जब जांच एजेंसियां, जांच के पहले ही किसी तयशुदा निष्कर्ष, चाहे वह निष्कर्ष या लक्ष्य किसी ने तय कर के डिक्टेट कर दिया हो, या जांचकर्ताओं ने पहले से ही यह लक्ष्य तय कर लिया है, कि इसे छोड़ना नहीं है तब उस मुक़दमे के जांच और अदालती कार्यवाही के दौरान ऐसी ऐसी भयंकर भूले हो जाती हैं, कि जांच एजेंसी सहित अदालतों में उसका पक्ष रख रहे बड़े से बड़े सरकारी वकील तक असहज हो जाते हैं। और निरुत्तर भी हो मौन हो जाते हैं या उनके पास उस समय खेद जताने के अतिरिक्त और कोई चारा भी नहीं रहता है। ऐसी भयंकर भूलों से उपजी परिस्थितियों को अंग्रेजी में ब्लंडर कहते हैं।
ऐसा ही एक ब्लंडर, इंफोर्समेंट डायरेक्टोरेट ने सुप्रीम कोर्ट में किया है। ईडी देश की एक विशेषज्ञ जांच एजेंसी है, वह कोई सामान्य सा पुलिस थाना नहीं है। ईडी के पास कर चोरी और काले धन के के बड़े बड़े मामले जांच के लिये आते हैं। बड़े आर्थिक अपराधों की जांच आसान नहीं होती हैं। जटिल दस्तावेजों और तमाम ईमेल्स में से सुबूत निकालना श्रमसाध्य कार्य होता है। जिनकी जांच होती है, वे भी कम महत्वपूर्ण शख्सियत नहीं होते हैं। वे राजनीतिक रूप से रसूखदार होते हैं, और धन सम्पन्न तो होते ही हैं।  ऐसे मामलों में ईडी को बहुत ही सतर्क होकर अपना काम करना पड़ता है। पर जब ईडी किसी राजनीतिक या स्वार्थी एजेंडे के आधार पर जांच करने लगती है, तो उसकी जांच न तो निष्पक्ष रह पाती है और न ही उसकी गुणवत्ता बरकरार रहती है। ईडी ने ऐसी ही राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जांच में एक ब्लंडर कर दिया है।
डी. शिवकुमार, कर्नाटक कांग्रेस के नेता हैं और वे एक उद्योगपति भी है। कर्नाटक में उनकी भूमिका कांग्रेस के संकटमोचक के रूप में अक्सर रहती है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद जब जेडीएस और कांग्रेस की कुमारस्वामी सरकार बनी थी, तब भी और जब जेडीएस और कांग्रेस की सरकार टूटी और येदुरप्पा की भाजपा सरकार बनी तब भी शिवकुमार कांग्रेस की तरफ से, भाजपा की सरकार न बने इस लिये सक्रिय थे। और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और सरकार की आंख के किरकिरी बन गए।
केंद्र सरकार के निर्देश पर ईडी ने शिवकुमार की जांच शुरू की और शिवकुमार को ईडी ने गिरफ्तार किया और जेल भेजा। हाईकोर्ट से शिवकुमार को जमानत मिली और ईडी ने उस जमानत को रद्द करने के लिये सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने 15 मई को ईडी की अर्जी खारिज कर दी। पर जिस बिन्दु पर यह अर्जी खारिज हुयी है, वह ईडी जैसी एक बड़ी और विशेषज्ञ एजेंसी के लिये एक प्रतिष्ठाघात है।
ईडी ने शिवकुमार की ज़मानत रद्द कराने के लिये जो प्रार्थना पत्र दिया, उसमें उसने डी शिवकुमार को पूर्व वित्त एवं गृह मंत्री कह कर उल्लिखित किया। जबकि शिवकुमार कभी भी केंद्रीय सरकार में रहे ही नहीं है। इस बड़ी गलती की ओर, शिवकुमार के वकील, मुकुल रोहतगी और अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत का ध्यान आकर्षित किया। दोनों वकीलों ने अदालत को बताया कि ईडी के प्रार्थना पत्र के  पृष्ठ H एच पर शिवकुमार के बारे में यह गलत तथ्य दिए गए हैं कि वे देश के वित्तमंत्री रह चुके हैं।

अब ईडी ने जमानत के विरोध में जो तर्क दिया है उसे पढें।

“… The nature of the offence and brazenness and impunity with which the high office of the Finance Minister of the Country was abused by the accused for personal gains again disentitles him from seeking bail.” ( देश के वित्तमंत्री के द्वारा, किये गए इस अपराध का प्रकार और जिस शर्मनाक तरीके से निजी हित मे, उक्त अपराध को नज़रंदाज़ किया गया है, उससे इस जमानत का विरोध किया जाता है। )
बिलकुल यही तर्क पी चिदंबरम के जमानत का विरोध करते हुये, ईडी ने अदालत में रखा था। वही पैराग्राफ जस का तस कॉपी पेस्ट कर के शिवकुमार के मामले में चिपका दिया गया । शिवकुमार को देश का वित्तमंत्री कहा गया, जबकि वे कभी देश के वित्तमंत्री रहे ही नहीं हैं।
अदालत की पीठ पर जस्टिस रोहिंगटन नारीमन और जस्टिस रविन्द्र भट्ट थे, जिन्होंने  इस कट कॉपी पेस्ट की टेक्नीक को ट्रैजिक कॉमेडी कहा है। यानी एक ऐसा बेवकूफी भरा तर्क कि, न हंसते बने न रोते बने।
यही केवल नहीं बल्कि जमानत के विरोध में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट की धारा 45 जो 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दी गयी है, का उल्लेख कर के उस आधार पर जमानत का विरोध किया गया है। इस अधिनियम की धारा 45 जमानत के प्राविधान को और सख्त बनाती है। धारा 45 (1) में दिए गए प्राविधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी और यह कहा गया कि यह प्राविधान नागरिकों के मूल अधिकार का उल्लंघन है और असंवैधानिक है।
सुप्रीम कोर्ट के इसी बेंच के जस्टिस नारीमन ने इस धारा को असंवैधानिक पाते हुये 2018 में रद्द कर दिया था। जस्टिस नारीमन ने यह भी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को याद दिलाया कि यह धारा 45 जिसके आधार पर वे शिवकुमार की जमानत का विरोध कर रहे हैं, अदालत द्वारा रद्द की जा चुकी है। अदालत की इन दो बड़ी गलतियों पर नाराजगी हुयी और शिवकुमार के जमानत के विरोध में दी गयी ईडी की याचिका अदालत ने खारिज कर दी। सॉलिसिटर जनरल स्तर के बड़े वकील से ऐसी बड़ी गलतियां होना, अदालत की नज़र में एक बड़ी भूल है।
चिदंबरम और शिवकुमार के मामलो में भले ही मुक़दमे के तथ्य अलग अलग हों, पर एक समता यह है दोनों ही कांग्रेस के बड़े नेता हैं, और सरकार के मुखर विरोधी हैं। चिदम्बरम तो केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। शिवकुमार ने कर्नाटक में भाजपा की कुटिल रणनीति का जमकर सामना किया। दोनों ही सत्ता शीर्ष के निशाने पर हैं। ईडी पर यह दबाव साफ साफ दिख रहा है कि वह हर दशा में इन्हें अधिक से अधिक समय तक, जेल में रखे और यह प्रक्रिया  विधि के अंतर्गत होते हुए भी विधिनुकूल नहीं दिखती है। ईडी हो या पुलिस की छोटी से छोटी जांच एजेंसी, अगर वह बाहरी दबाव में अपने विवेचना के कार्य को प्रभावित होने देने लगती है तो ऐसी गलतियां स्वाभाविक रूप से होने लगती हैं।
ईडी हो, या सीबीआई या राज्यों की जांच एजंसियां या पुलिस, इन सब पर महत्वपूर्ण मामलों में राजनीतिक दबाव अक्सर पड़ता रहता है। तभी तो सीबीआई को शीर्ष अदालत ने एक बार पिंजड़े का तोता यानी उसे जो सिखाया जाता है वही वह दुहराता है। और सिखाता कौन है ? यह किसी से छुपा नहीं है। छोटे से छोटे राजनीतिक व्यक्ति से लेकर सत्ता शीर्ष  तक बैठे हुए नेता गण अपने अपने निजी, या दलगत या किसी अन्य कारण से सीबीआई से लेकर जिला पुलिस के विवेचकों पर जांच को मनचाही दिशा और दशा में ले जाने के लिये दबाव डालने की कोशिश करते रहते हैं। कोई भी सरकार इस व्याधि से मुक्त नहीं है। किसी किसी के काल मे यह दबाव अधिक होता है तो किसी के समय कम।
© विजय शंकर सिंह