हंगर इंडेक्स में पड़ोसियों के बीच भारत की स्थिति

देश के गांव में निकलिए तो जानिएगा कि यहां गरीब अपनी गरीबी के लिए सरकार या नीति को नही अपनी नियति को दोषी मानता है, ये सोच सदियों से है इनके बीच। इनकी इस धारणा को तोड़िये और बताइये कि देशवासी को खिलाने और जिलाने की जिम्मेवारी भाग्य की नही, देश के सरकार की होती है।
आप हम भर पेट भर खा राहुल गांधी से ज्यादा ह्यूमर दिखाते हुए और मोदी जी से ज्यादा आत्मविश्वास दिखाते हुए भूख इंडेक्स पर रोचक पोस्ट लिख रहे हैं। उत्तर कोरिया जैसे मुल्क से तुलना दिखाते हुए,किम जोंग को ज्यादा बेहतर बतला, ह्यूमरस पोस्ट डाल रहे हैं।
हमे जिस भयावह आंकड़े को गरीब गरूआ के बीच ले जा उनके बीच चर्चा का विषय बनाना चाहिए था जहां अभी लोग पाक और चीन मिटा देने,चाइनीज़ सामान उड़ा देने की चर्चा में लगे हैं, हम भरे पेट वाले उत्तर कोरिया के तानाशाह के हसीन पक्ष का ह्यूमर ठेलने में लगे हैं। एक बर्गर मुँह में डाले,हाथ में सिगरेट लिए हम इस इंडेक्स का इस्तेमाल किम जोंग का प्रवक्ता बनने में कर रहे हैं।
अरे घर से बाहर निकलिये, आस पास के किसी गरीब,मजदूर,किसान को पकड़िये और उसे समझाइए ये आंकड़ा। अगर एक भी आदमी को आप इस भयावहता को समझाने में सफल रहे और उस आदमी के मुंह से निकल आया”क्या? हे भगवान, हमरा देश इस हाल में है?”
तो समझना आपने देश के लिए कुछ सार्थक किया।
हम भूख से निजात तो नही दिला सकते पर भूख को भुला के भारत माता के नारे लगा कल मर जाने वाली गरीब भूखी जनता को स्वर्णिम भारत के भरम से तो निकाल ही सकते हैं न। इसे ही जागरूकता कहते हैं।
भूखा जगेगा तो हक़ का खाना मांगेगा, रोटी के लिए लड़ेगा, फिर वो देश के राजा के पाक से लड़ने,चीन से लड़ने वाले चोंचलों के भरोसे अपना भूख मारे तो नही न बैठा रहेगा।
वर्ना कोई मतलब नही इतना व्यथित और गंभीर हो इन आंकड़ों को fb पे चिपकाने का, हाँ बिहार,यूपी में कैसे भी कर,कैसी भी एक नौकरी के लिए जान लगाये प्रतियोगियों ने रट्टा मार एक नंबर तो अपने लिए सुनिश्चित कर लिया है।अगर यही है इसकी सार्थकता तो,सार्थक फिर सार्थक ही समझिये। जय हो।

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Nilotpal Mrinal

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