देश की सर्वोच अदालत के एक सवाल किया और केंद्र से इसका जबाब भी माँगा गया, इससे राजनीतिक पार्टियों में हलचल मचा दी.  सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया है कि आपराधिक मामले में दोषी ठहराया जा चुका और सजायाफ्ता शख्स कैसे किसी राजनीतिक दल का प्रमुख बन सकता है?
कोर्ट ने आगे भी कहा कि, जो खुद चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो चुका है, वह कैसे उम्मीदवार चुन सकता है?
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इसे कोर्ट के फैसले के खिलाफ बताते हुए कहा कि केंद्र सरकार इसका जवाब दे और  सरकार ने जवाब देने के लिए समय मांगा.  इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तीन हफ्ते की मोहलत देते हुए अगली सुनवाई 26 मार्च को तय कर दी.
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी –

  • चीफ जस्टिस ने कहा कि यह गंभीर मामला है. कोर्ट ने पहले आदेश दिया था कि चुनाव की शुद्धता के लिए राजनीति में भ्रष्टाचार का विरोध किया जाना चाहिए.
  • क्योंकि ऐसे लोग इस मामले में अकेले कुछ नहीं कर सकते, इसलिए अपने जैसे लोगों का एक संगठन बनाकर अपनी मंशा पूरी करते हैं.
  • कोर्ट ने कहा कि ऐसा स्कूल या हॉस्पिटल चलाने के लिए किया जाए तो उसमें कोई आपत्ति नहीं, लेकिन जब बात देश का शासन चलाने की है तो मामला अलग हो जाता है. यह उनके पहले दिए गए फैसले के खिलाफ है.

दरअसल, दागी नेताओं के राजनीतिक पार्टी प्रमुख बनने के खिलाफ वकील अश्विनी उपाध्याय ने जनहित याचिका दायर की थी. इसी याचिका पर सुनावई करते हुए कोर्ट ने यह टिप्पणी की. पीआईएल पर चुनाव आयोग की तरफ से काउंसलर अमित शर्मा ने भी समर्थन किया.
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में दलील दी कि कुछ नेता जो गंभीर आपराधिक मामलों में दोषी करार दिए जाते हैं, उन पर चुनाव लड़ने की पाबंदी है.
परन्तु इसके बावजूद ऐसे लोग पार्टी बना सकते और पार्टी चला सकते हैं. याचिका में तर्क दिया गयाकि, “लालू यादव, ओम प्रकाश चौटाला, शशिकला जैसे नेता दोषी करार दिए गए हैं, लेकिन फिर भी पार्टी के सर्वेसर्वा बने हुए हैं.”
शर्मा ने कोर्ट में चुनाव आयोग का पक्ष रखते हुए कहा कि,  “1998 से ही आयोग इस बात की वकालत कर रहा है, लेकिन आयोग के पास किसी दोषी नेता द्वारा राजनीतिक पार्टी चलाने पर पाबंदी का सर्वाधिकार नहीं है.”
चुनाव आयोग की प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए काउंसलर शर्मा ने भी कहा कि अगर संसद से जनप्रतिनिधि कानून में बदलाव कर ऐसा प्रावधान किया जाता है तो हम पूरी तरह से इसे लागू कराने की कोशिश करेंगे.

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सुभाष बगड़िया

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