न्यायपालिका

दोषी नहीं तो मुकेश के दांत के निशान निर्भया के पैर में कैसे लगे: सुप्रीम कोर्ट

दोषी नहीं तो मुकेश के दांत के निशान निर्भया के पैर में कैसे लगे: सुप्रीम कोर्ट

देश को झंकझोर कर देने वाली घटना, जो मनवता को शर्मसार करते हुए, राजधनी दिल्ली में घटी थी. जी हाँ हम बात कर रहे है निर्भया केश की. जिसके पांचवीं बर्षी के ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कुछ तल्ख टिपणीया की. मामले की अगली सुनवाई  22 जनवरी को होगी.

सांकेतिक फाइल फोटो

मंगलवार को मामले की सुनवाई के दौरान मुकेश के बचाव में वकील की तरफ से कई दलीलें दी गईं. मुकेश की ओर से पेश वकील मनोहर लाल शर्मा ने कहा कि उसे टार्चर किया गया और  फिर उसका बयान लिया गया. मुकेश के वकील की तरफ से मामले की जांच पर भी कहा गया कि जांच सही ढंग से नहीं की गई, मुकेश घटना स्थल पर मौजूद ही नहीं था. तमाम दलीलें सुनने के बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि मुकेश के डीएनए की जांच, पीड़िता के आखिरी समय पर दिए गए बयान और जो बरामदगी हुई उसी के आधार पर उसे दोषी करार दिया गया है. कोर्ट ने कहा कि अगर आपके अनुसार दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) 313 के तहत दर्ज़ बयान को नहीं माना जाए क्योंकि आपके मुताबिक आपने टॉर्चर के बाद बयान दिया और आप दबाव में थे तो ऐसे में फिर देश में कोई भी ट्रायल नही चल पाएगा.  चीफ जस्टिस ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पीड़िता के शरीर पर मुकेश के दांतों के निशानों को अनदेखा कैसे कर सकते है? सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि कोर्ट इस मामले की सुनवाई हिमालय की तरह धैर्यता से करता आया है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सेक्स और हिंसा की भूख के चलते बड़ी वारदात को अंजाम दिया गया. दोषियों की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा पर रोक लगाकर तीन जजों की बेंच को मामला भेज दिया था. इस मामले में मदद के लिए दो न्यायमित्र नियुक्त किए गए थे. मंगलवार को दोषी मुकेश की पुनर्विचार याचिका का दिल्ली पुलिस ने पुरजोर विरोध किया. मुकेश की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि उसे टॉर्चर किया गया और जबरन में फंसाया गया.
पुलिस की तरफ से पेश वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि यह मामला पुनर्विचार का बनता ही नहीं है. उन्होंने कहा कि जो टॉर्चर थ्योरी कोर्ट को बताई जा रही है वह गलत है, क्योंकि अगर ऐसा होता तो तिहाड़ जेल प्रशासन या निचली अदालत को बता सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. दिल्ली पुलिस ने कहा कि इस मामले में कही भी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं हुआ है. दोषी के वकील एमएल शर्मा का कहना था कि टॉर्चर को लेकर निचली अदालत, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया लेकिन उस पर विचार नहीं किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने अभियुक्त के वकील को फटकार लगाते हुए कहा कि जिन चीजों का सहारा लेकर आप पुनर्विचार करने की अपील कर रहे हैं, उन्हें पहले ही खारिज किया जा चुका है.

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