यह उद्धरण पढें। आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक और आरएसएस के प्रमुख विचारक जिनकी संघ के राजनीतिक चेहरे भारतीय जनसंघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका थी, एमएस गोलवलकर, जो संघ और भाजपा में, गुरु जी के नाम से जाने जाते हैं का एक कथन है।

वे कह रहे हैं कि,

” अंग्रेजों से लड़ने में अपनी ऊर्जा व्यय न करें। अपनी ऊर्जा अपने देश के अंदर व्याप्त आंतरिक दुश्मनों से लड़ने के लिये बचा कर रखें। जो मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट हैं। “

आज क्या वही ऊर्जा गोलवलकर के अनुसार जो आंतरिक शत्रु हैं के साथ उनके लोग राष्ट्रवाद का एक मिथ्या बिजूका खड़ा कर के नही लड़ रहे हैं ?

यह राष्ट्रवाद का संघी संस्करण है। यह राष्ट्रवाद, धर्म को ही राष्ट्र मान कर देखता है। राष्ट्रवाद की इस अवधारणा का आधार एक खास धर्म होता है। यहां यह हिंदुत्व है। संघ कभी सनातन धर्म, या उसकी अन्य शाखाओं प्रशाखाओं की बात नहीं करता है। वह षड्दर्शन में उन प्रगतिशील दर्शनों से भी दूरी बना लेता है। वह नचिकेतोपाख्यान और अन्य उपनिषद जो वाद विवाद और संवाद से मुक्त रूप से विचार और शास्त्रार्थ करते हुए बौद्धिक आकाश का संधान करते हैं, से परहेज करता है। वह धर्म को आचरण और आचार विचार से दूर रख कर धर्म का रेजीमेंटेशन करने में विश्वास करता है। क्योंकि वह जानता है कि विविधिता में एकता की बात करने वाला और एकेश्वरवाद से निरीश्वरवाद तक के दर्शन को एक साथ समेट कर चलने वाला यह धर्म उनके मूल मक़सद जो यूरोपीय फासिस्ट राष्ट्रवाद पर आधारित है, को छिन्न भिन्न कर देगा। इसी राष्ट्रवाद के दर्शन पर 1937 के हिंदू महासभा के अधिवेशन में वीडी सावरकर ने हिंदू एक राष्ट्र है कह कर द्विराष्ट्रवाद की नींव डाली, जिसपर कुशल और तीक्ष्ण मेधा वाले मुस्लिम लीग के नेता एमए जिन्ना ने पाकिस्तान की इमारत तामीर कर दी।

मैं इस प्रकार के संकीर्ण और धर्म आधारित राष्ट्रवाद के विरोध में हूँ। इसी धर्म आधारित राष्ट्रवाद के सिद्धांत ने भारत का बंटवारा किया था। आज फिर इसे लाठी के सहारे खड़ा किया जा रहा है। यह राष्ट्रवाद इतना संकीर्ण और घातक है कि आज यह धर्म की बात करता रहा है, कल जब यह अपने प्रतिद्वंद्वी धर्म को लील जाएगा तो, जाति और उपजाति की बात करने लगेगा और अंत मे देश मे इतने परस्पर अंतर्विरोध भरे कठघरे उत्पन्न हो जाएंगे कि देश एक अंतहीन झगड़े और विवाद के पंक में फंस जाएगा। श्रेष्ठतावाद इसका स्थायी भाव है।

आज ज़रूरत उस भारतीय राष्ट्रवाद की है जिसकी परिकल्पना हमारे प्राचीन मनीषियों से लेकर, स्वाधीनता आंदोलन के महान नायकों ने की है। उस राष्ट्रवाद की है जो विवेकानंद, बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, अरविंदो, खान अब्दुल गफार खान, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद आदि आदि के सपनो में था। वह राष्ट्रवाद भारत की अवधारणा का है, जो हमारे संविधान में लिपिबद्ध है। जिसकी बात अंबेडकर करते हैं।

एमएस गोलवलकर का यह उद्धरण यह प्रमाणित करता है कि जब शांतिपूर्ण सत्याग्रह से लेकर क्रांतिकारी गतिविधियां और सुभाष बाबू जी आज़ाद हिंद फौज अपने अपने विचार, दर्शन और तरीकों से देश के आज़ादी के लिये सक्रिय थे तो गोलवलकर और उनका संघ अपने हम खयाल हिंदू महासभा के साथ अंग्रेजों के हमसफ़र थे। अपने मुस्लिम विरोधी मानसिकता के बावजूद भी इस संगठन के आदर्श और नेता वीडी सावरकर और डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी,  एमए जिन्ना की विभाजनवादी पार्टी मुस्लिम लीग के साथ न केवल सत्ता में थे बल्कि देश के बंटवारे पर चिंतन मनन कर रहे थे। और आज बंटवारे तथा साम्प्रदायिक उन्माद का जहर फैला कर अखंड भारत का एक पाखंड भरा दिवास्वप्न दिखाते हैं।

मुझे संघ के इसी दोहरे रवैये और चरित्र पर आपत्ति है। आज कोई संघी द बंच ऑफ थॉट या विचार नवनीत का उद्धरण नहीं देता है। अब वह गुरु जी का नाम भी नहीं लेता है। वह गोलवलकर की बात भी कम करता है। वह यह जानता है कि आजादी के दौरान उनका स्टैंड गलत और देश विरोधी था। मैं आप को गुरु गोलवलकर के और भी उद्धरण पढ़ाता रहूँगा। इस पर जो कमेंट आएं उन्हें भी पढियेगा। यह राष्ट्रवाद जर्मन श्रेष्ठतावाद से ग्रस्त राष्ट्रवाद है जो भारतीय अस्मिता और परंपरा के विपरीत और विरुद्ध है।

© विजय शंकर सिंह