साल 1857 की दस मई को जब मेरठ छावनी में सौनिको ने विद्रोह कर दिया तो, उन्होंने अंग्रेज़ों को मारना शुरू कर दिया। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के साथ साथ इस विप्लव की घटनाओं पर किस्से कहानियां, और उपन्यास भी बहुत लिखे गये हैं। ऐसा ही एक औपन्यासिक वृतांत है जूलियन रैथबॉन का उपन्यास द म्यूटिनि। एक अंग्रेज परिवार के माध्यम से इस विप्लव की दास्तान इस उपन्यास कथा में कही गई है। विप्लव तो हो गया पर इस संग्राम का कोई एक शीर्ष नेता नहीं था।
मेरठ से सैनिक दिल्ली की ओर कूच कर दिए। 60 मील दूर दिल्ली पहुंच कर सैनिकों ने नाव के पुल से यमुना पार किया और लालकिला को घेर लिया। मक़सद था भारत के अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफर को इस विद्रोह की कमान सौंपना। आखिरी मुग़ल को भले ही जिल्ले इलाही, ( ईश्वर की छाया ) तथा अन्य भारी भरकम पदवियों से संबोधित किया जाता हो, पर वास्तविकता यही थी कि, उसकी बादशाहत बस दिल्ली से पालम तक थी। भले ही बादशाह के हुक़ूमत की सीमा बस इतनी ही बची हो, लेकिन, बादशाह तब भी दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो के हैंग ओवर में ही मुब्तिला था।
बहादुर शाह जफर ने ‘दमदमें में दम नहीं है, खैर मांगो जान की, तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की’, कहते हुये इस विप्लव का नेतृत्व ग्रहण कर लिया। पर यह विद्रोह लम्बा नहीं चल सका। बहादुर शाह जफर को हुमायूं के मकबरे से अंग्रेज़ों ने गिरफ्तार कर लिया और उन्हें विद्रोह का मुख्य दोषी साबित कर के पहले कलकत्ता और फिर रंगून भेज दिया।
रंगून में जफर से एक अंग्रेजी अखबार के पत्रकार ने इंटरव्यू लिया और जब उनसे उनका जुर्म पूछा तो बहादुर शाह जफर ने कहा कि उनका सबसे बड़ा जुर्म है अपने मुल्क और अवाम की सरपरस्ती और बेहतरी के लिये कुछ न करना। फिर यह कहा कि उन्हें अपने मुल्क और अवाम के प्रति की गयी लापरवाही और नज़र अंदाज़ी की उचित सजा मिली है। अंत मे 1862 में इस अंतिम मुग़ल बादशाह को दो ग़ज़ ज़मीन भी दफन के लिये अपने वतन, कू ए यार में नहीं मिल सकी। वह इरावदी नदी के किनारे रंगून शहर के एक बियाबान में सुपुर्दे खाक हो गया।
1857 के विप्लव से अंग्रेज़ों ने एक सीख यह ग्रहण की कि भारत मे हिन्दू मुस्लिम सद्भाव का बने रहना उनके अस्तित्व के लिये सदैव एक चुनौती रहेगी। यही कारण था कि इस सद्भाव को भग्न करने के लिये उन्होंने खिलाफत आंदोलन के बाद जब भी और जो भी उन्हें मौका मिला हर तरह का प्रयास किया जिससे हिन्दू मुस्लिम मतभेद बढ़े और समाज बिखरे । उन्होंने धर्मगत आधार पर अलग निर्वाचक मंडलों का गठन किया।
जिस ब्रिटिश लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता एक मूल रूप में थी, उसी मदर ऑफ परलियमेंट्स कही जाने वाले ब्रिटेन ने भारत मे धार्मिक विभाजन की नींव डाली। अंग्रेज़ो ने धर्म के आधार पर गठित मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा को सदैव अपनी सरपरस्ती में रखा। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि यह दोनों ही साम्रदायिक दल एक दूसरे धर्मों के प्रबल विरोधी होते हुए भी आज़ादी के आंदोलन के खिलाफ थे।
हेरिटेज टाइम्स ने बहादुर शाह जफर पर एक बेहद प्रेरक प्रसंग का उल्लेख किया है। नेताजी सुभाष बोस ने 1857 से निर्वासित जफर की मजार पर जाकर उक्त विप्लव के नायक बहादुर शाह जफर को खिराजे अकीदत पेश की । बहादुरशाह ज़फ़र के मज़ार पर हाज़री देने वालों में सबसे बड़ा नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस का है, जिन्होंने अखंड भारत के लीडर और आज़ाद हिंद फौज के कमांडर इन चीफ की हैसियत से रंगून में बहादुरशाह ज़फ़र की मज़ार पर आज़ाद हिंद फ़ौज के अफ़सरों के साथ 1942 में सलामी दी थी और ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया था।
1947 में हिंदुस्तान आज़ाद होता है, साथ मे बटवारा भी, बर्मा पहले से वजूद में था; पाकिस्तान वजूद में आता है, फिर 1971 में बंग्लादेश! रह रह कर इन मुल्क के लीडर आख़री मुग़ल शहंशाह के मज़ार पर हाज़री देने गए। पाकिस्तान के के प्रधानमंत्री रहते हुए मियां नवाज़ शरीफ़ और राष्ट्रपति रहते हुए अयूब ख़ान, परवेज़ मुशर्रफ़ और आसिफ़ अली ज़रदारी ने बहादुर शाह ज़फ़र के मज़ार पर हाज़री दी और फूल चढ़ाए। साथ ही बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहते हुए बेगम ख़ालिदा ज़िया ने बहादुर शाह ज़फ़र के मक़बरे कि ज़यारत की। हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री रहते हुए राजवी गांधी और नरेंद्र मोदी ने, राष्ट्रपति रहते हुए एपीजे अब्दुल कलाम ने, उपराष्ट्रपति रहते हुए भैरोंसिंह शेखावत और हामिद अंसारी ने, विदेशमंत्री रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी और जसवंत सिंह ने हिंदुस्तान के इस जिलावतन हुक्मरां बहादुर शाह ज़फ़र की क़ब्र पर हाज़री दी।
एक ज़माना था के जब भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और बर्मा सब एक-दूसरे से जुड़े थे; यानी एक मुल्क थे। और आज एक दूसरे से अलग- अलग हैं। वो दौर था जब लोग काबुल से निकलते थे, पेशावर, दिल्ली, कलकत्ता होते हुए सीधे रंगून निकल जाते थे।
हाल तक हमें रंगून से एक गाना जोड़ते आया है, जिसका बोल है – ‘मेरे पिया गए रंगून, वहां से किया है टेलीफ़ून, तुम्हारी याद सताती है।’ वैसे रंगून आज से नहीं पिछले डेढ़ सदी से हमारी यादों का हिस्सा है। अंग्रेज़ों ने 1857 में दिल्ली पर क़ब्ज़ा किया। मेजर हडसन ने मुग़ल शहज़ादों का ख़ून पीया, उनके सिर तश्त में रखकर अस्सी बरस के बूढ़े बाप को दस्तऱख्वान पर भिजवाए। बहादुर शाह ज़फ़र को एक नाजायज़ और ज़ालिमाना मुक़दमा चलाकर जिलावतन किया। फिर रंगून में उन्हें क़ैद किया और मरने के छोड़ दिया और उन्हे उनके मुल्क हिंदुस्तान में दफ़न होने की ख़ातिर दो ग़ज़ ज़मीन के लिए तरसाया। हद तो यह है के बादशाह के लिए रंगून में ज़मीन नही थी … उनके लिए उस सरकारी बंगले के पीछे ज़मीन पर खुदाई की गयी जहां उन्होने 7 नवंबर 1862 को आख़री सांस ली.. और बादशाह को ख़ैरात में मिली मिटटी के निचे डाल दिया गया … और इस तरह एक सूरज ग़ुरूब हो जाता है।
आज़ाद हिंद फ़ौज के सिपाही ‘कर्नल’ निज़ामुद्दीन के हिसाब से सुभाष बोस ही वो इंसान थे जिन्होंने आख़िरी मुग़ल शहंशाह बहादुरशाह ज़फर की क़ब्र को पूरी इज़्ज़त दिलवाई। उनके अनुसार “ज़फर की क़ब्र को नेताजी बोस ने ही पक्का करवाया था। वहाँ क़ब्रिस्तान में गेट लगवाया और उनकी क़ब्र के सामने चारदीवारी बनवाई थी।”
16 दिस्मबर 1987 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यहां के विज़िटर्स बुक में अपना पैग़ाम लिख कर ख़िराज ए अक़ीदत पेश किया था, जो कुछ इस तरह था के अगर्चे आप हिंदुस्तान में दफ़न नही हैं, मगर हिन्दुस्तान आपका है, आपका नाम ज़िन्दा है, मै उस याद को ख़िराज ए अक़ीदत पेश करता हुं जो हमें हमारी पहली जंग ए आज़ादी की याद दिलाती है, जो हमने जीती थी।
9 मार्च 2006 को जब हिंदुस्तान के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने मज़ार पर हाज़िरी दी; तब उन्होने वहां के विज़िटर्स बुक में लिखा : ‘आपने अपने एक शेर में लिखा है कि मेरे मज़ार पर कोई नहीं आएगा, न कोई फूल चढ़ाएगा, न शमा जलाएगा.. लेकिन आज मैं यहां सारे हिंदुस्तान की तरफ़ से आपके लिए फूल लेकर आया हूं और मैंने शमां रौशन की हैं।’
हेरिटेज टाइम्स के अनुसार, 26 दिस्मबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बर्मा के महामहिम डॉक्टर बॉ मॉऊ के साथ आख़री मुग़ल शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र के मज़ार पर हाज़री देने के बाद एक ऐतिहासिक भाषण दिया जो कुछ इस तरह से है :-

महामहिम और मित्रों,

आज हम आज़ाद हिंदुस्तान के आख़री शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र के मज़ार पर जमा हुए हैं, यह शायद इतिहास का अजीब गौरवशाली संयोग है कि जहां भारत के अंतिम सम्राट की क़ब्र बर्मा में सरज़मीन पर है, वहीं स्वातंत्र बर्मा के अंतिम राजा की अस्थियां हिंदुस्तान की मिट्टी में है!
हम अपना अडिग इरादा इस पवित्र स्मारक के सामने व्यक्त करते हैं, उसकी मज़ार के सामने खड़े हो कर व्यक्त कर रहे हैं, जो हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई का अंतिम योद्धा था, वह जो मनुष्यों के बीच एक शहंशाह था और जो शहंशाहों के बीच एक मनुष्य था। हमने बहादुर शाह ज़फ़र की यादों को संजो कर रखा है। हम हिंदुस्तानी, चाहे किसी भी मज़हब के मानने वाले क्युं न हों, बहादुर शाह ज़फ़र को हमेंशा याद करते हैं, न केवल इस लिए कि वह वही आदमी था, जिसने दुशमन पर बाहर से हमला करने के लिए देशवासियों को उत्तेजित किया था, बल्कि इस लिए भी क्युंके उसके झण्डे के नीचे सभी प्रान्तो के हिंदुस्तानी जमा हुए थे और लड़े थे।
© विजय शंकर सिंह