विचार स्तम्भ

डरता हूँ कि कहीं इस डर से लोग सच बोलना न बंद कर दें

डरता हूँ कि कहीं इस डर से लोग सच बोलना न बंद कर दें

एक साया सा फ़ैल गया है हर सिम्त
दिल के भीतर / और वहीं
बैठ गया है चुपचाप आजकल एक डर
मन करता है उस डर को उलीच दूँ यहां
पर डर को उलीचना और भी ज्यादा डर से भर जाना है.
सामने पार्क में खेलता बच्चा जोर से हंसता है
और मैं उसकी हंसी सुन डर जाता हूँ
कि कहीं कोई उन्मादी भीड़
न मिल जाए
और इसके हंसने पर लगा दे आरोप
लोगों की आस्था को खंडित करने का
कहीं वे इसे भी पीट-पीटकर मार न दें, यह कहते हुए
कि इसकी हंसी/ उनकी हंसी उड़ाने वाली थी.
और अब हंसी उड़ाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
मैं धीरे से उसके कान में जाकर कहता हूँ
इस दौर में ऐसे नहीं हंसते.
वो चुप हो मुझे देखने लगता है
और मैं डर जाता हूँ.
हाँ, मैं डरा हुआ हूँ/ और जब
अपने डर को महसूसता हूँ
तो और भी डर जाता हूँ
मैं डरकर स्लेट पर लिखे की मानिंद
सबकुछ पोंछ देना चाहता हूँ
अपना नाम, अपना काम
अपनी पहचान, अपना वजूद, सबकुछ
हो जाना चाहता हूँ सबसे ओझल
दूर, एकांत, ऐसी जगह की करता हूँ कल्पना
जहां मेरे अलावा कोई न हो
परन्तु अकेले होने के एहसास से डर जाता हूँ.
और डर दूर करने को देखने लगता हूँ सपना
सपने में आता है बचपन का गांव
गांव के लोग, दूर तक फैले खेत, खलिहान
बाग़, तालाब, गाय, बैल, हल
सुबह सवेरे दूर खेतों में टहलना
अब्बा को लगता हूँ कमजोर और
कहते हैं अब कुछ दिन यहीं रहो
तुम्हारे रामदीन काका से कह एक गाय ले लेते हैं.
उनके इतना कहते ही मैं उठ बैठता हूँ
सपना ओझल हो जाता है और माथे पर पसीना चुहचुहा आता है
 
डर जो बैठ गया है दिल में
जब उठता है तो सड़क पर चलते लोग
बदल जाते हैं भीड़ में
और देखते ही देखते बन जाते हैं खूंखार भेड़िये
मैं डरकर भागता हूँ, चिल्लाता हूँ
सामने ट्रेन खड़ी है/ पर
मैं उसमें नहीं चढ़ता
इस डर से कि
कहीं सहयात्री बन न जाएँ भीड़ और मैं जुनैद
मैं अब भूख लगने पर भी नहीं खाता कई-कई दिनों तक
क्योंकि जब भी कुछ खाता हूँ वह मांस में तब्दील हो जाता है/ फिर
उससे टपकने लगता है खून और
बहने लगता है सड़कों पर
मैं सचमुच डर गया हूँ.
और डरता हूँ कि कहीं इस डर से
लोग सच बोलना न बंद कर दें.
और कर लें चुपचाप सब स्वीकार
सच कहने से डरना / यानी
सांसो के रहते लाश में बदल जाना है
और अपनी लाश को उठाये चलने से बड़ा
कोई डर नहीं होता.
#मसऊद_अख्तर

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Masaud Akhtar

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